A Dark Secret – Chapter 188
और फिर उनकी सफ़ेद साड़ी पुल की रोशनी में घुल गई, और मैं वहीं रेत पर अकेला खड़ा रह गया। सूरज डूब चुका था। नदी में पानी नहीं था, पर हवा में एक पुरानी सीलन थी, जैसे यहाँ कभी पानी था और वो भाप बनकर उड़ गया और उसकी याद रह गई।
मैंने जेब से माइक निकाला और देखा — लाल बत्ती बंद थी। बैटरी खत्म हो चुकी थी। मैंने वो आख़िरी मिनट नहीं रिकॉर्ड किए थे — ठीक उस वक़्त खत्म हुई जब वो सीढ़ी पर चढ़ रही थीं।
मैंने माइक जेब में वापस रखा और आसमान की तरफ़ देखा।
अब मुझे कबीर तक पहुँचना था — पुल के नीचे, जैसा उसने कहा था। पर इस पल मेरी टाँगें नहीं चल रही थीं। मैं रेत पर बैठ गया, उसी जगह जहाँ वो बैठी थीं, और मुझे उनकी साड़ी की सिलवटें अब भी रेत पर दिख रही थीं।
और मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी।
वो औरत आज मेरे गैराज तक आई थी। उसने अपने बेटे का सबसे पुरानी चीज़ मेरे हाथ में रखी थी। और अब वो मुझसे कह रही है कि उस बेटे को मेरी ज़ुबान से कुछ न बताना।
मतलब वो मुझे लॉकेट सिर्फ़ इसलिए नहीं दे गई थी कि मैं उसका नाम जान लूँ। वो मुझे लॉकेट इसलिए दे गई थी कि कबीर को अपने बारे में कुछ बताना पड़े। वो चाहती थी कि उसका बेटा मेरे सामने खुले — क्योंकि वो खुद नहीं खुल सकती थी।
वो औरत अपने बेटे के लिए एक रास्ता बना रही थी। और उस रास्ते में मैं एक पुल था।
मैं हँसा। धीरे से। बिना आवाज़।
मेरे चारों तरफ़ सूखी नदी थी, ऊपर टूटा पुल था, और मेरे सीने में एक चीज़ थी जो अब पहले से भारी थी। अब मेरे पास एक और वादा था, एक और रोक थी, और एक और झूठ था — कि कबीर को शांति देवी से मिलने की बात नहीं बताना।
और सबसे बड़ी बात — मेरे पापा उस रात यहाँ आए थे। इसी पुल के नीचे। जहाँ अब मैं बैठा हूँ। जहाँ अब मेरे हाथ में सिर्फ़ एक माइक है जिसकी बैटरी खत्म हो चुकी है।
मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी। आठ मिनट आगे।
और मुझे पता चला कि जो आख़िरी बात शांति देवी ने कही थी — वो सबसे ज़्यादा डरावनी नहीं थी।
सबसे डरावनी बात वो थी जो उन्होंने नहीं कही।
वो उस रात यहाँ क्यों आई थीं, ये उन्होंने नहीं बताया। और वो यहाँ आने के लिए पुल तक कैसे पहुँचीं, ये भी नहीं बताया। मुझे बस इतना पता था कि वो आज यहाँ मेरी राह देख रही थीं, जैसे उन्हें पहले से पता था कि मैं इस वक़्त यहाँ आऊँगा।
किसी ने उन्हें बताया था।
और वो कोई शायद ढाबे पर था।
मैं उठा, थैला उठाया और पुल की सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा। ऊपर पहुँचकर एक बार आस-पास देखा — दूर, सड़क के किनारे, झाड़ियों के पीछे एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। इंजन बंद। रोशनी बंद। बस एक झलक — छत की लकीर, साइड का शीशा — और फिर रात में सब कुछ घुल गया।
मैंने उसे दिमाग़ में लिख लिया। गिनती में रखा। उस कॉपी के आख़िरी पन्ने पर जो अब भी मेरे थैले में थी, स्याही में, मैंने उस सफ़ेद गाड़ी के लिए एक खाली जगह छोड़ दी।
क्योंकि अब शाम नहीं, अब रात हो गई थी। और कबीर पुल के नीचे मेरा इंतज़ार कर रहा था।
और उससे पहले, मुझे रुक्मा दीदी से एक सवाल पूछना था — कि उसने शांति देवी को क्या बताया था।
क्योंकि जब मैं ढाबे से निकला था, तब रुक्मा दीदी की आवाज़ बदली हुई थी। और अब मुझे लग रहा था कि उस बदली आवाज़ में एक और नाम छिपा था, जो शांति देवी का नहीं था।
वो नाम मुझे अभी नहीं पता था। पर मुझे पता था कि वो उसी ढाबे की उस रसोई में बैठा था जहाँ से एक औरत मेरी राह देख रही थी, और वो नाम बोलने के लिए रुक्मा दीदी ने आज तक अपनी ज़ुबान नहीं खोली थी।
मैं गाड़ी की तरफ़ चला।
धूल अब ठंडी हो गई थी और पैरों के नीचे सनसनाती थी, जैसे कोई बहुत पुराना रेडियो बंद होने के बाद भी गुनगुनाता रहता है।
॥
कबाड़ बाज़ार में रात नौ बजे के बाद सिर्फ़ तीन चीज़ें ज़िंदा रहती हैं। कुत्ते, चूहे और लोहे की महक।
मैं गली के मोड़ पर पहुँचा तो सारे शटर बंद थे। एक जगह हरी पीली रोशनी जल रही थी, वो भी किसी चाय की ठेली की, जो अब ठेली नहीं थी, बस एक स्टोव था और उस पर कालिख जमी केतली। बगल में एक बूढ़ा बैठा था, कंधे पर मोटा कंबल, हाथ में लाठी।
उसने लाठी की नोक ज़मीन पर टिकाई और पूछा, कौन?
