A Dark Secret179 / 536

A Dark Secret – Chapter 179

7 min read November 6, 2026

फिर मैंने नीचे वो लाइन जोड़ी जो मैं हर बड़े काम के बाद जोड़ता हूँ —

कीमत। आज चाचा का घर टूटा। आज चाची ने सवाल नहीं पूछा, इसलिए उनका सवाल बाकी है। और आज मैंने पहली बार अपने ही खून को अदालत में खींचने की बात सोची।

मैंने कॉपी बंद की। धूल में हाथ पोंछा।

नीचे नदी में हवा चल रही थी और वो नीचे रेत पर से उड़कर मेरे चेहरे पर आ रही थी।

मैंने आँखें बंद कीं और उस शहर को सुना।

दूर टोल की तरफ़ से लगातार हॉर्न आ रहे थे। कहीं एक ट्रक अपनी मरम्मत के लिए रुका था और उसका ड्राइवर लोहे की पेटी पर हथौड़ा मार रहा था — टन, टन, टन। पुल के नीचे एक झींगुर बज रहा था। और हवा में वो आवाज़ थी जो ट्रक की छत पर तिरपाल फड़फड़ाने से आती है।

मैंने उँगली से हवा में लिखा — चार। चार आदमी। एक फ़ोटो। और एक आदमी जिसका चेहरा कोई जानबूझकर खुरच गया था।

जिसने चेहरा खुरचा, वो उस आदमी से डरता है। और जो डरता है, वो उस आदमी के नाम के बिना नहीं सो सकता।

मुझे राठौर का नाम याद आया। कबीर की ज़ुबान से फिसला था। मैंने उसे कभी नहीं पकड़ा। आज पहली बार लगा कि वो नाम जानबूझकर फिसलाया गया था, ताकि मैं उसे पकड़ूँ और कबीर को पता चले कि मैंने पकड़ा है।

जब मैं पुल से उतर रहा था, तब रात के साढ़े नौ बजे थे। मेरा फ़ोन काँपा। नैना का संदेश था — "एडिटर ने खबर रोक दी। दो दिन। मैंने कहा ठीक है। पर मैंने अपनी कॉपी उसके दराज़ में नहीं छोड़ी, मेरे पास है।"

मैंने उत्तर लिखा — "ठीक। कल आठ बजे ढाबे पर।"

घर पहुँचकर मैंने जूते उतारे और चारपाई पर बैठ गया। मैं सोने की कोशिश कर रहा था कि मेरा मोबाइल फिर बजा।

नैना का नहीं था। कबीर का था।

मैंने स्क्रीन देखी। संदेश छोटा था, और कबीर के हिसाब वाले छोटे-छोटे अक्षरों में।

"कल सुबह मैं अपनी अम्मा को तेरे पास ला रहा हूँ। और उसके सामने मुझसे कुछ मत पूछना।"

मैंने उसे दो बार पढ़ा।

फिर तीसरी बार पढ़ा और मेरा हाथ ठंडा हो गया।

क्योंकि मुझे याद आ गया — कबीर के फ़ोन में वो नाम। "शांति।" जिसे देखकर उसकी साँस रुक गई थी और उसने कहा था, गलत नंबर है।

और मुझे याद आया — कबीर की दुकान की वो घड़ी जो दस बजकर सत्ताईस मिनट पर रुकी हुई थी। और उसका वो जवाब जो उसने मुझे कभी नहीं दिया था।

और मुझे याद आया — आज सुबह देवा के दफ़्तर में जब तीसरा फ़ोन बजा था, देवा ने उसे देखा तक नहीं था। उसने बस उसे चुप कराया था। जैसे कोई आदमी अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी की घंटी को अंदर से बंद कर दे।

मैं उठा और छत की रेलिंग पर आकर खड़ा हो गया।

नीचे गली में एक कुत्ता भौंका। कहीं दूर टोल से एक ट्रक का हॉर्न आया। और मेरे पीछे, मेरे ही कमरे में, मेरी ही चारपाई के नीचे रखी पापा की औज़ार वाली थैली से कोई आवाज़ नहीं आई।

पर मैंने फिर भी सुना।

ठक। ठक।

मैं मुड़ा। कमरा खाली था। अलमारी का पेंदा अब भी खुला था और उसके अंदर अँधेरा था।

मैंने अपनी जेब से फ़ोटो निकाली और उसे उजाले में उठाया। उस चौथे आदमी का चेहरा जहाँ से खुरचा गया था, वहाँ काग़ज़ का रेशा उखड़ा हुआ था। और उसकी जेब से आधा लटकता सफ़ेद रुमाल मेरी उँगली के नीचे साफ़ दिख रहा था।

मैंने फ़ोटो मोड़कर जेब में रखी। फिर पापा की घड़ी देखी।

आठ मिनट आगे।

"कल सुबह," मैंने अपने आप से कहा। "नौ बजे देवा के सामने, आठ बजे ढाबे पर, और कबीर अपनी अम्मा को लेकर आ रहा है।"

मैं चारपाई पर लेट गया। छत के नीचे मकड़ी का जाला हवा से हिल रहा था। मैंने आँखें बंद कीं और अपने आप से एक ही बात दोहराई —

अर्जुन, जिस आदमी के सामने तू कल सुबह बैठेगा, वो तेरा दुश्मन नहीं है। वो तेरे दोस्त का बाप है।

