A Dark Secret186 / 536

A Dark Secret – Chapter 186

7 min read November 6, 2026

"पर वो जो कहता है ना — बेटा, बेटा," उन्होंने कहा। "वो सब झूठ है। वो सबसे ज़्यादा उन्हीं को 'बेटा' कहता है जिनसे सबसे ज़्यादा डरता है। मैंने इक्कीस साल में कभी नहीं देखा कि वो किसी के सामने मुस्कुराया हो और उसके भीतर मुस्कान नहीं रही हो। और मुझे ये भी पता है कि वो खुद किसके डर से जी रहा है।"

"किसके?"

वो रुकीं। उन्होंने साँस ली। फिर बोलीं, "वो नाम मैं आज नहीं लूँगी। वो नाम लेने के पैसे बहुत हैं। मेरा बेटा ज़िंदा है, इसलिए मैं नाम नहीं लेती।"

मैंने सिर हिलाया। पूछा नहीं। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनका जवाब पूरा मिलने से ज़्यादा अधूरा मिलना अच्छा है।

"आपने कहा कबीर को पता है," मैंने कहा। "कब से पता है?"

उन्होंने साँस ली। "बहुत साल से। सोलह साल से। जिस दिन मैंने कहा था, वो तीन दिन किसी से नहीं बोला। चौथे दिन मैंने देखा वो कुछ लिख रहा है। काग़ज़ पर। मैंने पूछा क्या लिख रहा है। वो बोला — मैं अपना नाम बदल रहा हूँ। मैं हँसी, फिर रोई, फिर चुप हो गई। उसने लिखा कबीर, काटा, फिर लिखा कबीर, और फिर काग़ज़ फाड़कर मुझे दिया और बोला — माँ, अब मैं वो नहीं हूँ जो तुमने पैदा किया था। मैं अब वो हूँ जो मैंने खुद बनाया है।"

मुझे कबीर की दुकान याद आई — वो टिन की दुकान, वो रुकी हुई घड़ी दस बजकर सत्ताईस मिनट पर, वो दो पेनों वाला आदमी जो हर हिसाब साफ़ रखता था और अपने ही नाम पर रोज़ झूठ बोलता था।

"पर उसने कभी उसे जीने नहीं दिया," शांति देवी ने कहा। "वो हर दिन भाई साहब का नाम ऐसे बोलता आया जैसे कोई नौकरी हो। किसी शाम मेरे पास आकर बैठता और मैं उसके चेहरे पर वो बात देखती जो बचपन में उसके चेहरे पर हुआ करती थी, पर वो बोलता कुछ नहीं। सिर्फ़ बैठता और चाय पीता। और मैं उसकी चाय में चीनी डालती और कुछ नहीं पूछती, क्योंकि मुझे पता है कि अगर मैंने पूछा, तो वो उठ जाएगा।"

"वो उठ जाता?"

"उठ जाता। वो आज भी उठ जाता।"

वो चुप हो गईं। सूरज अब पुल के उस पार तक पहुँच गया था और नदी के सूखे पाट पर उसकी अंतिम किरणें आड़ी पड़ रही थीं। एक लंबा, पतला साया मेरा और उनका पुल की तरफ़ खिंचा जा रहा था, और मुझे लगा जैसे हम दोनों किसी भी वक़्त गिर जाएँगे, और पकड़ने को कुछ नहीं होगा।

"आपको डर है," मैंने कहा। मैंने पूछा नहीं, कहा। आवाज़ में सवाल नहीं था।

वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रहीं।

"हाँ," उन्होंने कहा। "और मैं तुझे बताती हूँ किस बात का। मुझे इस बात का नहीं डर है कि सच खुलेगा तो मेरे पति जेल जाएँगे। मैं इक्कीस साल उनके साथ रही हूँ, मैं उनके जाने का इंतज़ार कर चुकी हूँ। मुझे डर है कि सच खुलेगा तो मेरा बेटा मुझसे पूछेगा — तुमने इक्कीस साल मुझसे ये क्यों छिपाया? और मैं उसे क्या जवाब दूँगी? कि मैं डरती थी? कि मैं तुम्हें खोने से डरती थी? कि मैं तुम्हारे बिना ये सब नहीं सह पाती? वो यही सब कहेगी और मेरे बेटे को वो जवाब पसंद नहीं आएगा, क्योंकि उस उम्र में हर बेटे को माँ के डर पर शक होता है।"

उन्होंने अपने हाथों को एक बार खोला, फिर जोड़ लिया।

"अगर तुम उसे ये बात बताओ," उन्होंने कहा, "तो वो मुझसे कहेगा — माँ, तुमने झूठ बोला। मैं इक्कीस साल से तुम्हारे साथ हूँ और तुमने एक बार भी नहीं कहा। और मैं उसके सामने चुप रह जाऊँगी, क्योंकि मेरे पास कोई जवाब नहीं है। और वो मेरी तरफ़ ऐसे देखेगा जैसे किसी अजनबी को देखता हो, और वो मुझे छोड़ देगा। वो मुझे छोड़ देगा, अर्जुन। मुझे इससे ज़्यादा किसी और चीज़ का डर नहीं है।"

उनकी आवाज़ इस वाक्य के आख़िर में टूट गई और उन्हें एक लंबी साँस लेनी पड़ी, और मैंने देखा कि उनकी आँखों में पानी था, पर वो रोई नहीं। वो एक ऐसी औरत थी जिसने रोना बहुत साल पहले चुपचाप बंद कर दिया था और अब उसके पास रोने का तरीक़ा ही नहीं बचा।

मैं कुछ नहीं बोला। मैंने सिर्फ़ रेत में एक लकीर खींची और फिर उसे अपनी हथेली से मिटा दिया।

उन्होंने साँस ली, और फिर बोलीं, "तुझे पता है मैं तुझे ये सब क्यों बता रही हूँ?"