अर्जुन। कबीर भाई की दुकान पर जाना है।
वो बूढ़ा उठा, मेरे चेहरे के पास लालटेन लाई और देखने लगा जैसे कोई काग़ज़ पढ़ रहा हो।
कबीर की दुकान पर? इस वक़्त?
हाँ।
उसने लाठी वापस ज़मीन पर रखी और कुछ सोचकर बोला, आज सुबह भी कोई पूछने आया था। छह बजे से पहले। पीछे के फाटक पर सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, इंजन बंद, दो आदमी अंदर गए थे।
मेरे कान ने पहले मेरा दिमाग़ पकड़ा और हिलाया। सफ़ेद गाड़ी। दो आदमी।
कौन थे?
पता नहीं। मैं इतनी सुबह किसी का नाम नहीं पूछता। दो बजे यहाँ कुत्ते भी चुप हो जाते हैं, साहब। बस लोहे की आवाज़ रह जाती है। और उस सुबह लोहे की आवाज़ बहुत आई थी।
कैसी आवाज़?
जैसे कोई ताले में चाबी डाल रहा हो और चाबी न घूम रही हो। बार-बार। फिर धम्म। फिर चुप।
मैंने उसे दस का नोट दिया। उसने नहीं लिया। कहा, मुझे चाय पिला दे, नोट नहीं चाहिए।
मैंने उसके स्टोव पर केतली चढ़ा दी और आगे बढ़ गया।
गाड़ी महल के आख़िरी मोड़ पर कबीर की दुकान है। टिन की छत, आधा फाटक, बाहर पुराने टायर और भीतर पंचर का बेसिन। दुकान के ऊपर एक बल्ब लटकता है, पीला, जैसे बहुत दिनों से बीमार हो। उसकी रोशनी में धूल के कण ऐसे तैरते हैं जैसे किसी पुराने कमरे में मछलियाँ।
मैं दुकान के सामने खड़ा हो गया। फाटक खुला था। अंदर अंधेरा था और अंधेरे में एक-एक चीज़ अपनी जगह पर चुपचाप बैठी थी। दीवार पर रुकी हुई घड़ी, दस बजकर सत्ताईस मिनट। मेज़ पर मोटी कटी-फटी कॉपी। कोने में लोहे की अलमारी, जिसके दरवाज़े पर पुराना ताला लटकता था और जिसके भीतर वो काग़ज़ रखे थे जिन्हें उसने कभी किसी को नहीं दिखाया।
और बगल में, दीवार से टिकी, वो पुरानी काली साइकिल।
उसका पिछला टायर आज भी हवा कम था। मुझे पता था।
मैं अंदर गया, बेंच पर बैठ गया और जेब से अपना फ़ोन निकाला। माइक की बैटरी पुल पर ही खत्म हो गई थी, पर फ़ोन ठीक था। मैंने रिकॉर्ड दबाया और फ़ोन को सामने की जेब में रख दिया, ऐसे जैसे कोई औज़ार रखता है। पहले भी मैंने ऐसा किया था। उस वक़्त मुझे लगा था कि ये काम है। आज लग रहा था कि ये ज़रूरत है।
साइकिल की चेन की आवाज़ आई। एक कड़ी सूखी थी और हर तीसरे चक्कर पर चटकती थी। मैंने आँख बंद कर ली। चेन, फिर पैर की एड़ी, फिर एड़ी का घूमना — जूते की तली घिसी हुई थी, इसलिए आवाज़ बाईं तरफ़ ज़्यादा खुलती थी।
कबीर दरवाज़े पर आया और रुक गया।
उसके हाथ में दो स्टील के गिलास थे, भाप उठ रही थी। उसने मुझे देखा और उसकी साँस एक पल के लिए रुकी। फिर वो सामान्य हो गया, जैसे कोई आदमी चलते-चलते सीढ़ी का एक टुकड़ा टाल देता है।
कब आया?
अभी।
चाय पी।
नहीं।
वो गिलास मेज़ पर रखकर मेरे सामने बैठ गया। उसने बल्ब की तरफ़ देखा, जैसे बल्ब कुछ कह रहा हो। उसका हाथ कॉपी पर गया और फिर वापस आ गया।
मैंने उसकी आवाज़ सुनी। चाय लाते वक़्त उसकी आवाज़ सीधी थी। अब वो सीधी नहीं थी। उसमें एक पतली सी लकीर आ गई थी, जैसे किसी तार में हवा भर गई हो।
मैंने भूमिका नहीं बनाई।
कबीर, तू देवा का बेटा है ना।
उसने मेरी तरफ़ देखा। एक पल, दो पल, तीन पल। बल्ब भिनभिनाया। अपनी जगह पर दूर, बाहर, कोई शटर गिरा और पूरा बाज़ार एक बार ठंडा हो गया।
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