A Dark Secret16 / 536

A Dark Secret – Chapter 16

7 min read November 6, 2026

बस मुस्कुरा दिया। मेरी मुस्कान देखकर चाचा ने गर्दन से हाथ हटाया और ज़ोर से हँसे।

"देख, देख! हँस रहा है। बिलकुल अपने पापा जैसा।" उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया। "रघुवीर भी ऐसे ही हँसता था। जब वो हँसता था, तो लगता था मामला निपट गया। पर निपटता कुछ नहीं था।"

वो आख़िरी वाक्य उन्होंने बहुत हल्के से कहा, जैसे अनजाने में मुँह से निकल गया हो। और फिर तुरंत ही उन्होंने मुझे घसीटा — "चल, चल, ये गली छोड़।"

हम मुड़े।

कंधा बस्ती का मुँह एक संकरी गली थी जिसके ऊपर बिजली के तार ऐसे लटके थे जैसे किसी ने काली रस्सियाँ सुखा दी हों। दोनों तरफ़ टीन की छतें, कुछ पर पत्थर रखे हुए ताकि हवा उड़ा न ले। बीच में नाली बह रही थी और नाली के किनारे ईंटें रखी थीं ताकि लोग पैर रख सकें।

गली में आवाज़ें थीं — किसी के यहाँ तवा चढ़ रहा था, किसी के यहाँ बच्चा रो रहा था, कोई औरत किसी को बुला रही थी, और इन सब के ऊपर हर दो मिनट में टोल की सीटी।

"ये बस्ती है," चाचा ने कहा, जैसे किसी इमारत की तारीफ़ कर रहे हों। "यहाँ किराया कम है, भईया। कम का मतलब — कम। ऊपर वाला कमरा खाली था। मैंने कह दिया, मेरा भतीजा आ रहा है। मालिक ने पूछा, कौन? मैंने कहा, रघुवीर का बेटा। और उसने बिना पैसा पूछे चाबी दे दी।" उन्होंने जेब से चाबी निकाली और हवा में घुमाई। "देख, तेरे पापा का नाम यहाँ भी काम करता है।"

गली के मोड़ पर एक पुराना ढोल पड़ा था, उलटा, और उस पर एक लड़का बैठा था।

पतला, नंगे पाँव, घुटने पर पुरानी चोट का निशान, और हाथ में एक टूटा हुआ प्लास्टिक का शीशा जिसमें वो टोल की तरफ़ देख रहा था। उसके होंठ हिल रहे थे। वो कुछ गिन रहा था।

मैंने उसे देखा। वही नंगे पाँव वाला लड़का। वही, जिसने मेरी जेब में हाथ डाला था।

वो मेरी तरफ़ देख भी नहीं रहा था। वो बस गिन रहा था।

"ओए जुगनू!" चाचा ने ज़ोर से कहा। "घर जा, तेरी माँ ढूँढ रही है।"

लड़के ने सिर उठाया, मुझे देखा — एक पल, दो पल — और फिर ढोल से उतरकर गली में घुस गया। भागा नहीं। बस चला गया, जैसे उसने मेरा चेहरा याद कर लिया हो।

"ये लड़का सुबह से शाम तक नाके पर बैठा रहता है," चाचा ने सिर हिलाया। "इसके बाप को जानता था मैं। अच्छा ड्राइवर था। मर गया।" उन्होंने गुटखा मुँह में डाला। "इस शहर में अच्छे आदमी ज़्यादा नहीं चलते, भईया।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

कमरा दूसरी मंज़िल पर था, सीढ़ियाँ लोहे की, और हर सीढ़ी पर पैर रखने से आवाज़ आती थी — ठक, ठक — जैसे कोई ज़ख़्मी आदमी सीढ़ी चढ़ रहा हो।

दरवाज़ा खुला।

कमरा छोटा था। एक चारपाई, एक पंखा जो छत से ऐसे लटका था जैसे थक गया हो, एक लोहे की अलमारी जिसका दरवाज़ा पूरा बंद नहीं होता था, और खिड़की के बाहर टीन की छत जिस पर अगली इमारत की दीवार का साया पड़ रहा था।

"पानी की टंकी ऊपर है," चाचा ने कहा। "बाथरूम नीचे है, बगल वाले से बाँटना पड़ेगा। वो आदमी ठीक है, बस सुबह जल्दी उठता है और हर किसी को बताता है कि वो जल्दी उठता है।"

मैंने बैग चारपाई पर रखा।

"और छत?" मैंने पूछा।

"छत खुली है।" चाचा ने खिड़की से बाहर इशारा किया। "रात में लोग वहीं सोते हैं। गर्मी में कमरे के अंदर दम घुटता है। पर सुन, बारिश आए तो भीतर आ जाना। यहाँ बारिश में टीन ऐसी बजती है कि नींद खुल जाए और फिर वो बजती रहती है, जैसे किसी को बुला रही हो।"

वो दरवाज़े के पास खड़े थे। उन्होंने जेब में हाथ डाला, कुछ निकाला, फिर वापस रख दिया।

"चाचा," मैंने कहा।

"हाँ भईया।"

"मोती ट्रक।"

उनका चेहरा नहीं बदला। बस आँखें एक पल के लिए टेढ़ी हुईं, जैसे किसी ने अंदर से दरवाज़ा बंद कर दिया हो।

"क्या मोती ट्रक?"

