A Dark Secret185 / 536

A Dark Secret – Chapter 185

7 min read November 6, 2026

सूरज ढल रहा था और धूल का रंग बदल रहा था — सफ़ेद से पीला, पीले से नारंगी। सड़क पर ट्रक कम थे, क्योंकि हड़ताल का असर अभी उतरा नहीं था, और जो दो-चार गाड़ियाँ थीं वो भी ऐसे चल रही थीं जैसे किसी के डर से धीरे चल रही हों।

पुराना पुल आया तो मैंने गाड़ी सड़क के किनारे, झाड़ियों के पीछे रोकी, जहाँ से ऊपर से कोई नहीं देख सकता।

पुल पर एक भी आदमी नहीं था।

मैं उतरकर उसी रास्त…े पर चल पड़ा, जो नीचे की तरफ़ जाता था — वही रास्ता जिस पर दो रात पहले मैं और नैना उतरे थे, जहाँ राख वाली कटोरी मिली थी, जहाँ सूखी नदी के पत्थर अब भी वैसे ही बिछे थे जैसे तब थे।

पर आज वहाँ कुछ बदला हुआ था।

रेत पर, तीसरे खंभे के पास, जहाँ एक बार राख वाली कटोरी रखी थी, वहाँ एक औरत बैठी थी।

सफ़ेद साड़ी। सिर पर सफ़ेद साड़ी का ही पल्ला, कंधों पर मुड़ा हुआ। घुटनों के पास हाथ जोड़े, और वो हाथ ऐसे स्थिर रखे थे जैसे कोई नाव में बैठा हो और लहर के डर से हिलना न चाहता हो।

मैंने क़दम धीमे किए।

पहले मुझे लगा कोई और है। फिर उसने सिर उठाया और मैंने वो चेहरा देखा — वही चेहरा जिस पर बहुत शांति थी और आँखों में बहुत थकान, वही चेहरा जो तीन दिन पहले मेरे गैराज में आया था और एक शब्द नहीं बोला था।

शांति देवी।

मैं रुका। दस क़दम दूर, शायद बारह। मेरे पैर अपने आप रुक गए। मन ने तो कहा था आगे बढ़, पर पैरों ने सुना नहीं।

वो मेरी तरफ़ देख रही थीं, और उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। हैरानी उन आँखों में नहीं थी जो मुझे तीन दिन से देख रही थीं, किसी और की आँखों में होती।

"आ जाओ," उन्होंने कहा।

आवाज़ इतनी धीमी कि पहले मुझे लगा नदी की हवा बोली। पर हवा नहीं थी। वो उनका गला था — जैसे किसी पुराने तार वाले रेडियो पर वॉल्यूम पूरी तरह से घुमाया गया हो और सिर्फ़ फुसफुसाहट बची हो।

"आप?" मैंने कहा।

"आ जाओ," उन्होंने फिर कहा, और इस बार पहले एक गहरी साँस ली। "बहुत दूर खड़े हो। मुझे बोलने के लिए… बोलने के लिए ताकत चाहिए और ज़ोर लगाकर बोलूँगी तो ज़्यादा देर नहीं बोल पाऊँगी।"

मैं आगे बढ़ा। पत्थर थे सूखी नदी में और उन पर चलने से आवाज़ होती थी, चर-चर, जैसे काँच की छोटी-छोटी बोतलें कुचल रहे हों। मैं उनके पास पहुँचा तो कुछ सोचा, पूछा नहीं, बस उनके सामने दो क़दम दूर, रेत पर बैठ गया।

वो मेरी तरफ़ देखने लगीं। देखा, और मुझे लगा वो मेरे चेहरे पर कुछ ढूँढ रही हैं — कोई लकीर, कोई निशान, जो उन्होंने बहुत पहले किसी और चेहरे पर देखा हो।

"तुम बिल्कुल रघुवीर जैसे हो," उन्होंने कहा।

मेरी साँस रुक गई।

"आप… आप पापा को जानती थीं?"

उन्होंने सिर हिलाया, धीरे। इतना धीरे कि हिला या नहीं हिला, दोनों का फ़र्क़ मुश्किल था। फिर वो बोलीं, और हर वाक्य के पहले उन्होंने साँस ली, जैसे हर शब्द उनके भीतर से उधार निकल रहा हो और उन्हें याद रखना हो कि लौटाना है।

"तेरे पापा मेरे पति के साथ गाड़ी चलाते थे। उससे भी पहले। जब ये शहर इतना बड़ा नहीं था। जब यहाँ सिर्फ़ एक टोल था और उस पर एक पेड़।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके हाथ अब भी घुटनों पर जुड़े थे, और उनकी उँगलियों के जोड़ सफ़ेद हो गए थे, जैसे वो खुद को कहीं से पकड़े हुए हों।

"आप कबीर की माँ हैं," मैंने कहा।

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने साँस ली।

"हाँ।"

"और अमरदीप…"

"कबीर का असली नाम है," उन्होंने कहा। "अमरदीप। यही नाम उसके जन्म के काग़ज़ पर है। यही नाम उसकी कुंडली में लिखा मिलता अगर मैंने कुंडली बनवाई होती। पर जब वो चार साल का था, तब हमने उसे बदल दिया।"

"क्यों?"

उन्होंने साँस ली और इस बार साँस लेने में ज़्यादा वक़्त लगा, जैसे सीने के अंदर कुछ भारी है जो हवा को रास्ता नहीं दे रहा।

"क्योंकि उस नाम से डर फैलता था," उन्होंने कहा। "जो लोग उस नाम को जानते थे, वो उसे देखकर पूछते — तू उसी का है? और मैं हर बार झूठ बोलती। फिर एक दिन मुझे लगा, झूठ बोलने की जगह नाम बदल दूँ, तो मुझे उतनी बार झूठ नहीं बोलना पड़ेगा।"

मैंने कुछ देर सोचा।

"अमरदीप," मैंने कहा, धीरे, जैसे नाम जीभ पर रखकर तोल रहा था। "ये नाम अमर से आया है?"

वो मुस्कुराईं। पहली बार। छोटी सी मुस्कान, और उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे देखकर भारी लगा।

"उसके पिता ने रखा था," उन्होंने कहा। "वो कहते थे, मेरा बेटा अमर रहेगा। अमर रहेगा, अमरदीप। मेरी किस्मत में यही नहीं लिखा था।"

उन्होंने साँस ली।

"पर अब वो लोग उसे अमरदीप नहीं बुलाते। वो अब कबीर है। और कबीर भी उस नाम से इतना दूर भागता आया है कि मुझे लगता है वो अपना ही पुराना नाम सुनकर काँप उठता है।"

"उसने आज मुझे खुद बताया," मैंने कहा।

वो कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, "बताया? या मजबूरी में कह गया?"

मैंने सोचा।

"मजबूरी," मैंने कहा। "क्योंकि मैंने लॉकेट उसके सामने रख दिया था।"

उन्होंने सिर हिलाया। "वो अब भी लॉकेट के पास नहीं बैठ पाता। बचपन में वो उसे गले में बाँधकर सोता था। फिर एक रात उसने वो चीज़ तकिये के नीचे से निकालकर मेरे हाथ में रख दी और बोला — माँ, इसे उसी को लौटा देना जिसका है। और मैंने उसे कभी नहीं लौटाया। मैं उसे ग्यारह साल एक डिब्बे में बंद रखती रही। हर बार सोचती थी, कल लौटा दूँगी। और हर बार कल आज नहीं बन पाया।"

मैंने पूछा, "आपने उसे मुझे क्यों दिया?"

वो चुप रहीं। इतनी देर चुप रहीं कि मुझे लगा जवाब नहीं देंगी। ऊपर से पुल पर कोई पक्षी उड़ा और रेत पर उसकी परछाईं एक पल को तिरछी होकर गुज़री।

"क्योंकि तू उसका पुराना नाम जानता है," उन्होंने कहा। "और मैं चाहती थी कि कोई तो हो जो उसे उस नाम से याद रखे। मेरे अलावा भी। मैं मर जाऊँ तो कोई तो हो।"

मेरा गला सूखने लगा।

"आप ऐसी बातें मत कीजिए," मैंने कहा।

वो मुस्कुराईं, फिर धीरे से बोलीं, "तू मुझे ऐसी बातें मना करने वाला पहला आदमी है। बाकी सब पूछते हैं — दवा ले ली? डॉक्टर को दिखाया? कोई नहीं कहता — ऐसी बातें मत किया करो।"

मैंने कुछ नहीं कहा। क्या कहता। मेरे पास शब्द नहीं थे। सिर्फ़ ये बात थी कि मैंने अपनी अम्मा को फ़ोन पर ग्यारह दिन से नहीं सुना था, और अभी उस पल मुझे अपनी अम्मा की कमला वाली आवाज़ याद आ गई, और मैंने किसी अनजानी औरत के सामने अपनी आँखें नीची कर लीं।

"आपने कबीर से ये सब नहीं बताया?" मैंने पूछा, बात बदलने के लिए।

"बताया था," उन्होंने कहा। "पर उसने सुनना बंद कर दिया था। वो जब सोलह साल का था, तब एक बार पूछ बैठा कि मेरा बाप कौन है, और मैंने उसे सच कह दिया। बस इतना कह दिया कि जिसे तू भाई साहब कहता है, वही तेरा बाप है।"

मेरे पेट में एक ठंडी चीज़ फैल गई। जैसे किसी ने बर्फ़ का एक टुकड़ा मेरी रीढ़ के नीचे रख दिया हो। मेरी सुन्न हो गई। मेरी गर्दन कठोर हो गई और मुझे लगा कि कमरे के बाहर कोई चल रहा है, पर बाहर कोई नहीं था, सिर्फ़ सूखी नदी थी।

"देवा भाई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लगी।

वो सिर्फ़ सिर हिलाया।

"वो शहर का सबसे बड़ा आदमी नहीं है," उन्होंने कहा, और यह कहते वक़्त उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो दुख से ज़्यादा शर्म का था। "वो सबसे बड़ा डरा हुआ आदमी है। मैं इक्कीस साल से उसके साथ हूँ और मैं तुझे सच कहती हूँ — उसकी पूरी ज़िंदगी में एक रात भी ऐसी नहीं गई जब वो सुकून से सोया हो। मैं देखती हूँ। मैं बगल में हूँ। मैं जानती हूँ।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

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