A Dark Secret15 / 299

A Dark Secret – Chapter 15

7 min read November 6, 2026

मैं उस चायवाले के पीछे चला।

मेरे पीछे क्रेन ने ट्रक को और ऊपर उठाया। धूल फिर उठी। और मैं उस धूल के बाहर निकलकर चलने लगा — उस पतली गली की तरफ़, जहाँ नीली शर्ट वाला आदमी अपनी चाय की केतली जलाने जा रहा था।

॥

चायवाले का ढाबा उस पतली गली के मोड़ पर था, जहाँ से टोल नाके की आवाज़ आती थी — हर दो मिनट में एक ठक, और फिर लंबी सीटी।

मैं उसके पीछे-पीछे गया। वो चलता रहा, पीछे मुड़कर नहीं देखा, बस एक बार बेंच की तरफ़ इशारा किया और खुद केतली उठाने लगा।

मैं बैठ गया।

वो आया, मेरे सामने गिलास रखा, चाय डाली, और बिना देखे बोला, "तेरे हाथ काँप रहे हैं।"

"भूख से," मैंने कहा।

"भूख से हाथ काँपते तो सब मज़दूर रोज़ गिर पड़ते।" उसने अपनी उँगली से मेरी कलाई की तरफ़ इशारा किया। "ये डर है। डर ख़त्म करना है तो पहले सवाल ख़त्म कर।"

"सवाल किसका?"

"जो तू सुबह से अपने सिर में घुमा रहा है।"

मैंने चाय का घूँट लिया। कड़क थी, चीनी कम। मेरे जैसे के लिए ठीक थी, क्योंकि मेरी जेब में चार सौ रुपये थे और उसमें से दस रुपये की चाय काटना आसान था, पंद्रह की नहीं।

"दस रुपये," मैंने कहा और सिक्के गिनकर रख दिए।

उसने सिक्के उठाए, जेब में डाले, और मेरे बगल में बेंच पर बैठ गया। दोनों हाथ घुटनों पर रखे। नाखूनों के नीचे काली लकीरें, जैसी मेरे हाथों में हैं।

"मेरा नाम सलीम है," उसने कहा। "पर यहाँ लोग नीली शर्ट वाला ही कहते हैं। क्योंकि मेरे पास दो ही शर्ट हैं और दोनों नीली हैं।"

"अर्जुन," मैंने कहा।

"पता है।" उसने चाय का गिलास उठाया। "कल रात से पहले तेरा नाम कोई नहीं जानता था। आज सुबह से तीन आदमी पूछ चुके हैं।"

मेरे हाथ फिर काँपे और मैंने गिलास ज़ोर से पकड़ लिया।

"कौन तीन?"

"एक तो वो ही काली माला वाला। दूसरा — एक आदमी जो बोलेरो से आया, नीचे नहीं उतरा, खिड़की से पूछा। तीसरा—" वो रुका। "तीसरा इंस्पेक्टर साहब का हवलदार, जो यहाँ बैठकर दो चाय पी गया और कुछ नहीं बोला।"

"बोलेरो वाला कैसा दिखता था?"

"काली खिड़की थी।” उसने कंधे उठाए। "पर गाड़ी की आवाज़ साफ़ आती है। उसका मफ़लर फटा है। जब वो जाता है, तो लगता है कोई खाँसकर चला गया।"

मैंने वो बात मन में लिख ली। फटा मफ़लर। जिस दिन वो बोलेरो मेरे सामने आएगी, मैं उसे आवाज़ से पहले पहचान लूँगा।

"अब तू मेरी एक बात सुन," सलीम ने गिलास नीचे रखा। "मैं इस गली में ग्यारह साल से केतली जला रहा हूँ। मैंने यहाँ से किसी को नहीं पकड़वाया, किसी को बचाया भी नहीं। मेरा काम चाय है, पुलिस का काम पूछताछ। पर आज सुबह जो हुआ, वो मेरे सामने हुआ, और मैं आँख बंद करके नहीं जी सकता।"

"क्या हुआ?"

"तेरी जेब में हाथ किसी ने डाला।"

मेरी साँस रुक गई।

"मैंने देखा," उसने कहा। "तू ट्रक के पीछे गया था, दरवाज़ा खोला, फिर बाहर आया। भीड़ धक्का खा रही थी। क्रेन ऊपर उठी। धूल उठी। उसी वक़्त तेरे बगल में एक लड़का आया — छोटा, पतला, बिना जूते। उसने तेरी कमीज़ के नीचे हाथ सरकाया और तुरंत हट गया।"

"लड़का?"

"नंगे पाँव वाला। ग्यारह बरस का होगा। जुगनू कहते हैं उसे।"

मैंने उसे देखा। "वो मेरी जेब में तार क्यों डालेगा?"

"वो मैं नहीं जानता।" सलीम ने मेरी आँखों में देखा। "पर मैं इतना जानता हूँ — वो लड़का इस नाके पर सुबह से रात तक बैठा रहता है। कौन सा ट्रक कब निकला, कौन सा ड्राइवर किस ढाबे पर चाय पीता है, किसकी बोलेरो रात में दो बार आई — ये सब उसे मुँहज़बानी याद है। उसका कोई काग़ज़ नहीं, कोई दुकान नहीं। बस उसका सिर।"

"वो कहाँ मिलेगा?"

