A Dark Secret – Chapter 17
मैं चटाई पर लेट गया।
आसमान में धूल की वजह से तारे कम दिख रहे थे, पर टोल की रोशनी ऊपर तक आ रही थी, और उस रोशनी में धूल ऐसे तैर रही थी जैसे पानी में छोटी मछलियाँ।
मैंने कान सड़क की तरफ़ किए।
अब शहर साफ़ सुनाई दे रहा था।
हर ट्रक का अपना राग था। एक ट्रक जो अभी-अभी निकला, उसकी आवाज़ ऊँची थी और फिर धीमी — उसका ड्राइवर गियर बदल रहा था, और जल्दी में था। एक दूसरा ट्रक खड़ा था, उसका इंजन चालू था पर गाड़ी हिल नहीं रही थी — कोई अपने बॉस का फ़ोन सुन रहा था। और एक तीसरा था जो बहुत धीरे चल रहा था, भारी, जैसे बोझ से पीठ झुकी हो, और उसके पीछे लोहे की करछी बज रही थी — उसकी पीछे की लाइट की शीशी ढीली थी।
मैंने उसे सुना। मैंने सोचा — काश पापा भी यहाँ होते। वो कहते, बेटा, गाड़ी भी आदमी है। वो बोलती है। बस सुनने वाला चाहिए। और सुनने वाला वो ही होता है जो आँख बंद करके भी जागता रहे।
मेरी आँख भारी होने लगी।
और फिर मैंने वो आवाज़ सुनी।
दूर से, टोल के पार, वहाँ जहाँ मोती पलटा था — एक गाड़ी खड़ी थी। रोज़ खड़ी रहेगी, जब तक कोई उसे उठाकर न ले जाए। उसका इंजन बंद था। बस एक आवाज़ आ रही थी — धातु की घिसाई। जब हवा चलती थी, टूटा हुआ पैनल हिलता था और किसी चीज़ से रगड़ता था। चीं…चीं…चीं।
जैसे कोई साँस लेने की कोशिश कर रहा हो और नाम न आ रहा हो।
मैंने आँखें बंद कर लीं और उसी आवाज़ पर ध्यान टिका दिया। मुझे लगा जैसे मोती मुझसे कुछ कह रहा है, पर मैं अभी उसकी भाषा नहीं जानता। मैंने सोचा, कल सुबह जाऊँगा। कल सुबह उसके पास बैठूँगा, नीचे लेटूँगा, और सब सुनूँगा। घिसाई, रिसाव, और वो आवाज़ जो सबको शोर लगती है।
मेरी आँख बंद हो गई।
नीचे से फ़ोन बजा।
मैंने आँख नहीं खोली। मुझे लगा चाचा का फ़ोन है, कोई काम का होगा। पर छत पर रात इतनी शांत थी कि नीचे के कमरे की आवाज़ ऊपर साफ़ आ रही थी।
फ़ोन फिर बजा।
फिर आवाज़ आई — चाचा की आवाज़, पर वैसी नहीं जैसी शाम को थी। न लाड, न हँसी। बस एक धीमी, दबी हुई फुसफुसाहट, जैसे कोई चोर अपने ही घर में बोल रहा हो।
"हाँ भाई साहब। हाँ।"
रुकावट।
"जी, वो आ गया है। ट्रेन से। मैंने कमरा दे दिया ऊपर वाला।"
रुकावट।
"नहीं, नहीं, कुछ नहीं पूछा। बस मोती की बात की थी। मैंने टाल दिया।"
रुकावट।
और फिर वो आवाज़ आई जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। बहुत नरम। बहुत छोटी। जैसे कोई डरकर माफ़ी माँग रहा हो।
"भाई साहब, वो बच्चा है। मेरा भतीजा है। मैं उसे संभाल लूँगा। आप कुछ मत कीजिए।"
और फिर फ़ोन कट गया।
मेरी आँख अंधेरे में खुल गई।
मैंने ऊपर देखा। आसमान में धूल तैर रही थी। टोल की रोशनी अब भी ऊपर आ रही थी। और दूर, बहुत दूर, मोती ट्रक की धातु हवा में चीं…चीं… कर रही थी, जैसे उसने भी सब सुन लिया हो।
मैं हिला नहीं।
और नीचे, छोटे से कमरे में, चाचा की चप्पलें फ़र्श पर सरकती रहीं, और फिर पंखे की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं रहा।
॥
मैंने आँख खोली तो आसमान धूसर था। न सूरज निकला था, न तारे बचे थे। बस एक ठंडी रोशनी थी जो धूल में घुलकर आ रही थी, जैसे किसी ने दूध को पानी में डाल दिया हो।
मैं चटाई पर पसरा रहा। शरीर में हड्डी नहीं थी, बस थकान थी। तीन दिन से न नहाना, न कपड़े बदलना। शर्ट की खुशबू भी अब मुझसे अलग हो चुकी थी।
नीचे से आवाज़ आई।
"अर्जुन! उठ गया?"
