A Dark Secret164 / 536

A Dark Secret – Chapter 164

7 min read November 6, 2026

उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी। उन्होंने सस्ती शर्ट पहनी हुई थी जिसकी कॉलर से धागा लटक रहा था। उनके एक हाथ में छेनी थी और दूसरे हाथ में — टेप रिकॉर्डर।

वो पुराना, धूल में सना, काला भूरा रिकॉर्डर। जिसका बैटरी का ढक्कन गायब था। जिसके ऊपर के चार बटन घिस चुके थे।

उन्होंने उसे गोद में रखा हुआ था और उसकी पीली लेबल वाली तरफ़ देख रहे थे।

मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया।

"चाचा।"

वो उछल पड़े।

छेनी हाथ से छूटकर फ़र्श पर गिरी और घूमकर फिसल गई। और रिकॉर्डर उनके हाथ से छूटकर नीचे जाने लगा।

मैंने उसे हवा में पकड़ा।

मेरा घुटना ज़मीन से टकराया, हाथ में दर्द उठा, पर रिकॉर्डर मेरी छाती से चिपक गया।

मैंने उसे उठाया और अपने दोनों हाथों से पकड़कर देखा। ऊपर की जाली में धूल थी। बगल से एक पेंच गायब था। पर पीली लेबल वहीं थी, और उस पर पापा की हरी स्याही में लिखी एक पंक्ति — जो इसे सुने, वो अकेला न सुने।

मैंने रिकॉर्डर सीने से लगाया और चाचा की तरफ़ देखा।

वो ज़मीन पर बैठे थे, एक हाथ पीछे टिका था, और उनका मुँह खुला था। उनकी साँस ऐसी चल रही थी जैसे वो सीढ़ियों से दौड़कर आए हों।

"अर्जुन," उन्होंने कहा। "अर्जुन, मैं… मैं अपना चश्मा खोज रहा था।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"चश्मा," उन्होंने दोहराया। "वो मोटा वाला। कहीं रख दिया। तू जानता है, मेरी नज़र अब…"

"चाचा।"

"हाँ?"

"आपका चश्मा आपकी शर्ट की जेब में है।"

वो रुक गए।

मैंने ठुड्डी से इशारा किया।

उन्होंने नीचे देखा। उनकी शर्ट की सीने वाली जेब से मोटे चश्मे का एक काँच आधा बाहर निकला था, और उस पर से धूल पोंछने की उँगली की लकीर बनी हुई थी।

कमरे में सन्नाटा उतर आया।

नीचे आँगन से चाची की आवाज़ आई — "कौन है? अर्जुन, तू है?" — पर मैंने जवाब नहीं दिया। चाचा ने भी नहीं दिया।

मैंने कमरे को एक बार फिर देखा। बिस्तर के नीचे से निकाली गई धूल की लकीरें फ़र्श पर बनी थीं। अलमारी का दरवाज़ा खुला था और उसके अंदर साड़ियाँ उलटी पड़ी थीं।

"आप क्या ढूँढ रहे थे?" मैंने पूछा।

"अर्जुन, बैठ। पहले पानी पी। तेरा चेहरा…"

"चाचा, क्या ढूँढ रहे थे?"

उन्होंने होंठ चाटे। उनकी गर्दन के पीछे हाथ गया — वही हरकत, वही पुरानी हरकत जो बचपन में मुझे दिखती नहीं थी और अब सबसे पहले दिखती है।

फिर वो अचानक खड़े हुए।

दो कदम में मेरे पास आए और मेरा बैग उठा लिया।

"दे दे," उन्होंने कहा।

"क्या दे दूँ?"

"रजिस्टर।" उनकी आवाज़ बदल गई थी। अब वो लाड़ वाली आवाज़ नहीं थी, न ही डर वाली। इसमें कुछ और था। भूख जैसा। "वो काला रजिस्टर। तेरे पास है, मुझे पता है। चाची ने बताया कि तू छत पर रात भर बैठा था। दे दे अर्जुन। दे दे, जान बच जाएगी।"

"किसकी जान?"

"मेरी।" उन्होंने बैग मेरी तरफ़ बढ़ाया, जैसे मैं उसमें रजिस्टर डाल दूँ और बात खत्म हो जाए। "तेरी भी। तेरे पापा की तो बच नहीं सकी, पर तेरी बच सकती है।"

मैं वहीं खड़ा रहा।

और मेरे भीतर का गुस्सा — जो सीढ़ी चढ़ते वक़्त आग की तरह चढ़ रहा था — अचानक ठंडा हो गया।

यह मेरे साथ पहले भी हुआ था। गुस्सा जब हद से ज़्यादा हो जाता है, तो मेरी आवाज़ उल्टी धीमी हो जाती है। बाहर से लगता है कि मैं शांत हूँ। अंदर से लगता है कि मैं मर रहा हूँ।

"चाचा," मैंने कहा। बहुत धीरे। "आपको याद है वो रात?"

वो रुक गए।

"कौन सी रात?"

