A Dark Secret191 / 536

A Dark Secret – Chapter 191

7 min read November 6, 2026

वो रिकॉर्डर वहाँ से उठा लिया गया था। इतनी सफ़ाई से उठाया गया था कि धूल भी इधर-उधर नहीं हुई। बस जगह खाली छूट गई।

मैं उस चौकोर निशान के पास घुटनों के बल बैठ गया।

अंदर से आवाज़ आई।

“अर्जुन भैया?”

जुगनू दरवाज़े के पीछे, दीवार से चिपका खड़ा था। उसने अपनी टूटी पतंग सीने से लगा रखी थी, दोनों हाथों से, जैसे कोई ढाल पकड़ी हो। उसके नंगे पाँव पर धूल थी और घुटने का पुराना निशान आज लाल दिख रहा था।

“तू यहाँ क्यों खड़ा है? नीचे क्यों नहीं गया?”

“डर लग रहा था।” उसकी आवाज़ पतली थी, फिर भी काँप नहीं रही थी। “और मुझे लगा अगर मैं यहीं रहूँगा तो कोई और आएगा तो मैं देख लूँगा।”

“कौन आया था?”

जुगनू ने पतंग को और कसकर दबाया।

“दो आदमी। सफ़ेद कुर्ता। एक पतला था, चश्मा था, चश्मे का एक काँच चटका हुआ था। दूसरा मोटा नहीं था, पर बड़ा था — कंधे बहुत चौड़े। हाथ में काला थैला था।”

“कब आए?”

“सुबह भी आए थे। तब मैंने तुझे बताया नहीं, क्योंकि तब मुझे लगा वो कोई चाचा के जानने वाले होंगे। वो खाली हाथ गए थे। तीन जगह देखी और चले गए।”

“तीन जगह?”

“अलमारी का पेंदा। तकिया। और छत के कोने वाला टिन का बक्सा।” जुगनू ने उँगली से तीन जगहें दिखाईं, बिल्कुल वैसे जैसे कोई स्कूल में नक्शा बनाता है। “फिर शाम को दोबारा आए। इस बार एक आदमी बाहर खड़ा रहा और दूसरा अंदर आया। उसने कुछ नहीं तोड़ा। बस उस कोने से वो काला डिब्बा उठाया, कपड़े में लपेटा, और सीधा नीचे उतर गया।”

“तूने कुछ कहा?”

“मैंने नहीं कहा। मैं पानी की टंकी के पीछे छिप गया था।” जुगनू ने एक साँस ली। “पर जाते वक़्त पतले आदमी ने मुझे देख लिया। उसने पूछा — यहाँ कौन रहता है?”

“तूने क्या कहा?”

“मैंने कहा, कोई नहीं रहता। ये कमरा खाली है।”

मैंने जुगनू की तरफ़ देखा। ग्यारह साल का लड़का, नंगे पाँव, टूटी पतंग सीने से लगाए, और उसने शहर के सबसे डरावने आदमियों के सामने सीधा झूठ बोला था — मेरी हिफ़ाज़त के लिए।

“और उसने क्या कहा?”

“उसने हँसा नहीं। बस इतना कहा — अच्छा। और फिर उसने मेरे सिर पर हाथ रखा।” जुगनू ने अपने बालों को छुआ, जैसे अब भी वो हाथ वहाँ हो। “उसकी उँगली में सोने की अंगूठी थी। बहुत भारी। मेरे सिर पर लगी तो लगा जैसे कोई ठंडा पत्थर रख दिया हो।”

“गाड़ी कौन सी थी?”

“भूरी बोलेरो। मैंने आवाज़ पहचानी। साइलेंसर फटा हुआ है। खड़ी करते वक़्त एक चटक आई थी, और जाते वक़्त भी।”

मैंने आँखें बंद कीं।

भूरी बोलेरो। फटा साइलेंसर। वही जो सुबह मेरी गली में आई थी और जिसमें बैठा आदमी मीठी आवाज़ में मुझे बेटा कह रहा था।

मैं उलटी चारपाई पर बैठ गया। उसकी रस्सियाँ मेरी जाँघ के नीचे दबीं और चरचराईं।

जुगनू मेरे सामने फ़र्श पर बैठ गया, पतंग गोद में।

“भैया, वो डिब्बा क्या था?”

“रिकॉर्डर था। टेप रिकॉर्डर।”

“उसमें क्या था?”

मैंने कुछ देर सोचा। क्या बताऊँ? कि उसमें मेरे पापा की आवाज़ थी और मैंने वो आवाज़ कभी सुनी ही नहीं?

“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर वो अब नहीं है।”

“तो कोई और भी उसे ढूँढ रहा है,” जुगनू ने कहा, बिल्कुल सपाट आवाज़ में, जैसे नतीजा बता रहा हो।

“हाँ।”

“मतलब वो चीज़ ज़रूरी है।”

“बहुत ज़रूरी है।”

जुगनू ने अपनी पतंग की डोर की गिरह देखी और फिर बोला, “भैया, मैं एक बात कहूँ?”

