A Dark Secret178 / 536

A Dark Secret – Chapter 178

7 min read November 6, 2026

"कहा, तुम्हारी बात सही है अर्जुन। तारीख़ तब लिखेंगे जब गवाह तैयार होगा।" उसने चश्मा ऊपर धकेला। "पर एक बात साफ़ कर देती हूँ। मैं दो दिन चुप रहूँगी, रोकूँगी नहीं। मेरे पास तेरह काग़ज़ हैं और एक भी गवाह नहीं। अगर ये सब कुछ सिर्फ़ काग़ज़ों में रह गया, तो मैं पूरी ज़िंदगी एक खबर के पीछे भागती रहूँगी जो कभी छपी ही नहीं।"

"छपेगी," मैंने कहा।

"कब?"

"जिस दिन काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने वाला आदमी काग़ज़ के सामने खड़ा होगा।"

हम चाचा के घर के मोड़ पर पहुँचे। गली तंग थी और उस वक़्त भरी हुई थी — एक बैलगाड़ी लोहे के पाइपों से लदी खड़ी थी, दो बच्चे पतंग की डोर में उलझे हुए थे, और एक बूढ़ी औरत बाल्टी से पानी के छींटे सड़क पर दे रही थी।

गाड़ी रोककर हम उतरे। चाचा के कपड़ों पर धूल थी और उनकी आँखों के नीचे काला घेरा।

दरवाज़े पर चाची खड़ी थीं। एक हाथ में लालटेन, दूसरे में आँचल। उन्होंने बत्ती जलाई हुई थी, हालाँकि दिन चढ़ा हुआ था। मुझे समझ आ गया — वो पूरी रात जगी थीं और लालटेन बुझी ही नहीं थी।

"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।

"कुछ नहीं हुआ, चाची," मैंने कहा। "चाचा को आज बुखार है। हल्का-सा। आज उनसे कोई सवाल नहीं।"

चाची ने मेरी तरफ़ इस तरह देखा जैसे मैंने उनके सबसे बड़े सवाल का उत्तर दे दिया हो और उस उत्तर में एक नया सवाल छिपा हो।

फिर वो बोलीं, बहुत शांति से, "अर्जुन, मैं ग्यारह साल से इनके जूते देखकर अंदाज़ा लगाती हूँ कि ये कहाँ गए थे। आज इनके जूते साफ़ हैं। और इनकी आँखें गीली हैं।"

मैंने सिर नीचा कर लिया।

"आज कोई सवाल नहीं," खुद चाची ने दोहराया। "जाओ, छत पर जाकर सो लो। तेरे हाथ काँप रहे हैं।"

वो रसोई की तरफ़ मुड़ गईं। फिर रुककर बोलीं, "और अर्जुन, अगर कल सुबह कहीं जाना है तो आज रात खाना खाकर जाना। भूखे आदमी की आवाज़ बैठ जाती है और अदालत में आवाज़ ही काम आती है।"

मैं मुस्कुराया। पहली बार उस सुबह।

छत पर जाने के लिए तीन सीढ़ियाँ हैं। पहली ठीक बोलती है। दूसरी चुप रह जाती है। तीसरी चरमराती है, और जब उस पर पैर पड़ता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में करवट ले रहा हो।

मैं ऊपर पहुँचा। मेरा कमरा जैसा था वैसा ही था — अलमारी का खोखला पेंदा खुला, चारपाई पर धूल, और कोने में औज़ारों का थैला।

मैंने अलमारी का पेंदा देखा। और मुझे अचानक लगा कि मैं उस अलमारी से जो चीज़ लेकर आया था, वो मेरी नहीं है। वो पापा की है, और वो पूरे ग्यारह साल मेरे सिरहाने पड़ी रही, मेरे बिस्तर के नीचे, मेरी ही छत पर, और मुझे पता नहीं चला।

मैंने मुँह धोया। पानी टब में गिरा और उसकी आवाज़ ने कमरे को भर दिया। मैंने आईने में देखा। मेरे बालों में धूल थी और आँखें लाल थीं। गले में वो ही हल्की नस उभरी हुई थी जो पापा की थी।

मैंने अपनी घड़ी देखी। पापा की घड़ी। वो आज आठ मिनट आगे थी। ये आगे चलना अब मज़ाक नहीं लग रहा था। अब लग रहा था कि ये सिर्फ़ आगे नहीं चल रही, ये मुझे खींच रही है।

मैंने तेल में डूबा रुमाल जेब से निकाला। उसकी गंध से मुझे गैराज याद आया — चाचा का गैराज, जहाँ मैंने पहली बार पैसा कमाया था और जहाँ पहली बार मुझे लगा था कि शहर मुझे अपना नहीं करेगा।

मैंने रुमाल वापस जेब में डाला। फिर माइक निकाला। उसकी बैटरी लगभग खत्म थी। मैंने उसे नैना का दिया केस खोलकर देखा — अंदर की छोटी बत्ती लाल हो गई थी।

मैं बैठ गया।

मैंने वो रिकॉर्डिंग सुनी। अठारह मिनट की थी। उसमें ट्रक का हॉर्न था, धूल थी, किसी की खाँसी थी, और फिर चाचा की आवाज़ थी — "क्योंकि उसके हाथ में वो डायरी थी।"

