A Dark Secret – Chapter 172
घिसा हुआ शीशा। पीतल की किनारी जो उँगली से छूने पर ठंडी होती है। पट्टा जो चमड़े की तरफ़ से पसीने से गीला रहता है, और अंदर की तरफ़ एक निशान, जैसे किसी ने सुई से खुरचा हो।
घड़ी पाँच मिनट आगे चलती थी। मेरे पापा कहते थे, दुनिया जितनी देर करती है, हम उतने आगे रहेंगे। मैंने उसे कभी ठीक नहीं किया। अब वो आठ मिनट आगे है। और उसका टिक-टिक पहले जैसा साफ़ नहीं है। उसमें कोई सफ़ाई नहीं रही। जैसे अंदर के पुर्ज़े भी थक गए हों और अब बस काम चला रहे हों।
मैंने घड़ी कान के पास लाई और उसे सुना।
धातु की घिसाई। हवा का रिसाव। और वो तीसरी आवाज़ — बहुत हल्की, धीमी, जैसे किसी दूर के कमरे में कोई काँप रहा हो।
मैंने आँख बंद की।
"पापा," मैंने धीरे कहा, "आपने ये घड़ी पहनी थी उस रात।"
हवा ने सीटी मारी।
"आपके पास वो रजिस्टर था। आप जानते थे कि कौन क्या कर रहा है। आप उस रात किसी से मिलने जा रहे थे और माँ को कुछ नहीं बताया। आपने चाचा से कहा कि रजिस्टर मिले तो जला देना। पापा, आप एक आदमी को छोड़कर सबसे ज़्यादा किसी से डरे थे — और वो आदमी अब मुझे सुबह नौ बजे अपने कमरे में बुला रहा है, बेटा कहकर।"
घड़ी टिक-टिक करती रही।
"मैं डरा हुआ हूँ," मैंने कहा। "ये मैं किसी को नहीं बताऊँगा, पर आपको बता रहा हूँ। मैं डरा हुआ हूँ, पापा। क्योंकि जब आप उस आदमी से मिलने गए थे, तो लौटकर नहीं आए।"
और फिर मेरी जेब में फ़ोन बजा।
मैंने उसे निकाला। स्क्रीन पर नाम नहीं था। सिर्फ़ एक नंबर, जिसे मैंने कभी सहेजा नहीं था, पर जिसे मैं पहचानता था — चाचा का पुराना फ़ोन, वो जो उन्होंने गैराज की दराज़ में रखा हुआ है और जिसकी घंटी में एक अजीब सी भिनभिनाहट है।
मैंने उठाया।
"अर्जुन?" आवाज़ दबी हुई थी। धीमी। जैसे कोई चादर के नीचे बोल रहा हो।
"हाँ, चाचा।"
"तू कहाँ है?"
"आप कहाँ हैं?"
एक लंबी साँस। फिर वो आवाज़ जो बीच में हल्की फटती है, जैसे पुराने रेडियो पर कोई गा रहा हो।
"अर्जुन, मैं सच बोलने वाला हूँ।"
मैंने उँगली घड़ी के शीशे पर रखी और वहीं रोक दी।
"कल सुबह। वहाँ। सबके सामने।"
"अच्छा।"
"पर एक बात है।"
"बोलिए।"
"तू अकेला आइयो।"
मैंने आँखें खोलीं। सूखी नदी के पत्थर चाँद की रोशनी में सफ़ेद दिख रहे थे, एक-एक करके, जैसे कोई हड्डियाँ बिछा गया हो।
"अकेला?"
"हाँ।"
"चाचा, सुनिए।" मैंने आवाज़ नीची की। "पिछली बार जब मैं आप पर भरोसा किया था, आपने मुझे बताया था कि आप उस रात स्टैंड पर बैठे थे और फिर मंदिर गए थे। वो मंदिर छह बजे बंद हो जाता है, चाचा। और आपके जूतों पर उस नाली की काली चिकनी मिट्टी थी जो सिर्फ़ मोती के पलटे ट्रक के नीचे मिलती है।"
चुप्पी।
"मैं आपसे गुस्सा नहीं कर रहा। मैं आपको बता रहा हूँ कि मैं कितना जानता हूँ। ताकि आप कल मुझे फिर से बच्चा न समझें।"
फिर वो बोले और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था। वो आदमी जो हर बात में "भईया तेरे पापा ने मेरे लिए क्या किया" घुसाता था, वो आदमी अब सिर्फ़ एक छोटी सी बात कह रहा था।
"अर्जुन, आज अगर मैंने झूठ बोला, तो मुझे कभी मत माफ़ करना।"
मैंने एक पल सोचा। मैंने उसकी आवाज़ सुनी। उसमें डर था, हाँ। पर उसमें दो हिस्से थे — एक वो जो काँप रहा था, और एक वो जो पहले कभी नहीं काँपा था, जो अब जाग रहा था।
"नहीं करूँगा," मैंने कहा। "अगर आज भी झूठ बोला, तो मैं आपको कभी माफ़ नहीं करूँगा, चाचा। आपने मुझे दिल्ली बुलाया था। आपने मुझे अपनी छत पर कमरा दिया था। आपने मुझे हर रविवार अपने हाथ से खाना खिलाया। अगर वो सब झूठ था, तो माफ़ी नहीं होगी। सिर्फ़ सज़ा होगी।"
दूसरी तरफ़ साँस का शोर आया, फिर वो लाइन कट गई।
मैंने फ़ोन जेब में रखा और आकाश की तरफ़ देखा। मुझे लगा कि अगर मैं अभी उठकर गाड़ी की तरफ़ चलूँगा और बगल में जंग लगे ड्रम के पास देखूँगा, तो मुझे कोई मिल जाएगा।
मुझे कोई नहीं मिला।
पर जब मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा, तो मेरे पैर के नीचे एक चीज़ चटकी। मैंने झुककर देखा — पुरानी मिट्टी की कटोरी का टुकड़ा। उस कटोरी में राख थी, अभी भी हल्की गरम, और राख के नीचे एक पुरानी पर्ची चिपकी हुई थी जिसका आधा नाम मिट चुका था।
मैंने पर्ची उठाई, झाड़ी, और जेब में रख ली।
सुबह साढ़े आठ बजे मैंने पीला ट्रक धोया। पोंछा नहीं, धोया। मैंने उसके आगे का टेप वाला हेडलाइट साफ़ किया, बंपर ठीक किया, और बोनट पर हाथ फेरकर देखा कि कहीं ज़ंग न हो। ट्रक का पीला रंग अब भी वैसा ही था, जैसा उस तस्वीर में था जो मुझे कबीर से मिली थी।
आठ बजकर पचास मिनट पर मैंने माइक जेब के पास लगाया।
नैना ने कहा, "खाँसी याद है?"
