A Dark Secret – Chapter 187
"मेरे पति," उन्होंने कहा, और फिर एक साँस। "मेरे पति उस रात भाई साहब से डरकर नहीं भाग रहे थे। वो उससे भी बड़े आदमी से डरकर भाग रहे थे। और अब मैं तुझसे वो नाम नहीं लूँगी, पर इतना बता दूँ — जब भी तेरे पापा की मौत का सवाल उठेगा, तेरे हाथ में जो काग़ज़ आए, उसे पढ़ने से पहले एक बार सोच लेना कि उस काग़ज़ पर जिसका नाम है, वो उस काग़ज़ के ऊपर है या नीचे। क्योंकि इस शहर में कुछ लोग ऊपर हैं और कुछ लोग उनके नीचे हैं, और जो सबसे ऊपर है, उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा होता।"
मैंने सोचा। मेरे दिमाग़ में नैना के तेरह काग़ज़, सात बीमा पर्चियाँ, एक लाख पचास हज़ार वाली पीली पर्ची, दो नंबर का पाना, देवा का दराज़ — सब घूम गए।
"आपका मतलब है कि मेरे पापा के पास जो रजिस्टर था, वो किसी और के लिए था?"
"मैं इतना नहीं कहूँगी," उन्होंने कहा। "पर इतना कहूँगी कि मेरे पति उस रजिस्टर से डरते थे। वो उसे रात में तकिये के नीचे रखते थे। वो उसे घर में नहीं रखते थे, गाड़ी की सीट के नीचे रखते थे, और जब घर आते तो सबसे पहले उसे देखते। अगर उस रजिस्टर के पास उन्हें पहुँचने की जगह मिली होती, तो वो उसे लेकर सीधे दिल्ली चले जाते। पर उस रात वो उसे लेकर तेरे पापा के पास जा रहे थे। और मुझे नहीं पता क्यों।"
"मुझे पापा के रजिस्टर में एक लाइन मिली," मैंने कहा। "आपके पति के नाम के आगे। वो लाइन किसी और की स्याही में लिखी थी।"
उन्होंने सिर हिलाया। "कौन सी लाइन?"
"ऊपर से।"
वो रुकीं। और उनके चेहरे पर पहली बार कुछ हिला — किसी पुराने दरवाज़े के पीछे की आवाज़।
"ऊपर से," उन्होंने दोहराया। "हाँ। यही तो। मेरे पति कहते थे कि सब कुछ ऊपर से आता है। काग़ज़ ऊपर से आता है, हुक्म ऊपर से आता है, और नाम भी ऊपर से मिटता है।"
वो चुप हो गईं। फिर उन्होंने एक हाथ से अपना पल्ला ठीक किया, और मुझे लगा वो अब उठेंगी।
"मुझे जाना होगा," उन्होंने कहा, और वो उठने लगीं पर उनके घुटने काँप रहे थे और मैंने हाथ बढ़ाया। उन्होंने मेरा हाथ थामा, धीरे से, जैसे किसी चीज़ को छूने से डरती हों, और फिर खड़ी हो गईं।
"लेकिन एक बात और," उन्होंने कहा।
वो रुकीं और मेरी तरफ़ मुड़ीं। उनका चेहरा अंधेरे में था क्योंकि सूरज पुल के उस पार चला गया था, और सिर्फ़ उनकी साड़ी सफ़ेद चमक रही थी।
"मैं तुझे बताती हूँ कि मैं क्यों आई। क्योंकि मुझे लगता है कि कबीर आज शाम तुझे वो सच बताएगा जो मैंने इक्कीस साल उससे छिपाया। और मेरा बेटा, जो इक्कीस साल से अपने बाप के लिए एक भी अच्छा शब्द नहीं बोला, वो आज पहली बार मुझे बुरा कहेगा। और मुझे पता है कि वो कहेगा — माँ, तुमने मुझे इतने साल क्यों ज़िंदा रखा अगर ये ज़िंदगी इसी का नाम थी?"
उन्होंने साँस ली।
"पर तू जानता है? मुझे इसका डर नहीं। मुझे इसका डर है कि वो मुझसे एक सवाल पूछेगा और मैं उसका जवाब नहीं दे पाऊँगी।"
"कौन सा सवाल?" मैंने पूछा।
"कि मैंने उसे उस आदमी से बचाया या उस आदमी के पास रखा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी नज़र में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले किसी की आँखों में नहीं देखा था — गुस्सा नहीं, शर्म भी नहीं, बस एक बहुत थका हुआ सवाल, जो इक्कीस साल से उनके भीतर रुका हुआ था और जिसका जवाब उन्होंने खुद को कभी नहीं दिया।
"मैंने कबीर को उस आदमी की छत्रछाया में रखा," उन्होंने कहा, बहुत धीमे, जैसे खुद को सुना रही हों। "क्योंकि मुझे लगा उसके पास रहेगा तो सुरक्षित रहेगा। क्योंकि उसके पास जो है, वो किसी को मार सकता है, पर अपने ही घर में पले लड़के को नहीं मार सकता। ये सोचकर मैंने उसे उस आदमी के पास रखा। और आज मुझे लगता है कि जो मैंने उसे बचाने के लिए किया, वो मेरे बेटे की ज़िंदगी को एक बहुत बड़े कमरे में अकेला छोड़ देने जैसा था। मैंने उसके दुश्मन के साथ उसकी रोटी बाँटी, अर्जुन। मैंने उसके दुश्मन के साथ उसको दूध पिलाया। और आज मैं तुझसे यही पूछने आई हूँ कि इसमें मैं गुनहगार हूँ या मजबूर?"