"कल रात बाईस नंबर टोल पर पलट गया। बलदेव सिंह का। ड्राइवर कह रहा था कि ब्रेक सोलह तारीख़ को यादव मोटर गैराज में खुलवाए गए थे। आपके यहाँ।"

चाचा ने गुटखा चबाया। धीरे-धीरे।

"बहुत लोग आते हैं, भईया।" उन्होंने कहा। "मैं हर आदमी का नाम याद नहीं रखता।"

"उसने कहा कि महेंद्र भाई ने खुद देखा था।"

"तो मैंने देखा होगा।" उनका लहज़ा अब भी वैसा ही था, पर अब उसमें वो चीज़ नहीं थी जो सुबह थी — वो लाड। "पर सुन मेरी बात।"

वो मेरे करीब आए। बहुत करीब। उनकी साँस में गुटखा और चाय दोनों थे।

"ये शहर गाड़ियों का शहर है। यहाँ रोज़ कोई गाड़ी पलटती है। रोज़ कोई आदमी मरता है। कोई रोता है, कोई बीमा का काग़ज़ भरता है, कोई अगले दिन फिर गाड़ी पर बैठ जाता है। यही चलता है। जो आदमी यहाँ ज़्यादा सुनता है, वो जल्दी मरता है।"

वो एक पल रुके।

फिर हँसे। ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि खिड़की का काँच हिला।

"अरे मज़ाक कर रहा हूँ, भईया! तू तो डर गया!" उन्होंने मेरा सिर सहलाया। "मैं क्या कह रहा था — मोती वाला मामला छोड़ दे। वो बल्लू है, थोड़ा घबराया हुआ आदमी है। हर हादसे में ड्राइवर ऐसी बातें करता है। ट्रांसपोर्ट का धंधा है, होता है।"

"हाँ," मैंने कहा।

"हाँ ही कह।" उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। "मैं नीचे हूँ। गैराज पर। शाम को आ जाना, खाना खा लेना। चाची ने कहा है। और सुन—"

"हाँ चाचा।"

"पैसा है कुछ?"

"है।"

"कितना?"

मैंने कहा नहीं, पर वो रुक गए। जवाब माँग रहे थे।

"चार सौ," मैंने कहा।

वो हँसे। "चार सौ! भईया, दिल्ली में चार सौ से तेरी गाड़ी का एक टायर नहीं आता।" उन्होंने जेब में हाथ डाला, फिर रोक लिया, फिर डाल ही दिया और दो नोट निकाले। "ले। दो हज़ार। जब हो जाए, दे देना। चाचा-भतीजे में हिसाब नहीं होता।"

मैंने नोट लिए। मैंने उनका हाथ नहीं छुआ। मैंने सिर्फ़ नोट लिए और उन्हें जेब में रखा।

वो गए। सीढ़ियों पर उतरते हुए ठक, ठक, ठक।

मैं चारपाई पर बैठा रहा।

मेरी जेब में चार सौ रुपये और दो हज़ार थे, और रुमाल में दो कटे तार। मैंने रुमाल खोला और उन्हें देखा। बड़ा टुकड़ा उँगली जितना, छोटा नाखून जितना। दोनों के छोर साफ़। किसी ने काटा था, फाड़ा नहीं। काटने वाला आदमी जानता था कि कहाँ काटना है, क्योंकि टूटी केबल शोर करती है और कटी केबल चुप रहती है।

मैंने रुमाल में तेल की बूँदें देखीं और अपनी जेब में उसी वक़्त महसूस किया — बैग में चाचा के औज़ारों वाला रुमाल भी ऐसा ही था। तेल में डूबा। बिलकुल ऐसा ही।

मैंने रुमाल बंद किया।

शाम हो रही थी। कमरे में उजाला पीला पड़ रहा था और पंखा मेरी तरफ़ हवा नहीं फेंक रहा था, बस घूम रहा था। मैंने खिड़की खोली।

पूरा शहर आ गया।

पहले मुझे लगा शोर है। फिर मैंने आँख बंद की और शोर टूटने लगा।

टोल की सीटी — हर दो मिनट में। एक ट्रक जो पुराना था, उसके इंजन में घरघराहट थी जैसे किसी के सीने में कफ़ बैठा हो। एक छोटी गाड़ी थी जिसकी बेल्ट चरमराती थी — वो बेल्ट अगले महीने टूटेगी, मैंने मन में कहा, और उसका मालिक अभी कुछ नहीं जानता। एक ट्रक था जिसके पहिये में हवा कम थी, वो हर बार सड़क के जोड़ पर एक हल्की थप देता था। और दूर, बहुत दूर, किसी गाड़ी का मफ़लर फटा था — खाँसी जैसी आवाज़।

बोलेरो।

मैंने आँखें खोलीं और खिड़की से बाहर देखा। गली खाली थी। आवाज़ दूर थी, किसी और रास्ते पर।

मैंने खिड़की बंद की और सीढ़ियों से ऊपर छत पर चला गया।

छत पर पानी की टंकी थी, रस्सी पर दो कपड़े सूख रहे थे, और एक कोना ऐसा था जहाँ ईंटों पर पुरानी चटाई बिछी थी। वहीं लोग सोते थे।

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