A Dark Secret – Chapter 182
कबीर बैठा था। काउंटर पर उसका बड़ा सस्ता कैलकुलेटर रखा था, बगल में दो पेन — एक नीली स्याही, एक काली। सामने एक कटोरी में इलायची रखी थी, जिसका ढक्कन सालों से खुला था और किनारे पर फीका नीला गोल निशान घिस गया था।
वो निशान देखकर मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया।
क्योंकि ये गंध मैंने चार दिन पहले सुनी थी — देवा भाई के कमरे में, उस सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी के चले जाने के बाद, जब मेज़ पर चाय के दो कटोरे पड़े रह गए थे और उनमें इलायची की महक देर तक टिकी रही थी।
"अर्जुन?" कबीर ने सिर उठाया। "तू इतना सुबह?"
"नौ बजे मुझे उस कमरे में बैठना है," मैंने कहा। "उससे पहले एक काम है।"
"क्या काम?"
मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया। जुगनू दरवाज़े के बाहर चटाई पर बैठ गया, जैसे वो जानता हो कि अंदर जो होने वाला है, वो दो आदमियों का काम है।
"कबीर," मैंने कहा, "तेरी घड़ी दस बजकर सत्ताईस मिनट पर रुकी है।"
"हाँ।"
"क्यों?"
"पता नहीं। बैटरी नहीं डाली।"
"दो साल से नहीं डाली?"
वो हँसा, पर हँसी आधी आई। "तू आज क्या-क्या पूछेगा?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने देखा कि दुकान के कोने में एक पुरानी अलमारी है, जिसका एक दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं होता, और उसके अंदर काग़ज़ों के बंडल रस्सी से बँधे पड़े हैं। काग़ज़ों की अलमारी — वही, जिसके बारे में उसने खुद कहा था कि पुराने मालिक ने छूने से मना किया था।
मैंने अपनी सिली हुई कॉपी निकाली और सामने रख दी। फिर पेन निकाला।
तभी कबीर का फ़ोन बजा।
वो मेज़ पर पड़ा था, स्क्रीन ऊपर। मैंने अनजाने में ही उसकी तरफ़ देख लिया, क्योंकि कमरे में रोशनी कम थी और स्क्रीन की चमक सबसे तेज़ चीज़ थी।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था।
शांति देवी।
पूरा नाम। एक भी अक्षर कम नहीं। कोई "माँ" नहीं, कोई "अम्मा" नहीं, कोई घर का बुलावा नहीं। सीधा, साफ़, दो शब्द — जैसे किसी दफ़्तर के रजिस्टर से उठाकर स्क्रीन पर चिपका दिया गया हो।
कबीर ने फ़ोन उठाने से पहले एक पल मेरी तरफ़ देखा। बस एक पल। और उस पल में मैंने उसके चेहरे पर वो चीज़ देखी जो मैंने आज तक नहीं देखी थी — खालीपन नहीं, डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी सफ़ेदी, जैसे किसी ने अंदर से खून की आख़िरी बूँद भी खींच ली हो।
"तू माँ को नाम से क्यों सहेजता है?" मैंने पूछा।
उसका हाथ फ़ोन तक पहुँचते-पहुँचते रुक गया।
"पुराना फ़ोन है," वो बोला। "नाम बदलना भूल गया था।"
"कबीर।"
"सच में। सालों पहले डाला था। तब ऐसे ही…"
उसकी आवाज़ बीच में टूट गई। बिल्कुल बीच में। जैसे कोई पुरानी रस्सी हो जिसे बहुत दिनों से खींचा जा रहा हो और आज वो एक जगह से नहीं, ठीक बीच से टूट गई हो। फिर उसने गला साफ़ किया और आगे बोला, पर अब आवाज़ पहले जैसी नहीं थी — अब उसमें वो चीज़ आ गई थी जो मैं सालों से पहचानता हूँ। वो हल्की कंपन। वो कंपन जो झूठ बोलते वक़्त आती है।
पर आज मुझे नहीं लगा कि वो झूठ बोल रहा था।
आज मुझे लगा कि वो सच छिपा रहा था और सच छिपाने में इंसान उतना ही काँपता है जितना झूठ बोलने में।
फ़ोन बजता रहा। कबीर ने नहीं उठाया। दस घंटी हुई होंगी, फिर चुप हो गया। स्क्रीन काली पड़ गई। और उस काली स्क्रीन में मुझे अपना चेहरा दिखा, धुँधला, बिना आँखों वाला।
मैंने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।
मैंने उसे काउंटर पर नहीं पटका। धीरे रखा। उसकी ज़ंजीर काउंटर के काँच पर बजी — टिं, एक हल्की सी आवाज़, जो दुकान के कोने तक गई और वहीं रुक गई।
कबीर ने उसकी तरफ़ देखा।
"ये…" उसकी आवाज़ फिसली।
मैंने उसे उलटा किया। पीतल का घिसा फूल ऊपर, टूटी कड़ी नीचे। फिर मैंने ढक्कन खोला — ज़ंग की वजह से जाम था, मुझे नाखून लगाने पड़े — और अंदर की तस्वीर सामने रख दी। बच्चे की फीकी काली-सफ़ेद तस्वीर। इतनी फीकी कि चेहरा पहचानना मुश्किल था, बस आँखों के दो धब्बे और माथे पर बालों की एक लकीर बची थी।
फिर मैंने उसे पलटा और काउंटर पर ऐसे रखा कि पीछे की खुरची लिखाई सीधी दिखे।
"अमरदीप कौन है?"
कबीर नहीं बोला।
दुकान के बाहर से आवाज़ें आ रही थीं। कोई किसी को बुला रहा था, कोई ट्रॉली खींच रहा था, कहीं लोहे की चादर गिरी और चारों तरफ़ गूँज गई। पर मेरे कान के अंदर सब कुछ धीमा हो गया था, जैसे किसी ने शहर का आवाज़ वाला बटन घुमाकर नीचे कर दिया हो।
कबीर ने अपना हाथ उठाया। लॉकेट को छुआ। नहीं छुआ — छूने से पहले रुक गया, जैसे डरता हो कि छूते ही कुछ टूट जाएगा।
"अमरदीप कौन है, कबीर?"
वो उठकर खड़ा हो गया। कुर्सी पीछे सरकी और उसकी टाँग काउंटर से टकराई। वो दरवाज़े तक गया और बाहर देखने लगा।
पर वो बाहर किसी को नहीं देख रहा था।
मैं जानता हूँ, क्योंकि जब कोई सच में कुछ देखता है, तो उसकी आँखें एक जगह रुकती हैं। कबीर की आँखें एक जगह नहीं रुक रही थीं। वो गली के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा रही थीं, जैसे किसी ने उसे नाम लेकर बुलाया हो और वो पता न कर पा रहा हो कि आवाज़ किस तरफ़ से आई।
"कबीर।"
"अर्जुन, रुक जा।"
"मैं रुक नहीं सकता।"
"आज रुक जा।"
"मैं चार दिन से रुक रहा हूँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। जब गुस्सा आता है, मेरी आवाज़ हमेशा धीमी हो जाती है — ये मेरी सबसे बुरी आदत है और मेरी सबसे साफ़ पहचान। "चार दिन से मैं काग़ज़ जोड़ रहा हूँ। सात पर्चियाँ, सत्ताईस लाख चौरानबे हज़ार। एक रजिस्टर। एक कटी केबल। एक पीतल का नट जिसके अंदर से निकलकर पापा का नाम आया — रघुवीर। और आज सुबह एक औरत मेरे गैराज में आई, जो एक शब्द नहीं बोली, और मेरी हथेली पर ये रखकर चली गई।"
कबीर ने अपना हाथ काउंटर पर रख दिया। मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ कैलकुलेटर के बटन पर थीं — बिना दबाए, बस पड़ी हुई।
"तूने मुझसे कहा था," मैंने आगे कहा, "कि इसे अपने पास रखना, किसी को मत दिखाना।"
"हाँ, कहा था।"
"क्यों?"
वो चुप।
"तूने ये भी कहा था कि तूने ये आज पहली बार देखा है।"
"देखा था।"
"तो फिर तूने ये क्यों कहा कि इसे किसी को मत दिखाना? अगर तूने आज पहली बार देखा, तो तुझे कैसे पता कि इसे छिपाना ज़रूरी है?"
कबीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
दुकान के बाहर वो बैलगाड़ी फिर निकली और उसकी अधूरी घंटी फिर बजी। इस बार मुझे लगा कि वो घंटी कबीर के लिए बज रही है।
"तू मुझसे झूठ बोल रहा है," मैंने कहा।
"हाँ।"
ये सुनकर मैं रुक गया।
मैंने सोचा था वो बहाना बनाएगा। मैंने सोचा था वो कहेगा कि सब ग़लतफ़हमी है, कि तस्वीर का मतलब कुछ और है, कि नाम किसी और का है। पर उसने सिर्फ़ "हाँ" कहा — और ये "हाँ" पूरे कमरे में गिरा, जैसे काँच का गिलास गिरता है।
"तो सच बोल।"
"अभी नहीं।"
"कबीर—"
"अभी नहीं, अर्जुन।" उसने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल नहीं थीं, गीली नहीं थीं। बस थकी थीं। इतनी थकी कि मुझे पहली बार समझ आया कि ये लड़का, जो हर बात का हिसाब दो पेन से रखता है, किसी भी चीज़ का हिसाब अपने भीतर नहीं रख पाया है। "इस दुकान में एक चीज़ है जिसे मैं तेरे सामने नहीं खोल सकता। न आज। न यहाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि यहाँ दीवार के बाहर कान हैं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ एकदम धीमी हो गई। "तुझे पता है न, कबाड़ बाज़ार में कौन किसका क्या है?"
मैंने दुकान के बाहर देखा।
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