मुझे उस पल समझ नहीं आया कि क्या बोलूँ। मैं उस औरत के सामने खड़ा था जिसने इक्कीस साल अपने बेटे को उसी आदमी के पास रखा जिससे वो शादी के बाद भागी थी, और मुझसे पूछ रही थी कि क्या वो बुरी माँ थी।
मैंने कहा, "मुझे नहीं पता। पर मैं इतना जानता हूँ कि कबीर आज ज़िंदा है और ये बात कुछ मायने रखती है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने उम्मीद नहीं की थी। वो रोई। बहुत धीरे, बिना आवाज़, ऐसे रोई जैसे किसी ने बरसों से बंद नल खोल दिया हो और वो पानी अपनी रफ़्तार से बह रहा हो।
और फिर उन्होंने अपने आँचल से आँखें पोंछीं, एक बार, दो बार, और फिर सीधी खड़ी हो गईं। और मुझे लगा जैसे उन्होंने आँखों के पीछे कोई दरवाज़ा बंद किया हो।
"कबीर से," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब पहले से थोड़ी मज़बूत थी, "मेरी बात मत कहना। एक बात भी नहीं। वो मेरे साथ जो कर रहा है, करने दे। पर जानता है क्या — अगर वो जान गया कि मैं तुझसे मिली हूँ, तो वो तुझे वो सच नहीं बताएगा जो तेरे पापा ने उस काग़ज़ पर छिपाया था।"
"कौन सा सच?"
"जो शाम को वो तुझे बताएगा," उन्होंने कहा। "और उसकी शर्त है कि मैं चुप रहूँ। वो मुझसे यही कहकर गया था आज सुबह — माँ, तेरे पास कोई आए, तू बात मत करना। मुझे पता है वो तुझसे क्यों कहकर गया। वो ये चाहता है कि सच उसकी ज़ुबान से निकले, किसी और की ज़ुबान से नहीं। और अगर वो जान गया कि सच मेरे मुँह से निकला, तो वो उस सच को फाड़ देगा। और मेरा बेटा सच फाड़ने में उस्ताद है — उसने अपना ही नाम फाड़ा है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ आख़िरी बार देखा।
"तो मैं तुझसे वादा करके जाती हूँ," उन्होंने कहा। "जब वो तुझे शाम को बताएगा, तब तू मेरी बात मत बताना। और उसके बाद, जब वो बताने के बाद मुझसे मिलेगा, तब मैं तेरी कही एक बात मानूँगी — वो कुछ भी होगी, मैं मानूँगी। एक औरत को बेटे के साथ एक बात मानने की जगह मिल जाए, तो वो बहुत बड़ी चीज़ है।"
"मैं आपसे कुछ नहीं कहूँगा," मैंने कहा। "कबीर को ही बताने दीजिए। वो सच उसका है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर देखा। फिर उन्होंने सिर हिलाया, एक बार, और मुझे लगा जैसे उनके चेहरे पर एक पतली सी लकीर — जो शायद बरसों से नहीं खिंची थी — थोड़ी ढीली हुई।
"तू अपने पापा जैसा है," उन्होंने कहा। "रघुवीर भी यही कहते थे — सच वाला काम सच वाले का। और वो इसी बात पर मर गए।"
वो मुड़ीं और चलने लगीं। सफ़ेद साड़ी अंधेरे में चलती रही, जैसे कोई पुराना पर्दा हवा में उड़ रहा हो। मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने उन्हें जाते देखा, सूखी नदी के पत्थरों पर, ऊपर पुल की तरफ़ — वहाँ एक छोटी सी सीढ़ी थी जो पुल पर चढ़ती थी, और उन्होंने उस पर पाँव रखा और एक पल रुकीं।
और फिर, वो पल, जो मुझे आज तक याद है, वो रुकीं और उन्होंने पीछे मुड़कर मुझे देखा।
"अर्जुन," उन्होंने कहा। "एक बात और।"
"क्या?"
उन्होंने साँस ली।
"तेरे पापा को उस रात जो मिला था, वो मुझसे भी कह गए थे। उसी राख वाली कटोरी पर, उसी पुल के नीचे। और वो बात मैंने इक्कीस साल किसी को नहीं बताई। जिस दिन तू अपने पापा की मौत का सच पूरा जान जाएगा, उस दिन तू मुझसे आकर पूछ लेना — कि तेरे पापा उस रात यहाँ क्यों आए थे। और उस दिन मैं तुझे वो बात बताऊँगी जो मैंने किसी को नहीं बताई। समझा?"
मैंने सिर हिलाया।
वो सीढ़ी पर चढ़ गईं।
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