A Dark Secret – Chapter 190
मैंने सांस भरी और कहा, पर आज से यहाँ मेरा हिसाब बंद है।
उसने कुछ कहना चाहा। मैंने हाथ उठाया। मेरा हाथ उसकी तरफ़ नहीं उठा। मैंने सिर्फ़ दुकान का दरवाज़ा खोला। वो टिन का आधा फाटक ज़ोर से खुला और रात की हवा अंदर आई, धूल के कण हिले और बल्ब एक बार झुककर वापस हुआ।
मैंने कहा, पुर्ज़ों का हिसाब जो बाकी है, वो मैं भेज दूँगा। एक-एक पैसा। तूने मुफ़्त में जो दिया, वो सब जोड़ लेना, तेरे हिसाब से। मेरे हिसाब से नहीं, तेरे हिसाब से। और फिर हम दोनों बराबर।
उसने कहा, अर्जुन।
मैंने कहा, नहीं सुनूँगा।
उसने कहा, सुन ले। मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ।
मैंने कहा, तू मेरा दुश्मन नहीं है, ये सच है। और यही सबसे बड़ी बात है। अगर तू दुश्मन होता तो मैं आज रात सो जाता। पर तू वो आदमी है जिसने मेरे साथ आठ महीने चाय पी और हर सुबह अपने बाप को फ़ोन करके बताया कि मैं सो गया या जाग रहा हूँ। तेरे दुश्मन होने से मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। तेरे दोस्त होने से पड़ता है।
वो खड़ा रहा।
मैंने कहा, और आख़िरी बात। मैंने ये बातचीत रिकॉर्ड की है। मेरी जेब में फ़ोन है और वो चल रहा है।
उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा। मुझे लगा वो भड़केगा, चीखेगा, कहेगा कि ये धोखा है।
पर उसने कुछ और किया। उसने अपना गिलास उठाया, बाक़ी चाय एक साँस में पी और फिर साफ़ आवाज़ में, मेरी तरफ़ देखकर, धीरे-धीरे बोला — मेरा नाम अमरदीप ठाकुर है। मेरे बाप का नाम देवेंद्र ठाकुर है। मुझे उसने गाड़ी महल में इसलिए बैठाया था कि मैं अर्जुन यादव की हर हरकत की खबर उसे देता रहूँ। मैंने खबर दी।
फिर उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा और कहा, ये भी रिकॉर्ड हो जाए। मुझे पता है मेरे बाप के पास वकील हैं। पर आज रात मुझे कोई वकील नहीं चाहिए।
मैं वहाँ खड़ा रहा। मुझे कुछ नहीं कहना था। या कहना था और शब्द नहीं मिल रहे थे।
वो मेज़ से अपनी कॉपी उठाने लगा, फिर उसने रख दी। उसने अलमारी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। फिर वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
दरवाज़े पर वो रुका। उसने बाहर देखा, बाज़ार के अंधेरे में, जहाँ कहीं एक बल्ब जल रहा था।
और फिर उसने वो कहा जो मैंने सोचा भी नहीं था।
उसकी आवाज़ अब बिलकुल सीधी थी, जैसे किसी ने लोहे का टुकड़ा ज़मीन पर रख दिया हो।
सुन। आज सुबह करीब छह बजे मेरे पास फ़ोन आया। मैं उठा, मुँह धोया और तेरे कमरे पर गया। चाची नीचे आँगन में थीं, उन्होंने मुझे देखा और कुछ नहीं कहा। ऊपर तेरे कमरे का दरवाज़ा खुला था। अलमारी का ताला खुला था। पेंदा खोखला था और उसमें सिर्फ़ साड़ियाँ और एक पुराना बक्सा बचा था।
मेरा हाथ मेरी जेब पर चला गया। मैंने कहा, रुक। तू वहाँ क्या कर रहा था?
वो नहीं रुका। वो बोलता रहा, जैसे मुझे बताना उसके लिए ज़रूरी हो।
मैं वहाँ इसलिए गया था कि उसने भेजा था। दो आदमी थे, एक सफ़ेद कुर्ते में, एक पतला, चश्मे वाला। वो कुछ ढूँढ रहे थे और बहुत जल्दी में थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि तू कभी भी लौट सकता है।
क्या ढूँढ रहे थे?
वो तीन जगह ढूँढ रहे थे। अलमारी के पेंदे में, तेरे तकिये के नीचे और उस पुराने टिन के बक्से में जो छत के कोने में पड़ा था। सफ़ेद कुर्ते वाले ने एक जगह हाथ रखकर कहा था — ये यहाँ नहीं है। और फिर उसने एक बात कही जो मैंने सुनी।
क्या बात?
कहा — वो चीज़ मेरे पास नहीं है, वो तेरे बाप ने मेरे बाप से छिपाकर रखी थी। उसे ढूँढो। वो कहीं तेरे पास रखी है।
मेरी टाँगों के नीचे ज़मीन एक पल के लिए ढीली पड़ गई, जैसे कोई पुल का एक हिस्सा गिर गया हो।
उस चीज़ का नाम क्या लिया?