और नींद आने से पहले मुझे एक ही आवाज़ सुनाई दी — मेरी ही घड़ी की टिक-टिक, जो आज बहुत तेज़ चल रही थी, जैसे उसे भी जल्दी हो।

॥

बूढ़े शेर का पिछला पहिया तीन दिन से बोल रहा था। धीमी, घसीटती आवाज़ — जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में दाँत पीस रहा हो। मैं उसे सुनकर टालता रहा, क्योंकि पिछले तीन दिन में सुनने के लिए बहुत कुछ और था। पर आज सुबह जब मैंने ट्रक का पहिया घुमाया, तो आवाज़ बदल गई।

घरघर। फिर चट। फिर घरघर।

मैंने जैक नीचे रखा और पेचकस उठाया। सुबह के सात बजे से पहले का वक़्त था। गैराज में अभी सिर्फ़ मैं था, दीवार पर टँगी तार से बँधी बड़ी रिंच, और छत के नीचे से हवा का वो झोंका जो हमेशा धूल और डीज़ल की महक लेकर आता है।

पहिया खोलते वक़्त मेरे हाथ काली चिकनाई से भर गए। धुरी का नट आधा खुला था। बेयरिंग की ग्रीस सूखकर मिट्टी जैसी हो गई थी। मैंने उसे उँगली से खुरचा और अपने आप से बोला, "देखा, मैंने कहा था न। तीन दिन में तू कोई न कोई नई आवाज़ निकाल ही लेगा।"

यही मेरा काम है। लोग समझते हैं मैं गाड़ी ठीक करता हूँ। सच ये है कि मैं पहले उसकी आवाज़ ठीक करता हूँ, गाड़ी अपने आप ठीक हो जाती है।

उस वक़्त मेरे पास और भी कई चीज़ें थीं जो बोल रही थीं। पापा की घड़ी, जो आज आठ मिनट आगे थी। जेब में लिपटा हुआ माइक, जिसकी बैटरी लगभग खत्म थी। और कपड़े में बँधे ब्रेक के तीन कटे तार, जो मुझे रात में सोने नहीं दे रहे थे।

आज सुबह आठ बजे मुझे रातरानी ढाबे पर पहुँचना था। और नौ बजे ठाकुर ट्रांसपोर्ट के उस कमरे में बैठना था, जहाँ दो फ़ोन मेज़ पर रखे रहते हैं और तीसरा अलमारी में बजता है।

और उससे पहले, मुझे ये पहिया खोलना था।

मैंने नट को पूरा खोला ही था कि गैराज के फाटक पर किसी ने हल्का सा हाथ रखा। फाटक एक हाथ से खुलता नहीं, उसे धक्का चाहिए। पर उस आदमी ने एक ही हाथ से खोला — यानी उसके हाथ में ताक़त थी और उसे दिखाने की जल्दी नहीं थी।

मैंने सिर उठाया।

कबीर खड़ा था। सफ़ेद कमीज़, हमेशा की तरह साफ़। पर आज उसके हाथ खाली थे — न कैलकुलेटर, न कॉपी, न दो पेन। और उसके पीछे एक औरत थी।

सफ़ेद साड़ी। सिर पर पल्लू ठीक से रखा हुआ, ज़रा भी टेढ़ा नहीं। चेहरे पर ऐसी शांति जो सुकून की नहीं, थकान की होती है — जैसे कोई बहुत लंबा रास्ता चलकर आया हो और अब उसे बैठने की भी इजाज़त न मिली हो।

वो फाटक से अंदर आई। एक क़दम। फिर दूसरा। हर क़दम के बीच एक पूरा साँस भरने का वक़्त था। जैसे वो ज़मीन को छूकर देख रही हो कि ये अब भी उसके नीचे है या नहीं।

मैंने अपने हाथ पोंछे और खड़ा हो गया।

"अर्जुन।" कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो हिसाब लगाते वक़्त आती है। "ये मेरी अम्मा हैं।"

औरत ने मेरी तरफ़ नहीं देखा।

उसने एक बार भी मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो सीधे गैराज के अंदर आई और उसकी नज़र दीवार पर जाकर रुक गई।

वहाँ गैराज का पुराना कैलेंडर टँगा था। पन्ना दो साल पहले का अटका हुआ। ऊपर से कोई नाम कैंची से काट दिया गया था, सिर्फ़ काग़ज़ का उखड़ा हुआ निशान बचा था। मैंने उस कैलेंडर को सैकड़ों बार देखा था, पर कभी सोचा नहीं कि उसमें क्या कटा है।

औरत का हाथ उस जगह पर उठा। उसने कटे हुए निशान को उँगली से छुआ। मुलायम, सूखी उँगली। उसने उसे इस तरह छुआ जैसे कोई पुराने ज़ख्म पर पट्टी टटोल रहा हो।

फिर उसका हाथ नीचे आया और वो दीवार पर टँगी तस्वीर के सामने जाकर खड़ी हो गई।

वो तस्वीर मैं रोज़ देखता हूँ। रोज़ उसके नीचे से गुज़रता हूँ। उसके शीशे पर धूल की एक पतली परत है और उसमें एक दरार है जो कोने से चलकर बीच की तरफ़ आती है।

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