A Dark Secret174 / 536

A Dark Secret – Chapter 174

7 min read November 6, 2026

सीमा चाची का चेहरा मेरे सामने आ गया। वो छत पर अलमारी के पास खड़ी थी, उसके हाथ में लालटेन थी, और वो ₹कह रही थी — अर्जुन, तेरे चाचा ठीक हैं ना? और मैंने कहा था — हाँ चाची, ठीक हैं।

और अब वो मेरे सामने घुटनों पर थे और उनके कंधे काँप रहे थे।

कमरे में सन्नाटा छा गया। मतलब सच में। फ़ोन बजना भी अब एक अलग तरह का शोर लग रहा था — कमरे के बाहर का शोर, कमरे के अंदर का नहीं। जैसे बारिश बाहर हो रही हो और तुम अंदर बैठे सुन रहे हो।

और उस सन्नाटे में सिर्फ़ चाचा की सिसकियाँ थीं।

सिसकी — आपको पता है क्या होती है? रोना और सिसकी अलग चीज़ें हैं। रोना आवाज़ है। सिसकी आवाज़ का भी वो हिस्सा है जो आदमी रोकने की कोशिश करता है, और रुक नहीं पाता। वो गले से बाहर धक्के से निकलती है, छोटी-छोटी, और हर धक्के के साथ आदमी का पूरा शरीर उठता है।

चाचा उठते, झुकते, उठते, झुकते।

और उनका हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा, फिर झिझककर रुक गया। जैसे उन्हें याद आ गया कि अब वो हक़ खत्म हो चुका है।

"अर्जुन—"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"अर्जुन, सुन—"

मेरा गला सूख रहा था। मैंने चाय का गिलास उठाया। हाथ काँप रहा था, इसलिए मैंने गिलास को दोनों हाथों से पकड़ा।

"मैं उस रात वहाँ था।"

कमरे की हवा जैसे भारी हो गई। मुझे लगा मेरे कान बंद हो रहे हैं — वैसे ही जैसे बहुत तेज़ शोर में होता है, जब आवाज़ का सबसे ऊँचा हिस्सा अचानक चुप हो जाता है और सिर्फ़ एक धीमी सी गूँज बचती है।

"ट्रक के नीचे मैं था।"

मैंने गिलास नीचे नहीं रखा।

"पर—" चाचा ने अपना मुँह रुमाल में दबाया, फिर निकाला। "पर केबल मैंने नहीं काटी। अर्जुन, क़सम खाता हूँ तेरी माँ की, केबल मैंने नहीं—"

"तो आप वहाँ क्या कर रहे थे?"

मेरी आवाज़ उल्टी धीमी थी। मुझे यह अंदाज़ा नहीं था कि मेरी आवाज़ इतनी धीमी हो सकती है।

"बोलिए। ट्रक के नीचे। रात। आप क्या कर रहे थे?"

चाचा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उनके सारे शरीर में एक ही झटका आया।

"मेरे सिर पर कर्ज़ था," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी सूखी नदी में पानी सोच रहा हो। "तुझे पता है मेरे सिर पर कर्ज़ था।"

"मुझे यह नहीं पता था।"

"तू बच्चा था। तेरी माँ को मैंने नहीं बताया। किसी को नहीं बताया।" उन्होंने आँखें खोलीं। "रात को देवा भाई का आदमी आया। बोला— बोला कि एक छोटा सा काम है। गाड़ी की लाइन बदलनी है। बस। ट्रक को गलत लाइन पर खड़ा करना है, एक रात के लिए। उसने पैसा दिया, और मैंने—"

उन्होंने अपनी आवाज़ फिर रुमाल में दबाई, और यह बार लंबे समय तक दबाई।

मैं वहीं बैठा रहा। मेरे हाथ में गिलास था। गिलास की चाय ठंडी हो रही थी, या शायद मेरा हाथ ठंडा हो रहा था, मुझे फ़र्क़ समझ नहीं आया।

"आपको पता था कि केबल काटी जाएगी?"

वो कुछ नहीं बोले।

"पता था, चाचा?"

"मुझे—" उन्होंने साँस ली। "मुझे शक हुआ था।"

"शक हुआ था।"

"जब मैंने गाड़ी की लाइन बदली, तब भी कोई और वहाँ था। मैंने पैरों की आहट सुनी। मैं उस तरफ़ देखने ही जा रहा था कि मुझे पीछे से किसी ने खींच लिया। कहा— चल, अपना काम करके निकल। मैं निकल गया। मैं तेरे पापा की तरफ़ देखे बिना निकल गया।"

मेरे हाथ से चाय का गिलास ज़ोर से हिला। चाय बाहर निकलकर मेरी उँगलियों पर गिरी।

"बस दो मिनट," चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ अब फूट रही थी। "बस दो मिनट। मैं उस गली से निकला, और पीछे से आवाज़ आई। धातु की। फिर— फिर वो आवाज़ जो मैं आज तक सुनता हूँ।"

"आप रुके नहीं।"

"मैं भागा।"

"आप भाग गए।"

"मैं भागा," उन्होंने कहा, और वो शब्द उनके मुँह से ऐसे निकला जैसे कोई अंदर से लोहा खींच रहा हो। "मैं भागा और मैं सीधा घर पहुँचा और मैंने दरवाज़ा बंद किया और मैंने सीमा से कुछ नहीं पूछा। सीमा ने कुछ पूछा तो मैंने कहा नींद आ रही है।"

कमरे में चुप्पी।

और फिर देवा भाई हँसे।

नहीं, वो हँसी नहीं थी। हँसी कुछ देर चलती है। यह एक आवाज़ थी — जैसे किसी ने मुँह बंद रखकर हवा छोड़ी हो।

उन्होंने कुर्सी से आगे झुककर अपनी कोहनी घुटनों पर रखी और अपनी ठुड्डी हथेली पर। उनके चेहरे पर वही भाव था जो मैंने कल देखा था, जब वो बोले थे कि सच का भी दाम होता है।

"अच्छा।" उन्होंने कहा। "अच्छा।"

और फिर, चाचा की तरफ़ देखते हुए, बहुत धीरे:

"तो महेंद्र, अब अगला नाम बताओ।"

चाचा ने सिर उठाया।

"कौन—"

"जो मैंने तुम्हें उस रात पहचानने के लिए नहीं भेजा था," देवा भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो धैर्य था जो सिर्फ़ उस आदमी के पास होता है जिसके पास बहुत समय हो। "जो गाड़ी के नीचे गया था। जिसके हाथ में प्लायर था। अब बताओ, केबल किसने काटी?"

चाचा के होंठ हिले। कोई आवाज़ नहीं निकली।

"बोलो, महेंद्र।"

और मेरे हाथ से चाय का गिलास छूट गया।

यह मुझे पहले से पता नहीं था। मैंने गिलास छोड़ने का फ़ैसला नहीं किया था। मेरी उँगलियाँ खुद खुल गईं, जैसे उनसे किसी ने बलपूर्वक चीज़ छीन ली हो।

गिलास नीचे गिरा। फ़र्श पत्थर का था। काँच का गिलास पत्थर पर गिरकर एक ही आवाज़ नहीं करता — वो टूटता है, और उसके टूटने की आवाज़ में कई हिस्से होते हैं। पहले एक तेज़ टन। फिर एक कटी हुई चीख जैसी आवाज़। फिर कई छोटी-छोटी ठक-ठक, जैसे काँच के टुकड़े फ़र्श पर नाच रहे हों और धीरे-धीरे थम रहे हों।

चाय फ़र्श पर फैल गई। गीला पत्थर गहरा दिखने लगा।

कोई नहीं हिला।

मुनीम जी ने अपनी कुर्सी ज़रा पीछे सरकाई, फिर रुक गए, जैसे उन्हें लगा कि हिलना ग़लत बात होगी।

चाचा ने अपनी आँखें बंद कर लीं, और उनके दोनों हाथों ने उनके घुटने पकड़ लिए — दोनों तरफ़ से, उँगलियाँ अंदर की तरफ़ मुड़ी हुईं।

और उस टूटते काँच के शोर में, उसके आख़िरी ठक-ठक के बीच, देवा भाई की आवाज़ घुल गई। ऐसी आवाज़ जैसे किसी ने दूध में शहद डाल दिया हो।

"अब बताओ महेंद्र। केबल किसने काटी?"

और मैं गिलास के टुकड़ों को देखने के बजाय चाचा के हाथों को देख रहा था।

क्योंकि उनके हाथ काँप रहे थे। और मैंने वो काँपना पहले भी देखा था — कल, गैराज में, जब मैंने उनके सामने पीली पर्ची रखी थी। और उससे पहले, उस रात, जब वो मुझसे कह रहे थे कि अर्जुन, तेरे पापा ने मेरे लिए क्या किया, वो तू नहीं जानता।

अब मैं जानता था।

चाचा ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों से पानी गिर रहा था, और उस पानी के पीछे जो था वो डर नहीं था। वो कुछ और था। वो वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो अपने ही किए हुए काम का नाम लेने वाला हो — ज़िंदगी में पहली बार।

उन्होंने अपना मुँह खोला।

"कालू," उन्होंने कहा।

और मेरे कान में एक आवाज़ आई — ज़ोर की नहीं, हल्की सी, जैसे कोई पुरानी गाड़ी धीरे-धीरे पास आ रही हो। कालू। वही कालू, जिसकी जेब में लाल प्लायर ठक-ठक करता था। वही कालू, जो मुझसे पीतल की चाबी और काग़ज़ माँगने आया था, काली माला पहने, भौंह पर कटा निशान।

और अब नाम आ गया था।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला — नहीं, मैं नहीं जानता क्यों, मैंने हाथ डाला और मुझे तेल में डूबा रुमाल छू गया। और मुझे लगा कि मेरी कलाई पर पापा की घड़ी कुछ और ज़ोर से टिक-टिक कर रही है।

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। एक बार।

"अर्जुन," उन्होंने कहा। "मैंने यह नहीं सोचा था कि कभी बोलूँगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उस गिलास को देख रहा था जो टूटा पड़ा था, और सोच रहा था कि कल — कल मैंने यह सोचा भी नहीं था कि मेरे हाथ से चीज़ गिरेगी।

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