कबीर मेरी तरफ़ मुड़ा। बल्ब उसके चश्मे पर पड़ा और मुझे उसकी आँखें दिखीं — वो डरी हुई नहीं थीं, वो थकी हुई थीं, और मुझे लगा कि उसने आज रात अपने जीवन का सबसे लंबा रास्ता पैदल तय किया है।
नाम नहीं लिया। बस इतना कहा — जो तेरे बाप ने आख़िरी रात अपनी जेब में रखा था, वो अब उसके बेटे के पास है। और जब वो चीज़ मिल जाएगी, तो देवा भाई ख़ुद आएँगे, किसी को नहीं भेजेंगे।
वो फाटक से बाहर निकला और रात में उसकी एड़ी की आवाज़ दूर जाने लगी।
और मैं अकेला खड़ा रहा, दुकान के बल्ब के नीचे, हाथ में उसकी दी हुई पर्ची, जेब में चलता हुआ फ़ोन, और सिर में एक ही चीज़ — कि ऐसी कौन सी चीज़ है जो मेरे पापा ने देवा से छिपाई थी, और जिसे ढूँढने के लिए देवा ख़ुद आने की बात कर रहा है।
रजिस्टर तो मेरे पास था। वो मैंने ख़ुद पढ़ा था, अपने हाथ से लपेटा था, अपनी आँखों से हर पन्ना देखा था।
फिर वो कौन सी चीज़ थी जो रजिस्टर से भी ज़्यादा डरावनी थी?
मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी। आठ मिनट आगे।
और मुझे पहली बार लगा कि ये आठ मिनट पापा ने किसी के साथ पहले से तय किए हुए थे, और मैं हर बार उस वक़्त से आठ मिनट पीछे पहुँच रहा हूँ, जब सच मुझे छोड़कर आगे निकल जाता है।
मैंने फ़ोन निकाला और रिकॉर्डिंग बंद कर दी। फिर मैंने किसी और के फ़ोन की तरह उसे देखा — काँच पर मेरा ही चेहरा, धूल में लिपटा।
और फिर मैंने दुकान का फाटक बंद किया, ताला लगाया और चाबी अपनी जेब में नहीं, दरवाज़े की उस खुली जगह में रख दी, जहाँ से कोई भी उठा सकता था।
क्योंकि अब ये दुकान मेरी नहीं थी। और मुझे चाबी की ज़रूरत नहीं थी।
मुझे ज़रूरत थी उस सफ़ेद गाड़ी की, जो सुबह छह बजे से पहले कबाड़ बाज़ार के पीछे खड़ी थी। और उस आदमी की, जिसने पुल के नीचे शांति देवी को बुलाया था। और उस चीज़ की, जिसे मेरे पापा ने अपनी जेब में रखा था और जिसे मैं अब तक रजिस्टर समझ रहा था।
मैं चल पड़ा। बाज़ार के बाहर, सड़क पर, एक जीप गुज़री जिसका साइलेंसर फटा था और जिसकी आवाज़ मुझे कहीं सुनी हुई लगी, पर वो इतनी तेज़ी से गई कि मैं पहचान नहीं सका।
और मेरे पीछे, बंद दुकान के भीतर, रुकी हुई घड़ी अब भी दस बजकर सत्ताईस मिनट पर खड़ी थी, जैसे सारे शहर को बता रही हो कि वक़्त नहीं रुका — वक़्त रोक दिया गया था।
॥
मैं जब चाचा के घर की गली में मुड़ा तो रात काफ़ी हो चुकी थी।
गली के मोड़ पर नाली का पानी रुका हुआ था और उस पर एक कुत्ता बैठा था। मेरे पैरों की आहट से वो उठकर चला गया। टीन की छतों से बूँदें टपक रही थीं, हालाँकि बारिश नहीं हुई थी। पता नहीं किसका कूलर या किसका टपकता नल था।
मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। पहली सीढ़ी ठीक बोली। दूसरी चुप रह गई। तीसरी चरमराई।
और मैं रुक गया।
क्योंकि छत पर बत्ती जल रही थी।
मैं जानता हूँ चाची रात में ऊपर बत्ती नहीं जलाती। वो कहती है बिजली का बिल मेरी नींद से ज़्यादा महँगा है।
मैंने दो-दो सीढ़ियाँ छोड़कर ऊपर चढ़ना शुरू किया। कमरे का दरवाज़ा खुला था, पूरा खुला, जैसे किसी ने जान-बूझकर बताया हो कि अंदर आ जाओ, हमें छिपाना नहीं है।
अंदर घुसते ही पहली चीज़ जो दिखी, वो मेरी चारपाई थी — उलटी पड़ी। रस्सियाँ ऊपर, पाए आसमान की तरफ़। जैसे किसी ने चारपाई को गुस्से से नहीं, जल्दी से उठाकर फेंका हो।
दूसरी चीज़ मेरी अलमारी थी।
उसका पेंदा उखड़ा हुआ था। जो खोखला हिस्सा मैंने इतनी रात खुरचकर, छेनी से खोला था, वो अब फटे लकड़ी के मुँह जैसा दिख रहा था। अंदर से नौसादर की वो पुरानी महक आ रही थी जो अब भी मेरे पापा की बनियान से चिपकी थी।
और तीसरी चीज़।
फ़र्श पर, दीवार के कोने के पास, धूल का एक चौकोर निशान था।
बिल्कुल चौकोर। जितना बड़ा मेरा पापा का टेप रिकॉर्डर था।
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