A Dark Secret – Chapter 177
वो आवाज़ फिर आई। ठक। और फिर ठक।
मैं सड़क के बीच खड़ा रह गया। एक ट्रक मेरे ठीक पीछे से निकला और उसकी हवा ने मेरी शर्ट को शरीर से चिपका दिया। धूल मुँह में भर गई।
मैंने कान नहीं दबाए। मैंने आँखें बंद कीं और सुना।
ये प्लायर की आवाज़ थी। पुरानी। धँसी हुई। ठक-ठक।
पर आस-पास कोई नहीं था। एक चाय वाला अपनी केतली धो रहा था, एक कुत्ता नाली के किनारे सो रहा था, और कुछ दूर एक ट्रक अपनी पेटी की मरम्मत करवाने के लिए रुका था।
मेरे हाथ काँप रहे थे। हथेली पर पसीना था और उस पसीने में देवा की दी फ़ोटो का कोना चिपक रहा था।
मैंने पहले अपनी जेब में हाथ डाला।
जेब के पास वो छोटा काला माइक लगा था जो नैना ने दिया था। मैंने उसका बटन दबाया। एक हल्की क्लिक सुनाई दी और मेरे ही शरीर से आवाज़ रुक गई।
फिर मैंने पेड़ की तरफ़ देखा। नैना गाड़ी के पीछे खड़ी थी, कैमरा गोद में, चश्मा नाक पर सरका हुआ। मैंने दो उँगली उठाईं — गाड़ी आगे लाओ।
उसकी गाड़ी का एक पहिया रिवर्स में अलग बोलता है। ऊपर की धातु से हल्की खनक आती है। वो पहिया जब घूमा, मुझे लगा कोई दूर से दांत पीस रहा है।
गाड़ी आई और रुकी।
रुक्मा दीदी फाटक पर ही खड़ी थीं। कमर पर चाबियों का गुच्छा, चेहरे पर वो शांति जो आदमी के सामने अंगारा लेकर खड़ी हो तो आती है। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरी तरफ़ देखा और बोलीं, "अंदर सब ठीक है?"
"तीनों फ़ोन बज रहे थे," मैंने कहा। "कोई नहीं उठाया।"
"हूँ।" उन्होंने चाबियों का गुच्छा दबाया। "और ये सीढ़ी वाला?"
मैं मुड़ा।
चाचा सीढ़ियों से नीचे आ रहे थे। एक हाथ रेलिंग पर, दूसरे में चश्मा। उनके पैर सीढ़ी के जिसकोने पर पड़ते, वहाँ धूल उड़ती थी और धूप में वो धूल सोने जैसी दिखती थी।
वो आख़िरी सीढ़ी पर रुके। फिर उतरे। फिर दीवार से टिक गए।
और रोने लगे।
मैंने चाचा को पहले भी रोते देखा था। तीन बार। एक बार तब जब उनकी दुकान का ताला खुला मिला था, एक बार तब जब उनकी बिटिया का रिज़ल्ट खराब आया था, और एक बार तब जब पापा की पहली बरसी पर उन्होंने मेरी थाली से पहला निवाला उठाया और पूरा घूँट पानी पीकर चले गए थे।
पर आज रोना अलग था। आज वो अपनी आवाज़ छिपाने की कोशिश नहीं कर रहे थे।
"अर्जुन," उन्होंने कहा। "मैं सुबह सबके सामने बोलूँगा। जो पूछेंगे, वो बताऊँगा। एक-एक बात।"
"सुबह की बात सुबह देखेंगे, चाचा।"
"नहीं, तू समझ—"
"चाचा।" मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "मुझे अभी एक ही बात बताइए।"
वो रुक गए।
"उस रात पापा ने आपको क्या कहा था?"
चाचा ने आसमान की तरफ़ देखा, जैसे सवाल वहाँ लिखा हो। फिर उन्होंने चश्मा अपनी शर्ट की बाँह पर पोंछा — बिना कपड़े के, बिना सोचे। और उनका चटका हुआ काँच उनके हाथ में बजा।
"उसने मेरा नाम लिया," उन्होंने कहा।
"कैसे लिया?"
"वैसे ही जैसे आज तक लेता था।" चाचा की आवाज़ टूट रही थी पर शब्द साफ़ थे। "तेरे पापा की आवाज़ में कभी चीख नहीं थी, अर्जुन। वो जब गुस्से में होते थे तो और धीमे बोलते थे। जब डरते थे तो और धीमे।"
मैंने सुना। मेरा गला सूख रहा था।
"उसने कहा — 'महेंद्र, ज़रा टॉर्च इधर रख दे, केबल ढीली है।'"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"बस इतना कहा," चाचा बोले। "बस इतना। और मैंने टॉर्च गिरा दी।"
सड़क पर एक ऑटो गुज़रा और उसका पीछे लगा लाउडस्पीकर कुछ बजा रहा था, पर मुझे सिर्फ़ टॉर्च गिरने की आवाज़ सुनाई दी — जो मैंने कभी सुनी नहीं थी, पर जिसे मैं आज सुन रहा था।
"और फिर?"