“कह।”

“अगर वो दोबारा आएँ, तो मैं उन्हें कुछ नहीं बताऊँगा। पर मैं ये भी नहीं कहूँगा कि कोई नहीं रहता। मैं कहूँगा कि भैया गए हैं काम पर, और वो आदमी जो सफ़ेद कुर्ता पहनता है, उसके पापा का कर्ज़ अभी बाकी है।”

मैं हँसा। पहली बार उस दिन हँसा। छोटी सी हँसी, जो गले से निकली और वहीं रुक गई।

“तू खतरनाक आदमी बन रहा है, जुगनू।”

“देखने में तो तू भी सीधा लगता है,” उसने कहा, और हम दोनों चुप हो गए।

मैं उठा और एक-एक चीज़ देखने लगा कि क्या-क्या गया है।

मेरी सिली कॉपी नहीं गई थी — वो मेरे पास थी, हमेशा की तरह जेब में नहीं, थैले में। थैला कमरे में पड़ा था और उसे किसी ने नहीं खोला। यही सबसे अजीब बात थी। उन्होंने थैला छुआ तक नहीं। उन्हें काग़ज़ नहीं चाहिए थे। उन्हें सिर्फ़ वो एक चीज़ चाहिए थी जो कोने में धूल में पड़ी थी।

मतलब काग़ज़ वाले सब सबूत उनके हिसाब से बेकार थे। और वो चीज़, जो मैंने नौसादर की महक में दबी पाई थी, वो उनके हिसाब से जान का सवाल थी।

मैंने छत के कोने में पड़ा टिन का बक्सा खोला। खाली। उसकी तली में चीनी की चीटियाँ थीं और एक पुराना रबर का छल्ला।

फिर मैंने दीवार पर टँगे पापा के बिना काँच के फ्रेम को देखा। वो अब भी वहीं था। किसी ने उसे नहीं छुआ। इसका मतलब साफ़ था — उन्हें पता था कि क्या लेना है, और क्या छोड़ना है।

मैंने फ़ोन निकाला। एक सौ बारह की बैटरी बची थी। स्क्रीन पर समय आठ बजकर इकतालीस मिनट।

मैंने कलाई पर पापा की घड़ी देखी। आठ बजकर उनचास मिनट।

आठ मिनट आगे।

हमेशा आगे।

मैंने आँखें बंद कीं और एक बात सोची जो मुझे अंदर से चीर रही थी।

वो टेप मैंने सुना नहीं।

इतने दिन उस रिकॉर्डर को मैंने धूल में से निकाला, अपने हाथों से साफ़ किया, उसका ढक्कन खोया हुआ देखा, उसका पीला लेबल पढ़ा — “जो इसे सुने, वो अकेला न सुने” — और फिर मैंने उसे वापस रख दिया।

क्योंकि डर था। क्योंकि मुझे लगा कि पापा की आवाज़ सुनकर मैं वो आदमी नहीं रहूँगा जो आज हूँ।

और अब वो आवाज़ मेरे हाथ से जा चुकी थी। किसी कपड़े में लिपटी, किसी काले थैले में, किसी भूरी बोलेरो की डिग्गी में।

मेरी छाती में एक चीज़ ऐसी हुई जैसे कोई ट्रक का पिछला पहिया खिसक जाए।

मैंने जुगनू से कहा, “तू जा, नीचे चाची के पास बैठ। अगर चाची पूछे तो कहना कि छत पर कुछ नहीं हुआ।”

“कुछ नहीं हुआ?” जुगनू ने फ़र्श पर पड़ी फटी लकड़ियों की तरफ़ देखा।

“कुछ नहीं हुआ,” मैंने दोहराया।

वो उठा, दरवाज़े तक गया, फिर रुका।

“भैया, एक बात। उस पतले आदमी की घड़ी सीली हुई थी। मुझे दिखी, जब उसने मेरे सिर पर हाथ रखा। उसका पट्टा दो जगह से सिला हुआ था और नीचे का चमड़ा बहुत साफ़ था।”

“साफ़?”

“हाँ। जैसे वो घड़ी दस साल से एक ही जगह बैठी हो और कभी हिली ही न हो।”

जुगनू चला गया।

मैं कमरे में अकेला रह गया, धूल के उस चौकोर निशान के सामने।

मैंने अपनी जेब से फ़ोन निकाला और एक चीज़ देखी — कबीर की रिकॉर्डिंग। वो अभी भी अंदर थी। कम से कम ये एक चीज़ बची थी।

और मैंने सोचा — अगर उन्हें ये पता चले कि मेरे पास कबीर की आवाज़ है, तो वो अगली बार कमरे में आकर मेरा फ़ोन भी उठा ले जाएँगे। और शायद मेरा हाथ भी।

तभी मेरा फ़ोन बजा।

रुक्मा दीदी।

मैंने उठाया। पहले तो कुछ सुनाई नहीं दिया, सिर्फ़ ढाबे का शोर — तवे की छनक, कटोरों की खनक, किसी का हँसना।

फिर उसकी आवाज़ आई, और वो आवाज़ मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।

“अर्जुन।”

“दीदी बोलो।”

“तू कहाँ है?”

“कमरे पर।”

“सुन।” उसने एक लंबी साँस ली, जैसे कुछ भारी चीज़ उतार रही हो। “अभी ढाबे पर आ जा। अकेला आ। नैना को मत बता। जुगनू को भी मत बता।”

“क्या बात है दीदी? तबीयत ठीक है?”

“तबीयत ठीक है,” उसने कहा। “पर आज तेरे लिए एक चीज़ रखी है जिसे तू अपनी आँख से देख ले। कान से नहीं, आँख से। समझा?”

“समझ गया।”

“और अर्जुन।”

“हाँ।”

“आते वक़्त अपना मुँह बंद रखना। जो देखे, वो मुँह से मत निकलने देना। बाद में बोलना।”

फ़ोन कट गया।

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