"याद है।"
रुक्मा दीदी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, चाबियाँ झनकाईं और बोलीं, "मैं बाहर फाटक पर खड़ी रहूँगी। अगर कोई गाड़ी अंदर आए और मेरे पास से निकले, तो मैं उसकी नंबर प्लेट की फोटो नहीं लूँगी — मैं उसका पहिया खोल लूँगी।"
मैं हँसा। उस वक़्त हँसना ज़रूरी था।
नैना की गाड़ी मैंने काँच की इमारत से पहले एक पुराने पेड़ के पीछे खड़ी कर दी थी। रुक्मा दीदी उसके पास ही रहीं। और मैं ठाकुर ट्रांसपोर्ट के दरवाज़े की तरफ़ चला।
सड़क खाली थी। टोल पर आज कम रौनक थी — हड़ताल का असर। दूर कुछ ड्राइवर बेंच पर बैठे थे और चाय पी रहे थे, बिना बात किए, जैसे सब को पता हो कि आज की सुबह थोड़ी भारी है।
दरवाज़ा बंद था।
मैंने दस्तक दी।
तीन सेकंड बाद अंदर से पैरों की आवाज़ आई। चप्पल की आवाज़ नहीं थी — ये कोई और था। ज़ंजीर खुली, कुंडी हटी, और दरवाज़ा थोड़ा सा खुला।
मुनीम जी बाहर झाँक रहे थे। वही पतला चेहरा, वही चटका चश्मा जिसका एक काँच टूटा है, वही आधी बाहर निकली घड़ी जिसका पट्टा दो जगह से सिला हुआ है।
"आ गए तुम," उन्होंने कहा। "साहब बैठे हैं।"
"आप कैसे हैं, मुनीम जी?"
वो रुक गए। ऐसे देखा जैसे कोई आदमी उनसे पूछे ही नहीं।
"ठीक हूँ," उन्होंने कहा। "अंदर आओ।"
कमरा वैसा ही था। ठंडा। चाय की महक। दरी पर जूते के निशान। छत का पंखा जो हर चक्कर पर ठुनकता है, जैसे कोई बूढ़ा आदमी हर साँस पर हुंकारता हो। मेज़ पर दो फ़ोन — एक काला, एक सफ़ेद, जो उल्टा पड़ा था। कोने में वो हरी लोहे की अलमारी, जिसके ऊपर तीन खाने हैं और नीचे दो दरवाज़े, और जहाँ हाथ लगता है वहाँ पुताई घिसी हुई है।
और आज अलमारी से कोई घंटी नहीं आ रही थी।
देवा भाई कुर्सी पर बैठे थे। सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, सोने की अंगूठी, चश्मा जेब में। उनके सामने मेज़ पर एक कप और एक छोटा चम्मच।
उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुरा दिए।
वो मुस्कान। वही जो इंसान के चेहरे पर नहीं, आवाज़ पर आती है।
"आओ, बेटा। बैठो।"
मैं बैठ गया। मुनीम जी ने मेरे सामने चाय का गिलास रखा — काँच का गिलास, जिसमें चाय ऊपर तक भरी थी, और इलायची की महक उठ रही थी।
"चाय पियो," देवा भाई बोले। "आज सुबह की पहली चाय है।"
मैंने गिलास उठाया और एक घूँट लिया।
"आपने बुलाया था," मैंने कहा।
"हाँ।"
"मैं आ गया।"
"मुझे पता था तुम आओगे।" उन्होंने मेज़ पर उँगली रखी और उसे धीरे से खुरचा। "तुम्हारे पापा भी आते थे। बिना डर। ऐसे ही बैठते थे, जहाँ तुम बैठे हो।"
"मेरे पापा आपसे मिलने आते थे?"
"आते थे।" उन्होंने कहा। "और मैं उन्हें कभी खाली हाथ नहीं भेजता था।"
कमरे में चुप्पी आ गई। पंखा ठुनका।
"आज मैं तुम्हारे सामने कुछ नहीं कहूँगा," देवा भाई ने कहा। "आज मैं सिर्फ़ सुनूँगा।"
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