"क्यों?"

"क्योंकि जब मैंने तेरे गैराज में वो कैलेंडर देखा, जिस पर नाम कटा हुआ है, तब मुझे याद आया कि उस रात मैंने भी अपने हाथों से एक चीज़ काटी थी। उस रात के बाद मैंने अपने पति की हर तस्वीर से उसका चेहरा कैंची से काट दिया था। घर में उनकी कोई तस्वीर नहीं है। और जिस दिन मैंने ये किया था, मुझे लगा था कि मैं मज़बूत हो रही हूँ। और उस दिन बारह साल का कबीर दरवाज़े पर खड़ा मुझे देख रहा था। उसने कुछ नहीं कहा। बस देखा। और मुझे आज तक वो पल काटता है।"

उन्होंने एक हाथ से अपनी साड़ी का कोना सीधा किया।

"तेरे गैराज में जो कैलेंडर है, मैं उसे जानती हूँ। मैंने उस पर कुछ नहीं बोला, पर मैं जानती हूँ कि उस पर जो नाम कटा हुआ है, वो मेरे पति का ही नाम है। जिस आदमी ने तुझे ये कैलेंडर दिया, उसने अपने हाथ से उसे काटा था, ताकि तेरे जैसे लड़के यहाँ आकर ये न जान जाएँ कि इस गैराज में उनका भी हिस्सा रहा है।"

मैंने उसे याद किया। वो पुराना कैलेंडर — दीवार पर लटका, पन्ना दो साल पहले का अटका हुआ, और ऊपर से कोई नाम कैंची से काट दिया गया, सिर्फ़ निशान बचा था।

"मैंने वो कैलेंडर बहुत देखा है," मैंने कहा। "पर मुझे नहीं पता था कि उसमें किसका नाम है।"

"अब पता है," उन्होंने कहा। "और तेरे पापा का नाम जिस दिन उस गैराज की दीवार पर चढ़ा था, मैं वो दिन भूल नहीं सकती। क्योंकि उसी दिन मेरे पति ने अपना नाम उस दीवार से हटा लिया था। ये शहर ऐसा ही है, अर्जुन। यहाँ लोगों के नाम दीवार पर लिखे जाते हैं और दीवार से मिटाए जाते हैं। और जो मिटाने वाले हैं, वो कभी नहीं मिटते।"

मैंने सोचा। फिर पूछा, "आपके पति… आपके पति कैसे मरे थे?"

वो बहुत देर तक चुप रहीं। मुझे लगा वो नहीं बोलेंगी।

फिर उन्होंने साँस ली, और बोलीं, "गाड़ी पलटी। रात में। ट्रक पीछे से आकर टकराया। ऐसा ही रिपोर्ट में लिखा था।"

"और सच?"

"सच मैं आज नहीं बोलूँगी," उन्होंने कहा। "पर तुझे इतना बता दूँ — उस रात मेरे पति के हाथ में एक रजिस्टर था। और उस रजिस्टर में वो नाम लिखा था जिन्हें मैं आज नहीं ले रही। तेरे पापा उस रजिस्टर को लेकर उस रात निकले थे, और फिर वो भी नहीं लौटे।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"रजिस्टर," मैंने कहा।

"हाँ।"

"काला रजिस्टर?"

वो रुकीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में इस बार कुछ और था — धुँधला, पुराना, और बहुत थका हुआ, पर पहचान का एक टुकड़ा।

"तुझे… तुझे वो मिल गया?"

मैंने सिर हिलाया।

उन्होंने साँस ली। इस बार साँस इतनी लंबी थी कि मुझे लगा वो सीने के अंदर कोई बहुत पुरानी गाँठ खोल रही हों।

"इक्कीस साल," उन्होंने कहा। "इक्कीस साल मैंने सोचा कि वो रजिस्टर मेरे पति के साथ जल गया। इक्कीस साल की रातें उसी सवाल में गईं — क्या उसने मरने से पहले सब कुछ बता दिया? क्या उन लोगों ने उसे उसके नाम से नहीं, उस रजिस्टर के नाम से मारा? और तू कह रहा है तुझे मिल गया।"

"मैंने पढ़ा है," मैंने कहा। "अधूरा पढ़ा है। पर पढ़ा है।"

वो कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखती रहीं, और उनकी आँखें भीगी थीं पर फिर भी उनमें रोना नहीं था। और मुझे लगा वो एक ऐसी औरत है जिसने भीतर सब कुछ सुखा लिया, इस डर से कि कहीं भीगने से कुछ दिख जाएगा।

"तो अब मैं तुझे वो बात बता सकती हूँ जो मैंने किसी से नहीं कही," उन्होंने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho