A Dark Secret – Chapter 165
चाची रुक गईं। उनके हाथ से लालटेन हिली और दीवार पर परछाइयाँ काँपी।
"अब ये गवाह है," मैंने कहा। "और गवाह को घर में नहीं, बाहर रखा जाता है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पहली बार वो चीज़ थी जो मुझे उनके चेहरे पर कभी नहीं दिखी थी — सच। बिना पर्दे का, बिना लाड़ का, बिना "भईया" वाला सच।
मैंने उनका हाथ पकड़कर उन्हें गैराज की तरफ़ बढ़ाया।
गैराज का शटर आधा खुला था। अंदर अंधेरा था और तेल की महक आ रही थी। दीवार पर वो पुराना कैलेंडर लटक रहा था जिसका पन्ना तीन साल से नहीं बदला, और जिसके ऊपर से किसी का नाम कैंची से काट दिया गया था — सिर्फ़ उसका निशान बचा था।
मैं उन्हें उस अंधेरे में से ले गया। मेरी जूती तेल की टंकी से टकराई और उसकी टन-टन पूरे गैराज में फैल गई। चाचा का कंधा दीवार से रगड़ खा गया।
"अर्जुन, मेरा हाथ…"
"चलिए।"
शटर के नीचे से हम बाहर निकले।
गली की रोशनी बहुत पीली थी। एक बल्ब था जो कभी जलता था कभी बुझता था, और आज जल रहा था। सामने के मकान की छत पर कोई औरत कपड़े समेट रही थी और उसने हमें देखकर अपना काम रोक लिया।
गली के मोड़ पर वो ट्रक वाला ड्राइवर अब भी खड़ा था और उसने हमारी तरफ़ देखा।
मैंने चाचा का हाथ छोड़ दिया।
वो सड़क पर खड़े रहे। उनकी शर्ट की कॉलर से वो धागा अब भी लटक रहा था। उन्होंने एक बार अपनी उँगली से उसे खींचा, फिर अपने चश्मे को नाक पर सरकाया, और फिर उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकाला — वो रुमाल जिसके किनारे पर ज़ंग की वही लकीर थी जो मेरे रुमाल पर।
उन्होंने माथा पोंछा। पसीना नहीं था, फिर भी पोंछा।
"अर्जुन," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"मैं खुद जा रहा हूँ।"
मैं ठिठक गया।
"कहाँ?"
"भाई साहब के पास।" उन्होंने रुमाल जेब में डाला और मुझे सीधा देखा। "मैं अपनी गलती खुद जाकर कहूँगा। मैं उन्हें बताऊँगा कि तेरे पास रजिस्टर है।"
मुझे कुछ समझ नहीं आया।
"चाचा, आप…"
"बोलना सुन।" उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं जा रहा हूँ, इसलिए तेरे को कोई कुछ नहीं कह सकेगा। मैं वहीं खड़ा रहूँगा, अर्जुन। मैं वहीं बैठूँगा, जहाँ वो बुलाएँगे। मैं उनका आदमी बन जाऊँगा, पर तेरे को छूने से पहले उन्हें मेरे चेहरे पर नज़र रखनी पड़ेगी।"
"आप मुझे बचाने का…"
"मैं तुझे नहीं बचा रहा!" उन्होंने चीख दी, और आवाज़ गली में गूँज गई। फिर वो खुद उस चीख से डर गए और उन्होंने आवाज़ धीमी कर ली। "मैं खुद को नहीं बचा पाया। मैं तेरे पापा को नहीं बचा पाया। तो मैं क्या बचाऊँगा?"
उन्होंने आँखें झुका लीं।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे सालों तक नींद नहीं लेने देगा।
"अर्जुन, तू मत आना।"
"कहाँ?"
"कल। जब मैं बुलाऊँ, तब तू मत आना। जो मैं कहूँ, वो मत करना। और उस जगह भी मत जाना जहाँ मैं इशारा करूँ।" उनकी आँखें भीग गई थीं, पर रोए वो नहीं। उन्होंने सिर्फ़ एक गहरी साँस ली और मुझे देखा। "क्योंकि जो मैंने छिपाया है, अर्जुन, अगर वो खुल गया, तो सिर्फ़ मेरी गर्दन नहीं जाएगी।"
"आपने क्या छिपाया है?"
"वो मत पूछ।"
"चाचा, मैं आपसे पूछ रहा हूँ — आपने क्या छिपाया है?"