"गली के मोड़ पर, ढाबे के पीछे, एक पुराना ढोल पड़ा है। उस पर बैठता है।" उसने उठते हुए कहा। "पर एक बात याद रख। उस लड़के की माँ कबाड़ छानती है और उसका बाप ड्राइवर था जो दो साल पहले मर गया। अगर तू उससे सवाल पूछेगा, तो वो जवाब देगा — पर उसके बदले में वो तुझसे कुछ माँगेगा।"

"क्या?"

"वो बच्चा पैसा नहीं माँगता।" सलीम ने केतली की तरफ़ चलते हुए कहा। "वो हर किसी से एक ही चीज़ माँगता है — कि उसकी बात किसी बड़े आदमी तक पहुँचे।"

मैं उठा। मेरे पैरों के नीचे सूखी धूल थी और धूल में चाय की बूँदें गिरी थीं जो अब तक नहीं सूखी थीं।

"एक बात और," सलीम ने पीछे से कहा, बिना मुड़े। "कल सुबह दस बजे गोदाम के पीछे वाले कमरे में न जाना।"

मैं रुक गया। "क्यों?"

"क्योंकि वहाँ से लोग बाहर आते हैं, पर अपनी गाड़ी लेकर नहीं।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि गली के मुहाने से एक आवाज़ आई — इतनी बड़ी कि चाय की केतली की खौलती आवाज़ भी उसमें दब गई।

"अरे! अरे मेरा भतीजा! ओए अर्जुन!"

मैं मुड़ा।

महेंद्र चाचा आ रहे थे। मोटा शरीर, फूली हुई चाल, कमर पर हाथ, और चेहरे पर ऐसी मुस्कान जैसे बरसों बाद मिले हों — जबकि कल रात ही उनसे फ़ोन पर बात हुई थी और उन्होंने कहा था कि स्टेशन से खुद आ जाना, मैं व्यस्त हूँ।

उन्होंने मेरा बैग उठा लिया, बिना पूछे।

"तू आ गया! मैंने सोचा कहीं भटक न गया हो। ये शहर है भईया, यहाँ आदमी रास्ता नहीं, गाड़ी का नंबर पूछता है।" उन्होंने बगल में मुझे खींच लिया और कंधे पर हाथ रख दिया। उनके हाथ में गुटखे की महक थी और शर्ट पर कल की कॉफ़ी की बूँदें।

"चाचा," मैंने कहा। "आपने कहा था आप व्यस्त हो।"

"व्यस्त था, भईया, व्यस्त था। पर भतीजा आए और चाचा व्यस्त रहे — ये मेरे पापा ने नहीं सिखाया।" उन्होंने मेरा बैग दूसरे कंधे पर डाला और आगे बढ़ गए। "चल, चल। धूप तेज़ हो रही है।"

मैं उनके पीछे चला।

सलीम ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो केतली में पानी डाल रहा था, जैसे उसने आज सुबह किसी से कोई बात ही नहीं की।

चाचा बोलते हुए चल रहे थे। रुकते नहीं थे। एक सवाल का जवाब देते, फिर बिना साँस लिए दूसरी बात शुरू कर देते।

"तेरी चाची ने तो खिचड़ी बनाई थी, बोली भतीजा आएगा। मैंने कहा, रहने दे, पहले मेरा भतीजा आए, फिर खिचड़ी।" — और फिर तीन कदम बाद — "ये सड़क देख, यहाँ से टोल तक सीधा रास्ता है। सीधा मतलब — क़स्बे वाला सीधा। दिल्ली वाला नहीं। दिल्ली वाला यहाँ हर रास्ते में एक भीड़ ढूँढ लेता है।"

"चाचा, रामलाल चाचा की बात करनी है। वो कल रात से—"

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। ज़ोर से। उँगलियाँ मोटी थीं और पकड़ ऐसी जैसे कोई बच्चे को सड़क पार करा रहा हो, जबकि हम खाली फुटपाथ पर खड़े थे।

"भईया, तेरे पापा ने मेरे लिए ज़मीन दी थी।" उनकी आवाज़ अचानक नरम हो गई। "जब मेरे पास कुछ नहीं था। तब ये गैराज नहीं था, सिर्फ़ एक टीन की छत थी और उसके नीचे दो पुराने टायर। तेरे पापा ने कहा था, महेंद्र, ये ज़मीन तेरी है, बस एक शर्त है — तू मेरे बेटे को कभी भूखा मत सोने दे।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

उनका दूसरा हाथ गर्दन के पीछे चला गया और उन्होंने उसे रगड़ना शुरू कर दिया। रगड़ते हुए वो आगे देख रहे थे, मेरी तरफ़ नहीं।

"चाचा," मैंने धीरे से कहा। "पापा ने ज़मीन कब दी थी?"

"बहुत पहले, भईया। बहुत पहले।" हाथ गर्दन पर ही रहा। "तू छोटा था। तुझे क्या याद रहेगा।"

मुझे याद था। पापा के पास ज़मीन नहीं थी। घर के पीछे सिर्फ़ एक बीघा खेत था, जो अम्मा के नाम था और अम्मा उसे बेचने की बात सुनकर भी रो पड़ती थीं। पर मैंने कुछ नहीं कहा।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho