A Dark Secret173 / 536

A Dark Secret – Chapter 173

7 min read November 6, 2026

उन्होंने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा और पीछे की तरफ़ देखा — दरवाज़े की तरफ़।

"बैठ बेटा," वो बोले, "आज तेरा चाचा खुद बोलेगा।"

दरवाज़ा खुला।

चाचा अंदर आए।

वो अपनी सस्ती शर्ट में थे, जिसके कॉलर से एक धागा लटक रहा था, और उन्होंने उसे सीधा करने की कोशिश भी नहीं की। उनके हाथ जुड़े हुए थे, सीने के सामने, जैसे कोई मंदिर में खड़ा हो। उनका चश्मा उनकी जेब में ही था, इसलिए उनकी आँखें साफ़ दिख रही थीं, और वो आँखें डबडबाई हुई थीं।

वो मेरे पास आए, फिर रुक गए।

"अर्जुन।"

"चाचा।"

"मैं—" उनकी आवाज़ टूटी। उन्होंने गला साफ़ किया और फिर से बोले। "मैं आज कुछ नहीं छिपाऊँगा।"

"बैठिए," देवा भाई ने कहा, बहुत प्यार से। "बैठो, महेंद्र।"

चाचा बैठे। उनके घुटने सीट से टकराए और उन्होंने अपने घुटनों पर हाथ रखकर उन्हें दबाया।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैं उस आदमी को देख रहा था जिसने मुझे हर रविवार खाना खिलाया था। जिसने मेरे हाथ से रोटी ली थी। जिसने मुझे कहा था कि बेटा, बड़े शहर में अकेले रहना पड़ता है, आदमी को मुँह सीखना पड़ता है।

मेरा गला सूख रहा था। मैंने एक और घूँट लिया और गिलास नीचे रखा। काँच की आवाज़ मुझे कुछ ज़्यादा ही तेज़ सुनाई दी।

देवा भाई ने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई। उन्होंने चाचा की तरफ़ देखा।

और फिर वो बोले।

"बोल महेंद्र, जो उस रात देखा।"

और उसी पल — मैं क़सम खाकर कहता हूँ, उसी पल — कमरे का हर फ़ोन एक साथ बज उठा।

मेज़ पर पड़ा काला फ़ोन। मेज़ पर उल्टा पड़ा सफ़ेद फ़ोन, जो अपने आप सीधा होकर बजने लगा, जैसे किसी ने उसे हवा में घुमा दिया हो। और तीसरा — अलमारी के अंदर वाला, जो दो बार बजकर रुक जाता था, आज लगातार बज रहा था, एक ही सुर में, जैसे कोई अंदर से दरवाज़ा पीट रहा हो।

देवा भाई की उँगली चाय के गिलास पर रुक गई।

मुनीम जी के हाथ से चम्मच छूट गया और क़ालीन पर गिरा।

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे और उन आँसुओं के पीछे कुछ और था — वो चीज़ जो इंसान के चेहरे पर तब आती है जब वो बहुत दिनों से डर रहा हो और अचानक उसे पता चले कि डरने वाली बात अब शुरू हो रही है।

मैंने कुर्सी के हत्थे पर हाथ कसा।

और अलमारी का फ़ोन बजता रहा।

॥

फ़ोन बजते रहे।

तीनों। एक साथ। एक ही सुर में नहीं — तीन अलग-अलग सुरों में, जैसे तीन जानवर एक ही पिंजरे में अलग-अलग चीख रहे हों। काला फ़ोन छोटे-छोटे अंतराल पर काँप रहा था, जैसे कोई उँगली से उसे थपथपा रहा हो। सफ़ेद फ़ोन सीधा होकर बज रहा था, और उसकी घंटी में एक ऐसी चमक थी जो कमरे में फैलती जा रही थी। और अलमारी वाला — वो तो जैसे रो ही रहा था। लगातार। बिना साँस लिए।

मुनीम जी झुककर अपना चम्मच उठाने लगे, फिर रुक गए। उनका हाथ हवा में ही टँगा रह गया। उन्होंने एक बार देवा भाई की तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़, फिर अपने हाथ की तरफ़ — जैसे उन्हें खुद याद नहीं आ रहा था कि चम्मच क्यों गिरा।

देवा भाई ने अपनी उँगली गिलास से हटाई। उन्होंने गिलास को होंठों तक उठाया, एक घूँट लिया, और फिर बहुत आराम से गिलास नीचे रखा। उनके चेहरे पर एक भी ऐंठन नहीं थी। जैसे तीन फ़ोन एक साथ बजना उनके दिन का तय कार्यक्रम हो।

"छोड़ दो," उन्होंने मुनीम जी से कहा, बिना उनकी तरफ़ देखे। "बजने दो।"

मुनीम जी ने चम्मच उठाया और मेज़ के किनारे रख दिया।

चाचा ने अपनी जेब से रुमाल निकाला। कमल का रुमाल — मैं उसे पहचान गया, वही जो पिछले रविवार उन्होंने मेरी थाली के नीचे बिछाया था। उन्होंने उससे अपना माथा पोंछा, और फिर वो कुछ बोलने के लिए मुँह खोला।

"मैं—" उनकी आवाज़ काँपी, फिर उन्होंने गला साफ़ किया। "उस रात मैं मंदिर गया था। शाम को। छह बजे। पुजारी जी को पता है—"

मैंने उनकी आवाज़ सुनी।

और मुझे कुछ और सुनाई दिया।

आपको बताता हूँ इसका मतलब क्या है। दुनिया में लोग सोचते हैं कि झूठ बोलने वाले की आवाज़ तेज़ हो जाती है या धीमी हो जाती है। ऐसा नहीं है। झूठ बोलते वक़्त आदमी की आवाज़ के नीचे एक और आवाज़ चलती है — बहुत हल्की, बहुत पतली, जैसे किसी गाड़ी के इंजन में एक नट ढीला हो और वो सड़क पर चलती रहे। ऊपर से तुम्हें सब ठीक सुनाई देता है। इंजन गरज रहा है, गाड़ी भाग रही है। पर नीचे, बहुत नीचे, वो एक ठन-ठन चलती रहती है।

और मैंने उसी को सुना।

चाचा की आवाज़ में, "मंदिर गया था" बोलते वक़्त, ठन-ठन हो रही थी।

मैंने कुर्सी का हत्था छोड़ा।

"चाचा।"

वो रुक गए।

"चाचा," मैंने फिर कहा। मेरी आवाज़ मुझे अजीब लगी — जैसे किसी और की आवाज़ हो, जो मेरे गले से निकल रही हो। "मंदिर छह बजे बंद हो जाता है। आपको पता है।"

उनके होंठ खुले रह गए।

"और आपके जूते," मैंने कहा। "कल रात आपके जूते गीले थे। तले में काली चिकनी मिट्टी थी, और ऊपर सफ़ेद बारीक रेत। वो मिट्टी उसी जगह की है, जहाँ मोती का ट्रक पलटा था। नाले के किनारे की मिट्टी। उस रात बारिश हुई थी, चाचा। मंदिर के रास्ते में नाली नहीं है।"

कमरे में एक अजीब सी चुप्पी आ गई।

और फिर मैंने वो कहा जो मैंने खुद से हज़ार बार दोहराया था, हर रात, छत पर, तारों को देखते हुए।

"आप यहाँ सच बोलने आए हैं या एक और कहानी सुनाने? क्योंकि अगर कहानी है, तो मुझे पता है कि—"

मैं रुक गया। मेरा गला बैठ गया था। मैंने साँस ली।

"अब और झूठ नहीं।"

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। और वो नज़र — मैं उस नज़र को कभी नहीं भूलूँगा। वो नज़र वो नहीं थी जो एक आदमी अपने भतीजे को देता है। वो नज़र वो थी जो एक आदमी तब देता है जब वो खुद से यह पूछ रहा हो — क्या मैं अब भी कुछ बचा सकता हूँ?

देवा भाई ने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई। उनकी कुर्सी की लकड़ी चरमराई। उन्होंने अपना चश्मा जेब से निकाला और उसे कमीज़ से पोंछना शुरू किया। बहुत आराम से। जैसे किसी को जल्दी ही न हो।

"महेंद्र," वो बोले।

चाचा ने सिर उठाया।

"तेरी बेटी है ना?"

चाचा का सारा शरीर एक झटके में सख़्त हो गया।

"स्कूल जाती है? नौवीं में?"

"जी—जी साहब।"

"कितनी पढ़ाकर डॉक्टर बनाना चाहते हो?"

चाचा कुछ नहीं बोले।

"और गैराज," देवा भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ में वही मिठास थी जो मुझे अब किसी दवा की गंध जैसी लगती थी। "यादव मोटर गैराज। हर महीने का हिसाब। तेरे पास कोई हिसाब का काग़ज़ है?"

चाचा का होंठ काँपा।

"मैं—"

"मैं तुझे बताता हूँ," देवा भाई ने कहा। "पिछले छह महीने से तू मुझे हिसाब नहीं दे रहा। मैंने कभी पूछा? मैंने एक बार पूछा तूने कहा कि बाज़ार ठीक नहीं है। मैंने कहा ठीक है। मुझे क्या करना है तेरे हिसाब से? मैं तो तेरे पापा के ज़माने का आदमी हूँ।"

चाचा का सारा शरीर धीरे-धीरे झुक रहा था। जैसे कोई इमारत बिना आवाज़ के बैठ रही हो।

"और बेटी की फीस," देवा भाई ने कहा। "कितनी है? दो हज़ार से ऊपर है? मुझे पता है। मुझे सब पता है, महेंद्र। हर महीने का तारीख़। हर महीने की रकम। मुझे पता है तेरे घर में कितने दिन दूध आता है।"

मेरा हाथ कुर्सी के हत्थे पर था। मैं उसे पकड़े हुए था, और मुझे लग रहा था कि अगर मैंने उसे न पकड़ा होता तो मैं उठकर खड़ा हो जाता।

देवा भाई ने आगे झुककर चाचा की तरफ़ देखा।

"तो अब बताइए, महेंद्र, जो उस रात देखा।"

और चाचा के घुटने टूट गए।

मैं झूठ नहीं बोलूँगा — मैंने उन्हें गिरते देखा। मैंने देखा कि उनके घुटने से पहले सीट छोड़ी, और फिर वो अपने ही वज़न से टूटकर नीचे गए। उनके घुटने ज़मीन से टकराए। एक आवाज़ हुई — और वो आवाज़ मेरे कानों में आज तक ठहरी हुई है।

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