A Dark Secret – Chapter 175
देवा भाई ने कुर्सी छोड़ी और खड़े हुए। उन्होंने अपना कुर्ता ठीक किया और फिर आराम से उस अलमारी की तरफ़ चले, जिसमें तीसरा फ़ोन अब भी बज रहा था।
उन्होंने दरवाज़ा खोला।
अंदर अँधेरा था, और उस अँधेरे में वो बज रहा था। उन्होंने अपना हाथ अंदर डाला।
और फ़ोन चुप हो गया।
उन्होंने हाथ बाहर निकाला। उनके हाथ में कुछ नहीं था।
और यह बात मेरे कानों में ऐसे बैठ गई जैसे कोई बोझ हो — वो फ़ोन इतनी देर बज रहा था, और वो उतनी देर तक बंद हुआ ही नहीं। किसी ने उठाया नहीं। उसने जान बूझकर बजने दिया। जैसे कमरे में मौजूद सबको यह याद दिलाना हो कि ऊपर कोई है जो सब देख रहा है।
देवा भाई वापस आकर बैठे।
"तो," उन्होंने कहा, अपनी मेज़ के काग़ज़ों को सीधा करते हुए, "कालू।"
चाचा ने सिर हिलाया।
"और तुमने यह बात किसी को बताई नहीं।"
"नहीं।"
"दस साल।"
"हाँ।"
"दस साल तक तुमने अपने भतीजे को अपने हाथ से खाना खिलाया, और तुम यह जानते थे।"
चाचा की आवाज़ बैठ गई। "मैं—"
"मैं पूछ नहीं रहा," देवा भाई बोले। "मैं बता रहा हूँ।"
उन्होंने अपना गिलास उठाया और उसे आधा खाली देखकर नीचे रख दिया। वे मेरी तरफ़ मुड़े। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो सामने वाले की क़ीमत आँक रहा हो।
"अर्जुन, तुम्हारे चाचा ने मेरे लिए काम किया था। तुम्हें यह अच्छा नहीं लग रहा होगा। पर मैं कुछ छिपाना नहीं चाहता। मैंने उनका कर्ज़ उतारा था। एक रात में। तुम पूछो क्यों?"
मैंने नहीं पूछा।
"क्योंकि मुझे उस रात एक आदमी की ज़रूरत थी," उन्होंने कहा। "और गलती करने वाले आदमी से ज़्यादा सस्ता आदमी कोई नहीं होता।"
मेरे भीतर कुछ हिला। बहुत गहरा, बहुत भारी। जैसे किसी ट्रक की छत के नीचे से एक हल्की सी घरघराहट उठती है — जिसे तुम बैठे-बैठे सुनते हो और लगता है कि यह मेरी ही साँस है।
"और कालू?" मैंने कहा।
देवा भाई मुस्कुराए। एक बहुत छोटी मुस्कान। जैसे किसी बच्चे ने पहली सही गिनती कर दी हो।
"हाँ," उन्होंने कहा। "अब बात वहाँ पहुँची जहाँ पहुँचनी चाहिए।"
उन्होंने चाचा की तरफ़ देखा।
"कालू ने बताया था कि वो मेरे लिए काम करता है?"
चाचा ने सिर नीचा कर लिया।
"वो झूठ बोलता है," देवा भाई ने कहा, बहुत प्यार से, जैसे कोई पोती को कहानी सुना रहा हो। "कालू किसी के लिए काम नहीं करता, महेंद्र। कालू सिर्फ़ अपने लिए काम करता है। उसने तुम्हें मेरा नाम दिखाया, तुम्हारा डर मेरे नाम से बाँधा, और तुम्हारी चुप्पी उसका सबसे बड़ा काग़ज़ बन गई।"
चाचा की सिसकियाँ फिर उठीं।
"तो बताओ," देवा भाई ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। "कालू को तुमने कब देखा था, उस रात? नीचे जाने से पहले, या बाद में?"
चाचा ने अपना मुँह उठाया। "बाद में।"
"कहाँ?"
"गली के मोड़ पर। वो—वो जा रहा था। उसके हाथ में—" चाचा रुके।
"क्या था?"
"प्लायर। लाल प्लायर। वो उसे घुमा रहा था। और वो ठक-ठक कर रहा था।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
और मुझे वो रात दिखी — मैं उसमें था, पर मैं देख नहीं रहा था, सुन रहा था। एक आदमी गली के मोड़ पर रुकता है, प्लायर घुमाता है, और अपनी ही आवाज़ की ताल पर चलता है। ठक-ठक। ठक-ठक। जैसे कोई अपने नाम की मुहर हर जगह दबा रहा हो।
मैंने आँखें खोलीं।
मेरा गला सूखा हुआ था। मैंने नीचे फ़र्श पर पड़े गिलास की तरफ़ देखा। चाय का गीला दाग़ फैल रहा था। काँच के टुकड़े उसमें चमक रहे थे, और उनमें से एक टुकड़ा ऐसा था जिसका किनारा बहुत तेज़ था। मैंने सोचा — अगर मैं अभी झुककर इसे उठाऊँ, तो मेरा हाथ कटेगा। और मुझे कटे हुए हाथ की इज़ाज़त देवा भाई के सामने नहीं चाहिए।
"महेंद्र," देवा भाई ने कहा। "मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ। जिस दिन तुमने मेरी बात मानी, उस दिन से तुम मेरे आदमी बन गए। मैंने तुम्हारा कर्ज़ उतारा। मैंने तुम्हारी बेटी की फीस भरी। मैंने तुम्हारे गैराज को चलाया। तुम्हारी शर्ट की क़ीमत मैं जानता हूँ। तुम्हारे जूतों की क़ीमत मैं जानता हूँ।"
उन्होंने थोड़ी देर रुककर साँस ली।
"और मैं तुम्हारी सिसकियों की क़ीमत भी जानता हूँ।"
चाचा की सिसकियाँ रुक गईं। मतलब रुकीं नहीं — टूट गईं। जैसे किसी स्टेशन पर ट्रेन आधी रुककर फिर आगे खिसक जाती है और तुम्हें लगता है कि तुमने गलत सुना।
"तो अब बताइए," देवा भाई ने कहा, और उन्होंने अपनी दोनों कोहनियाँ मेज़ पर टिका दीं, "जब कालू उस प्लायर से केबल काट रहा था, तुम कहाँ थे?"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। मैं टकरा गया — उनकी आँखों से, उनके आँसुओं से, और उनकी उस नज़र से।
"मैं—" उन्होंने कहा। "मैं गैराज के पीछे था। मैंने सुना। धातु की आवाज़ आई थी। जैसे कोई तार खींच रहा हो।"
"और फिर?"
"और फिर मैंने सोचा कि यह क्या है। और मैं आगे नहीं गया।"
"और फिर?"
"और फिर तेरे पापा ने ज़ोर से मेरा नाम पुकारा।"
कमरा हिल गया। मैं मतलब — मैं मतलब यह नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूँ कि मेरी आँखों के सामने की हर चीज़ ज़रा सी हिल गई, फिर वापस अपनी जगह आ गई। मेज़। गिलास। पंखा। देवा भाई का चेहरा।
और मेरी आँखों में पानी आ गया।
मैं नहीं जानता आप क्या सोचते हैं — कि आदमी की आँखों में तब पानी आता है जब वो रोता है। नहीं। आदमी की आँखों में पानी तब आता है जब उसे कुछ ऐसा मिल जाता है जिसका इंतज़ार उसने किया था, पर उसका यह इंतज़ार करना बंद कर दिया था। मैंने यह नहीं सोचा था कि मुझे कभी पता चलेगा कि उस रात घर से निकलते वक़्त पापा ने किसको पुकारा था।
उन्होंने अपने भाई को पुकारा था।
और भाई नहीं आया।
मैंने अपनी उँगलियों से अपनी आँखों की तरफ़ हाथ फेरा। मेरा हाथ गीला हुआ। और मैंने उसे अपने घुटने की तरफ़ नीचे कर दिया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
देवा भाई मेरी तरफ़ देख रहे थे। एक लंबी नज़र। और फिर उन्होंने अपना सिर ज़रा हिलाया।
"महेंद्र," उन्होंने कहा, "तुम अभी तक यह सोचते हो कि तुमने केबल नहीं काटी, इसलिए तुम्हारा हाथ साफ़ है।"
चाचा ने सिर उठाया।
"नहीं," देवा भाई ने कहा। "तुम जिस गाड़ी की लाइन बदलकर आए, वो तुम्हारे भाई की गाड़ी थी। तुम जानते थे कि उस रात वो उसी गाड़ी से निकलेगा। तुम्हें पता था कि उस गाड़ी में उन काग़ज़ों का डिब्बा रखा है जो मुझे चाहिए।"
चाचा की आँखें फटी रह गईं।
"काग़ज़?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "मुझे काग़ज़ों के बारे में कुछ नहीं पता था। मुझे बस इतना कहा गया था कि गाड़ी की लाइन बदलनी है।"
"अच्छा," देवा भाई बोले, बहुताँ आराम से। "तो यह जानकारी अपने आप आ गई।"
कमरे में पंखा घूम रहा था।
और मुझे कुछ सुनाई दिया — देवा भाई की आवाज़ में, "अच्छा" बोलते वक़्त, बहुत हल्की सी कंपन।
मैंने अपना सिर घुमाया। मैंने उनका चेहरा देखा। वो मुस्कुरा रहे थे। पर उनकी उँगली — जो मेज़ पर रखी थी — उसका नाखून मेज़ की लकड़ी में ज़रा दबा हुआ था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने वही किया जो मैं करता हूँ। मैं चुप रहा, और सुना।
और देवा भाई की आवाज़ में एक और चीज़ थी — जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था। बहुत छोटी। बहुत दूर। जैसे कोई गाड़ी बहुत दूर से आ रही हो, और तुम्हें अंदाज़ा हो कि वो तुम्हारी तरफ़ ही आ रही है।
"तो अब," देवा भाई ने कहा, और उन्होंने अपने हाथ मेज़ पर रखकर उँगलियाँ बजाईं, धीरे से, जैसे कोई गिनती कर रहा हो। "तुम बताओ, तुम्हारे पापा के पास क्या काग़ज़ थे?"
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