चाचा की आवाज़ थी। पर सुबह की आवाज़ में वो लाड नहीं था जो कल शाम था। आज वो आवाज़ छोटी थी। जैसे रात भर किसी ने गला दबाकर बात की हो और सुबह गला सूख गया हो।
मैं उठा। सीढ़ी उतरा। चाचा चूल्हे के पास बैठे थे, चाय का बर्तन चढ़ा हुआ था, और वो अपनी उँगली से फ़र्श पर कोई लकीर बना रहे थे। जब मैं आया, उन्होंने आँख नहीं उठाई।
"हाथ मुँह धो ले," बोले। "गैराज चलना है। आज एक गाड़ी आ रही है, उसका काम है।"
मैंने बाल्टी से पानी लिया। ठंडा पानी सिर पर डाला तो लगा जैसे किसी ने दिमाग़ पर से धूल की परत उतार दी।
"चाचा," मैंने कहा, "रात को फ़ोन किसका था?"
उनका हाथ रुका। बस एक पल। फिर चाय छानने लगे।
"काम का था। भाई साहब का।"
"कौन भाई साहब?"
"जिनके यहाँ हम काम करते हैं। बड़े आदमी हैं। उनको हर बात की ख़बर रहती है।"
मैंने चाय का कटोरा लिया। गरम था। हथेली जलने लगी, पर मैंने हटाया नहीं।
"मोती की बात आपने टाल दी," मैंने कहा। "क्यों?"
चाचा ने चम्मच रख दिया। फिर वो मेरी तरफ़ देखे। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी। डर नहीं। शर्म नहीं। कुछ उलझा हुआ — जैसे कोई आदमी एक ही वक़्त में दो जगह खड़ा होना चाहता हो।
"क्योंकि तू अभी इस शहर का नहीं हुआ है," बोले। "यहाँ पहले आदमी को देखा जाता है, फिर बात को। तेरी बात सुनने वाला कोई नहीं। तेरी बात सुनने से पहले वो ये देखेंगे कि तू कौन है।"
"और मैं कौन हूँ?"
चाचा मुस्कुराए। पर वो हँसी नहीं थी। वो बस होंठों का एक काम था।
"तू अभी वो है जिसको कोई नहीं पूछता," बोले। "चल। देर हो रही है।"
गैराज बस्ती से बाहर था। पैदल जाना पड़ता था, और पैदल जाने में हमें बीस मिनट लगे। रास्ते में चाचा कुछ नहीं बोले। बस एक बार पीछे मुड़कर देखा। फिर दोबारा। तीसरी बार देखा तो मैंने पूछा, "किसको ढूँढ रहे हो?"
"किसी को नहीं," बोले। "आदत है।"
यादव मोटर गैराज का गेट लोहे का था, और उस पर पीले रंग से नाम लिखा था। पीला रंग अब उतर रहा था, और नीचे से जंग का भूरा रंग झाँक रहा था। गेट खोला तो अंदर से वो महक आई जो मैं बचपन से जानता था। तेल, धूल, पुराना पसीना और गरम लोहे की गंध।
अंदर टायरों का ढेर था। कुछ में हवा थी, कुछ पिचके पड़े थे, और एक टायर ऐसा था जिसका आधा हिस्सा खाया हुआ था, जैसे किसी जानवर ने कुतर दिया हो। दीवार पर औज़ार टँगे थे — पाना, हथौड़ा, चिमटा, और एक बड़ी रिंच जिसका हैंडल तार से बँधा था, क्योंकि वो कई बार फिसल चुका था।
दीवार पर एक पुराना कैलेंडर लगा था। उसका पन्ना दो साल पहले का अटका हुआ था। चित्र में एक गाड़ी थी, नीली पहाड़ी सड़क पर, और नीचे बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था। ऊपर से कोई नाम काट दिया गया था, सिर्फ़ कैंची के निशान बचे थे।
मैंने कैलेंडर को देखा और मुझे पापा याद आ गए। उनके गैराज में भी ऐसा ही कैलेंडर लटका था, और वो कभी पन्ना नहीं बदलते थे। कहते थे, समय खुद बदल जाता है, कैलेंडर क्यों बदलें।
"अर्जुन!"
चाचा ने आवाज़ दी। बाहर, गेट पर एक ट्रक खड़ा था। मरून रंग, धूल से ढका, आगे का बंपर टेढ़ा, और एक हेडलाइट पर टेप चिपका हुआ।
ड्राइवर मोटी तोंद वाला आदमी था। उसकी शर्ट पर पसीने की सफ़ेद लकीरें थीं और हाथ में एक कटोरा था जिसमें पान था।
"महेंद्र भाई," उसने कहा, "ये गाड़ी मेरी जान खा रही है। सुबह से खाँस रही है। जैसे बूढ़ा आदमी हो, जिसको दमा हो गया हो।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर बोले, "अर्जुन, तू सुन ले।"
मैं ट्रक के पास गया। इंजन चालू था। मैंने हाथ उसके बोनट पर रखा। गरम था। मैंने आँख बंद की।
पहले मैंने वो सुना जो सब सुनते हैं — इंजन का शोर। उसके बाद वो जो सब सुनते हैं और समझते नहीं — एक हल्की सी घरघराहट, जो शोर के नीचे छिपी थी।
फिर, बहुत ध्यान से सुनने पर, मुझे वो तीसरी आवाज़ मिली। हवा का रिसाव। बहुत पतला। जैसे किसी सुई में से भाप निकल रही हो।
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