मैंने उसे मिटाया नहीं। मैंने उसे बंद किया और अपनी जेब में रख लिया। और मन में तय कर लिया कि जिस दिन ये रिकॉर्डिंग किसी काग़ज़ की तरह अदालत में बजेगी, उस दिन मैं चाचा के आँसुओं के लिए खड़े होकर माफ़ी माँगूँगा। क्योंकि अदालत में आदमी के आँसू नहीं, उसके हाथ का काम बोलता है।

शाम को मैंने खाना खाया — चाची ने रोटी के साथ वो आलू दिया जो मुझे पसंद है, और कुछ नहीं पूछा। मैंने चाचा को छत पर चढ़ने से मना कर दिया। वो नीचे आँगन में चारपाई पर लेटे रहे और मैंने देखा, उन्होंने आँखें बंद करते वक़्त अपना हाथ अपने सीने पर रखा — ऐसे जैसे कोई चीज़ भीतर संभाल रहे हों।

मैं घर से निकला।

पुराने पुल तक जाना था। मैंने सोचा था पैदल चलूँगा, पर गली के मोड़ पर जुगनू मिल गया और वो अपने साथ एक रिक्शे वाले को खींच लाया जो मुझे आधी सड़क तक छोड़ने को तैयार हो गया, इस शर्त पर कि मैं उसके रिक्शे की वो चरमराती आवाज़ पहचानकर बताऊँगा कि कौन सा पुर्ज़ा खराब है।

"तेरे पास समय नहीं है," मैंने कहा।

"मेरे पास समय है," जुगनू बोला। "मैंने चाचा जी के पीछे-पीछे पूरा दिन निकाल दिया और उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, जिसका मतलब है कि वो या तो बहुत ईमानदार हैं या बहुत डरे हुए, और दोनों में फ़र्क़ मुझे अभी नहीं पता।"

मैं हँस पड़ा। पहली बार उस दिन ज़ोर से।

"बता, क्या देखा?"

"चाचा जी घर गए। चाची ने पानी दिया। फिर वो आँगन में गए, जेब से कुछ काग़ज़ निकाले, माचिस जलाई, और फिर बुझा दी।" जुगनू ने रुककर साँस ली, जैसे खबर पढ़ रहा हो। "मैं दीवार के पीछे से देख रहा था। उन्होंने एक बार भी आग नहीं लगाई। बस माचिस जलाई और बुझा दी। तीन बार।"

तीन बार। मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया। आदमी जो काग़ज़ जलाने की कोशिश करता है और नहीं जला पाता, वो उस काग़ज़ से डरता है और उससे चिपका भी हुआ है।

"जुगनू," मैंने कहा। "कल सुबह तू ढाबे पर आ जाना। सात बजे।"

"सात बजे मैं तो रोज़ आता हूँ।"

"तो कल आठ बजे आना। और उससे पहले किसी को कुछ मत बताना, चाहे वो हमारा हो या उनका।"

उसने सिर हिलाया और सरपट भाग गया। नंगे पाँव, धूल में, और उसकी चप्पल की जगह उसके तलवों की आवाज़ थी — छप-छप।

मैं पुल पर पहुँचा तो सूरज डूब रहा था।

पुराना पुल सूखी नदी के ऊपर टूटा पड़ा है। बीच से एक हिस्सा गिर चुका है और उस जगह पर लोहे की एक झुकी हुई छड़ है जिसे देखकर लगता है जैसे पुल खुद साँस ले रहा है।

मैं तीसरे खंभे के पास बैठ गया। वहीं जहाँ कल राख वाली कटोरी मिली थी। वहाँ अब कुछ नहीं था, बस नीचे रेत पर एक गोल निशान था — जहाँ कटोरी रखी थी।

मैंने अपनी कॉपी निकाली।

वो वही कॉपी है जिसे मैंने खुद सिला था। दो कवर नहीं हैं। कवर पुरानी गत्ते का है और ऊपर मैंने अपना नाम खुद लिखा है — पेंसिल से, बड़े अक्षरों में। हर पन्ने के ऊपर एक तारीख़, नीचे आवाज़ की पहचान, और सबसे नीचे रकम।

आज मैंने पन्ना नया खोला। मैंने पेंसिल ज़ोर से दबाई, इतनी ज़ोर से कि लकड़ी की छीलन कॉपी पर गिरी।

मैंने लिखा —

एक। लाइन बदलने वाला। महेंद्र। वजह — कर्ज़, बेटी की फीस, देवा का फ़ोन। उस रात पापा ने नाम लिया। वो भागा।

मैंने रुककर उस लाइन को देखा। फिर उसके नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा — "माफ़ी का हक़ मेरा नहीं।"

फिर मैंने पेंसिल घुमाई और लिखा —

दो। केबल काटने वाला। कालू। पहचान — काली माला, भौंह पर कटा निशान, लाल प्लायर, ठक-ठक। अब कहाँ है, पता नहीं।

तीसरा। चेहरा खुरचा हुआ। फ़ोटो में चौथा आदमी। जेब में सफ़ेद रुमाल। दो साल पहले पापा की काली जिल्द वाली डायरी लेकर चाचा के घर आया। नाम — खाली।

मैंने "नाम" के आगे एक लंबी खाली जगह छोड़ दी। जानबूझकर। ताकि जिस दिन नाम पता चले, उस दिन वो जगह भर सकूँ। मेरी कॉपी में एक भी जगह ऐसी नहीं छूटती। आज पहली बार छोड़ी।

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