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था और थरथरा रहा था। और उन्होंने मेरे कान के पास आकर इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि अगर मैंने साँस न रोकी होती तो वो शब्द सड़क के शोर में खो जाते।
"तू मत आना, अर्जुन।" उनकी आवाज़ में पानी था। "वरना जो मैंने छिपाया है, वो तेरे सामने खुल जाएगा। और उस दिन तुझे वो सब दिखेगा जो मैंने अपने भाई की लाश के साथ गाड़ दिया था।"
मैं ज़मीन पर जम गया।
वो पलटे और चल दिए।
उनके जूतों की आवाज़ आती रही — जली हुई ईंटों पर, फिर काली चिकनी मिट्टी पर, फिर दूर मोड़ पर जाकर गुम हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
ऊपर छत से चाची ने मेरा नाम पुकारा, पर मैंने जवाब नहीं दिया।
मैंने अपनी छाती पर हाथ रखा। बनियान के नीचे काला रजिस्टर था। और मेरी बाँहों में — जो मैं अब तक थामे हुए था — पापा का टेप रिकॉर्डर।
उसका ठंडा धातु मेरी छाती से चिपका हुआ था।
मैंने उसे देखा। पीली लेबल। हरी स्याही। वो एक पंक्ति — जो इसे सुने, वो अकेला न सुने।
"पापा," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही लगी नहीं। "अब मैं किसके साथ सुनूँ?"
गली के मोड़ पर वो ट्रक वाला ड्राइवर अब भी खड़ा था। उसने इस बार कुछ कहा नहीं। सिर्फ़ अपना पान का कटोरा नीचे रखा और अपनी गाड़ी के इंजन में सिर डाल दिया।
मैंने अपनी जेब से घड़ी निकाली।
आठ मिनट आगे।
मैंने उसे कान से लगाया। टिक-टिक कर रही थी। पर उसकी आवाज़ में वो सफ़ाई नहीं थी जो सुबह थी। जैसे अंदर कोई पुर्ज़ा ढीला हो गया हो।
मैंने आँख बंद की और सड़क की सारी आवाज़ें एक साथ सुनीं — किसी दूर की गाड़ी की घरघराहट, किसी बच्चे का रोना, एक कुत्ता जो लगातार भौंक रहा था, और गैराज की दीवार के उस पार से हल्की-हल्की किसी के रोने की आवाज़। चाची।
मैंने घड़ी कलाई पर बाँधी।
और तभी मुझे एहसास हुआ कि चाचा ने आख़िरी बात कहते वक़्त "जो मैंने छिपाया है" नहीं कहा था — उन्होंने "जो मैंने छिपाया है, अर्जुन" कहा था।
नाम लिया था।
और जो आदमी आख़िरी बात में पहले अपना नाम बोले, वो ये नहीं बताता कि उसने क्या छिपाया है। वो सिर्फ़ ये बताता है कि वो चीज़ किसके सामने खुलेगी।
मैंने ढाबे की तरफ़ चलना शुरू किया।
रास्ते में मैंने अपनी कॉपी निकाली और पन्ने पर लिखा — चाचा आज रात भाई साहब के पास गया। अपनी मर्ज़ी से। और वहाँ कुछ है जो मुझे सामने खुलने से डर है।
मैंने पेन रोक लिया।
फिर मैंने उसके नीचे एक और लाइन जोड़ी।
आज पहली बार मुझे अपना गुस्सा ठंडा रखना पड़ा। क्योंकि जिस आदमी को मैंने आज घर से निकाला, वो अब मेरा सबसे कमज़ोर गवाह है, और जो गवाह सबसे पहले टूटता है, वही सबसे पहले कुछ बोल भी देता है।
मैंने गली के मोड़ पर एक बच्चे को देखा जो नंगे पाँव, एक टूटी पतंग सीने से लगाए खड़ा था और वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
जुगनू।
मैं उसके पास गया और उसके कान के पास झुककर बोला।
"जुगनू, एक काम है।"
"बोलो।"
"चाचा कहीं जा रहे हैं। मुझे नहीं पता कहाँ। मुझे सिर्फ़ ये पता करना है कि वो रास्ते में किससे मिले और कहाँ रुके।"
जुगनू ने टूटी पतंग को अपनी बगल में दबाया और सीधा खड़ा हो गया।
"पैसे नहीं चाहिए," उसने कहा। "पर एक बात बताओ — वो चाचा हैं ना? जिनके घर तुम रहते हो?"
"हाँ।"
"तो मैं जाता हूँ।" वो मुड़ा, फिर पलटा। "अर्जुन भैया, एक बात — जब कोई आदमी अपने घर से निकलकर किसी के पास जाता है, तो वो पहले जूते पोंछता है। मैं उसके जूतों के निशान देख लूँगा।"
और वो दौड़ गया।
मैं सड़क पर अकेला खड़ा रहा, हाथ में रिकॉर्डर, सीने पर रजिस्टर, जेब में एक पीली पर्ची, और कलाई पर वो घड़ी जो पहले पाँच मिनट आगे थी और अब आठ मिनट।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा, "आपने कहा था — आवाज़ कभी झूठ नहीं बोलती। पर आपने ये नहीं बताया कि जब आवाज़ रो पड़े, तब क्या करना चाहिए।"
सड़क पर धूल उड़ रही थी।
और कहीं दूर, किसी गली में, मेरे चाचा के जूते की आवाज़ जा रही थी — उस आदमी की तरफ़ जिसका नाम अभी तक किसी काग़ज़ पर नहीं था, पर जिसकी महक हर काग़ज़ से आ रही थी।
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