"और फिर मैं भाग गया।"
तीन शब्द। मेरे पैरों के नीचे ज़मीन नहीं थी।
मैंने उनका हाथ छोड़ दिया। मैं दो क़दम पीछे हटा। मेरी नज़र दीवार के पास पड़ी ईंटों के ढेर पर गई। वहाँ से एक ईंट मैं उठा सकता था। फेंक सकता था। और अगर देवा के दफ़्तर का कोई शीशा टूटता, तो मुझे शायद दो मिनट के लिए अच्छा लगता।
मैंने ईंट उठाई।
चाचा ने आँखें बंद कर लीं। मैंने देखा, उन्होंने आँखें बंद करके हाथ की हथेली सामने कर दी — जैसे कोई सत्तर साल का आदमी हो जो जानता है कि उसका हिसाब बाकी है।
पर मैंने ईंट नहीं फेंकी।
मैंने उसे वापस ढेर पर रख दिया। इस तरह रखा जैसे कोई बच्चा खिलौना रखता है, और उसी वक़्त मुझे समझ आया कि मेरे हाथ इसलिए काँप रहे थे कि उनमें गुस्सा और डर दोनों एक साथ भर गए थे, और अगर मैं इस वक़्त कुछ तोड़ता, तो तोड़ने के बाद मैं खाली रह जाता।
और मुझे खाली नहीं रहना था। मेरे पास चलना था।
"चाचा," मैंने धीमी आवाज़ में कहा।
वो अपनी हथेली सामने किए खड़े थे।
"मैं आपको आज माफ़ नहीं कर रहा हूँ। और मैं आपको माफ़ कर भी नहीं सकता। वो मेरा हक़ नहीं है। वो हक़ मेरी अम्मा का है, और वो गाँव में बैठी रोटी बनाती है।" मेरा गला भारी हो गया। मैंने एक साँस ली। "मगर एक बात साफ़ कह देता हूँ। आज से जो भी आप से पूछे, आप वही बोलिएगा जो आज सीढ़ी पर बोला। एक शब्द इधर-उधर किया, तो मैं आपको उसी कटघरे में खींच के लाऊँगा और आपके मुँह से अपना बयान पढ़वाऊँगा।"
चाचा ने धीरे से सिर हिलाया।
"अब घर चलिए," मैंने कहा।
"अर्जुन—"
"अब घर चलिए। और चाची को कुछ मत बताना।"
"वो—"
"चाची को कुछ मत बताना, चाचा।" मैंने रुककर उनकी तरफ़ देखा। "आप जानते हैं ना, वो मुझे बेटा कहती हैं। और मैं उन्हें आज ये नहीं सुना सकता कि उनका आदमी ग्यारह साल से किस चीज़ का ग़म अपनी जेब में लिए घूम रहा था।"
चाचा ने अपना चश्मा पहना। उनका चेहरा पहले से छोटा लगने लगा था।
रुक्मा दीदी ने पीछे से कहा, "पहले पानी पी लो।"
चाचा ने सिर हिलाया — ना में।
"मैंने पूछा नहीं था," रुक्मा दीदी बोलीं। "मैंने कहा था।"
उन्होंने अपनी कमर से एक स्टील का गिलास निकाला… नहीं, उन्होंने मुझे गिलास दिया और कहा, "इसको पिलाओ। सूखा आदमी जब रोता है तो उसकी नसें सूख जाती हैं और फिर वो अदालत में बेहोश हो जाता है। मुझे ये नहीं चाहिए।"
चाचा ने पानी पिया। उनके हाथ इस तरह काँप रहे थे कि गिलास के किनारे से पानी उनकी शर्ट पर गिरा और वहीं एक छोटा गीला निशान बन गया।
उस निशान को देखकर मुझे अचानक याद आया — कल सुबह नौ बजे। देवा का बुलावा। काग़ज़ लेकर आना।
"दीदी," मैंने कहा। "कल सुबह नौ बजे मुझे यहाँ आना है।"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "और मैं यहीं रहूँगी। फाटक पर। उनके सामने नहीं, पीछे। पर रहूँगी।"
नैना ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। चाचा पीछे बैठे। मैं आगे बैठा। नैना ने गाड़ी स्टार्ट की और उसका एक पहिया फिर बोला।
गाड़ी चल पड़ी। कुछ देर कोई नहीं बोला।
फिर चाचा ने पीछे से कहा, बिना किसी से कहे, बिना किसी को देखे, "मैंने अपने भाई की लाश के साथ अपनी आधी ज़िंदगी गाड़ दी थी। आज पहली बार उसे बाहर निकालकर देखा है।"
नैना ने ब्रेक नहीं दबाया। उसने सिर्फ़ गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी। और मैंने खिड़की के बाहर देखना शुरू कर दिया, क्योंकि अगर मैं उस वक़्त चाचा की तरफ़ देखता, तो मेरी आँखें भी वही करतीं जो उनकी कर रही थीं, और ये सुबह मुझे उसकी इजाज़त नहीं दे सकती थी।
नैना ने धीरे से कहा, "मेरे एडिटर का फ़ोन आया था।"
"क्या कहा?"
"कहा कि खबर दो दिन के लिए रोकी जा रही है। ऊपर से दबाव है। और ये भी कहा कि दफ़्तर में कल एक आदमी आया था, सफ़ेद कुर्ता, सोने की अंगूठी, और उसने बस इतना पूछा कि नैना जोशी किस कुर्सी पर बैठती हैं।"
मेरी जबड़ें कस गईं।
"उसने कुछ और कहा?"
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