"जिस रात पापा का ट्रक पलटा।"

उनका हाथ बैग पर कस गया।

"इस घर में," मैंने कहा, "मैं दस महीने रहा। आपने मुझे अपनी छत दी, अपना खाना दिया, हर रविवार मेरे हाथ का बना खाना खाया। और मैं आपको अपने पापा जैसा मानता था।"

"अर्जुन…"

"पर उस रात के बाद," मैंने कहा, "ये घर मेरा नहीं रहा।"

चाचा का चेहरा टूटा।

मैंने उनकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। मेरी आवाज़ अब भी धीमी थी, इतनी धीमी कि मुझे खुद अपनी बात सुनने के लिए रुकना पड़ा।

"उस रात आपके जूते कीचड़ से भरे थे। वो कीचड़ नाली की थी, चाचा। वही काली चिकनी मिट्टी जो मोती के पलटे ट्रक के नीचे मिलती है। और उस पर सफ़ेद बारीक रेत। और आपने मुझे बताया कि आप स्टैंड पर बैठे थे और फिर मंदिर गए थे। वो मंदिर छह बजे बंद हो जाता है।"

"अर्जुन, मैं…"

"और आपकी जेब से वो पीली पर्ची गिरी।" मैंने जेब से पर्ची निकाली और उनके सामने खड़ी कर दी। "ठाकुर ट्रांसपोर्ट। डीज़ल तीन सौ बीस लीटर। रास्ते का नुक़सान एक लाख पचास हज़ार। और पापा के रजिस्टर में आपके नाम उधार एक लाख पचास हज़ार। दोनों जगह एक ही रकम, चाचा। इतना हिसाब किसी की किस्मत में नहीं होता। इतना हिसाब बनाया जाता है।"

चाचा ने बैग छोड़ दिया।

बैग फ़र्श पर गिरा और उसका सामान फिर बिखर गया।

"तू समझता क्या है?" उनकी आवाज़ चीख के किनारे पर थी। "तू समझता है मैंने खुशी से किया? तेरे पापा मेरे भाई थे। बड़े भाई। जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब उन्होंने मुझे खड़ा किया। उन्होंने मेरी शादी कराई। उन्होंने ये घर…"

"तो उस रात आप वहाँ क्यों थे?"

"क्योंकि मेरे सिर पर कर्ज़ था!" उन्होंने अपनी छाती पर हाथ मारा। "समझता है तू? उस वक़्त मेरी गर्दन तक पानी आया हुआ था। बेटी छोटी थी, बीवी बीमार, गैराज का किराया तीन महीने बाक़ी। और एक आदमी आया और उसने कहा कि एक रात का काम है — बस ट्रक की लाइन बदलनी है। बस लाइन, अर्जुन। बस लाइन।"

"और केबल?"

वो चुप हो गए।

सन्नाटा इतना गहरा था कि मुझे नीचे आँगन में चाची की चूड़ियों की आवाज़ सुनाई दी।

"केबल मैंने नहीं काटी," उन्होंने धीमे से कहा।

"पर आप जानते थे कि कौन काटेगा?"

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

"आप जानते थे," मैंने कहा। "और आपने मुझे दस महीने अपनी छत पर रखा। हर रविवार मेरे हाथ का खाना खाया। और जब मैंने उस रात के बारे में पूछा, तो आपने कहा — भईया तेरे पापा ने मेरे लिए क्या किया, मैं कभी नहीं भूलूँगा।"

"अर्जुन…"

"आपने नहीं भूला, चाचा।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "आपने याद रखा। हर रोज़ याद रखा। इसीलिए हर रविवार मेरे हाथ का खाना खाते थे — क्योंकि वो खाना खाते वक़्त आपको लगता था कि हिसाब बराबर हो रहा है।"

चाचा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

और मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

मैंने ज़ोर नहीं लगाया। बस पकड़ा। उनकी कलाई पतली थी, और उस पर एक पुरानी घड़ी बंधी थी जो रुकी हुई थी — जैसे इस घर में सब कुछ रुका हुआ है।

"चलिए," मैंने कहा।

"कहाँ?"

"नीचे।"

"अर्जुन, सुन तो…"

"नीचे, चाचा।"

मैं उन्हें सीढ़ियों की तरफ़ ले गया। पहली सीढ़ी ठीक बोली। दूसरी चुप रही। तीसरी चरमराई। और आज मुझे उस चरमराहट में कुछ और सुनाई दिया — जैसे कोई पुराना ताला खुल रहा हो।

चाची आँगन में खड़ी थीं।

उनके हाथ में लालटेन थी और उनकी आँखें लाल थीं। मेरी छोटी बहन दरवाज़े के पीछे खड़ी थी, उसके हाथ में स्कूल की कॉपी थी और उसने अपनी उँगली कॉपी के कोने पर रखी हुई थी।

"अर्जुन," चाची ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "अर्जुन, मत कर। ये तेरा चाचा है।"

"चाची, आप अंदर जाइए।"

"मैं नहीं जाऊँगी!" वो बीच में आ गईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "अर्जुन, तू बच्चा है। तू नहीं जानता ये लोग क्या करते हैं। तेरे पापा को क्या हुआ, वो तूने देखा नहीं, मैंने सुना है। मैंने रात भर ये सोचा है कि मैं तुझे यहाँ से भेज दूँ। मैंने दुआ माँगी है कि तू ये काग़ज़ लेकर कहीं दूर चला जा।"

"चाची।"

"और अब तू अपने ही चाचा को…"

"चाची!" मेरी आवाज़ पहली बार उठी। और फिर वहीं गिर गई। "चाची, अब आप मुझसे ये मत कहिए। अब ये मेरा चाचा नहीं है।"

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