A Dark Secret – Chapter 162
मैंने हाथ धोया और कहा, "जादू नहीं भाई। वाल्व की चमड़ी सूख रही थी। तेल और ठंडा पानी, दोनों ने काम कर दिया।"
रवि हँसकर बोला, "अब इससे कहो कि यूनियन का हिसाब भी ठीक कर दे।"
एक और ड्राइवर बोला, "हाँ भाई, ये हमारी गाड़ी ठीक कर दे, इसका बच्चा पढ़ा दे, और अमरीक साहब का हिसाब भी ठीक कर दे।"
हँसी फैल गई। पर उस हँसी के नीचे वो बात थी जो सब जानते थे और कोई नहीं बोलता था।
मैं पंप के पास बैठ गया और मेरे चारों तरफ़ पाँच-सात ड्राइवर बैठ गए। कोई चाय लाया, कोई रोटी तोड़कर दी।
एक औरत आई। छोटी गाड़ी चलाती थी, अपने पति की गाड़ी, जो अब नहीं था। उसने मुझे एक कटोरा दिया और कहा, "पानी ठीक किया तो एक बात बता — अगर सरकार ने नहीं माना, तो यूनियन मानेगी क्या?"
मैंने कहा, "दीदी, मुझे यूनियन का हिसाब नहीं पता।"
"मुझे भी नहीं पता," उसने कहा। "इसीलिए पूछ रही हूँ। ग्यारह साल से पूछ रही हूँ।"
और वो उठकर चली गई।
उसकी आवाज़ में जो शांति थी, वो मुझे बहुत देर तक चुभती रही।
दस बजे नैना आई।
फटा बैग, टेढ़ा चश्मा, कंधे पर काला भारी कैमरा। आज उसने साड़ी नहीं, एक साधारण सलवार पहनी थी और सिर पर दुपट्टा भी नहीं था। वो सीधे मेरे पास आई।
"अर्जुन, कतार गायब है," उसने कहा। "टोल का काउंटर बंद है। सड़कें खाली हैं। ये ख़बर है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर ख़बर को ज़ुबान चाहिए।"
"मैं लेने ही आई हूँ।"
वो सड़क पर घूमने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे चलता रहा, क्योंकि मुझे पता था कि आज जो कोई भी अपना नाम बताएगा, वो कल बर्बाद हो जाएगा।
नैना ने पहले किशन से पूछा। किशन ने चाय का कटोरा ऊपर उठाया और कहा, "बहन जी, मैं तो यहीं बैठा हूँ, मेरा नाम क्यों लिखोगी? मेरी गाड़ी तो घर पर है।"
फिर रवि से पूछा। रवि ने फीस की पर्ची जेब में खोंस ली और कहा, "कुछ नहीं पता। सब ने कहा है कि बाहर वालों से बात न करें।"
फिर वो उस बूढ़े ड्राइवर के पास गई, जो लाठी टिकाकर बैठा था।
"बाबा, क्या आप बता सकते हैं कि हड़ताल क्यों है?"
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर देखा। फिर बोला, "बेटी, तू कितने साल से यहाँ लिख रही है?"
"तीन महीने।"
"तीन महीने में कितने गवाह मिले?"
नैना चुप हो गई।
"मैं बताऊँ?" बूढ़े ने कहा। "एक भी नहीं। क्योंकि जो बोलता है, उसकी गाड़ी कल थोड़ी जल जाती है। मेरी न लिख। मैं चालीस साल से गाड़ी चला रहा हूँ, अब मरना नहीं चाहता।"
नैना ने कैमरा नीचे कर दिया। उसका चेहरा वैसा हो गया जैसा उस दिन हुआ था जब उसने मुझे अपने पापा की बही दिखाई थी।
मैंने धीरे से कहा, "नैना, आज नहीं।"
"मुझे पता है," उसने कहा। "पर कुछ तो चाहिए। एक चेहरा, एक आवाज़, एक काग़ज़।"
"काग़ज़ मिलेगा," मैंने कहा। "आज नहीं।"
उसने चश्मा ऊपर धकेला और कहा, "अर्जुन, तेरी बात सुनकर लगता है तू कभी रिपोर्टर नहीं बना। तू जब बोलता है, तब मुझे दो दिन इंतज़ार करना पड़ता है।"
"और तू जब बोलती है," मैंने कहा, "तब मुझे दो रात जागना पड़ता है।"
वो हँसी। पहली बार आज।
दोपहर बारह बजे अमरीक सिंह आया।
वो सफ़ेद शर्ट पर काला कोट पहने आया, जेब में वही लाल रुमाल। उसके पीछे गोलू था, और गोलू के पीछे दो और आदमी जिनका चेहरा मुझे नहीं पता था।
ढाबे के सामने वही चबूतरा था जहाँ कल शाम सभा हुई थी। अमरीक उस पर चढ़ा। भीड़ वहीं से इकट्ठी हो गई — कोई डेढ़ सौ लोग होंगे, सब ड्राइवर, सब चुप।
अमरीक ने माइक उठाया और एक बार भी माथा नहीं पोंछा, जबकि पसीना उसके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था।
"भाइयों!"
उसकी आवाज़ वैसी ही गूँजती थी। पर कुछ बदला हुआ था। कल जो आदमी बोल रहा था, उसमें आग थी। आज जो बोल रहा था, उसमें बस तेज़ आवाज़ थी।
"भाइयों, हमने अपनी बात रखी। हमने सड़क खाली करके करके दिखा दिया कि हम एक हैं। और सरकार ने हमारी बात सुन ली है।"
भीड़ में कुछ खुशी की आवाज़ आई। कोई ताली बजाने लगा।
"सरकार ने भरोसा दिया है," अमरीक ने कहा। "डीज़ल के दाम पर बात होगी। बीमा के काग़ज़ों की जाँच होगी। और हमारे जो भाई हादसों में गए हैं, उनके परिवारों के लिए मुआवज़ा का रास्ता खुलेगा।"
भीड़ में शोर बढ़ा।
"तो अब क्या सब खत्म?" किसी ने पूछा।
"हड़ताल खत्म," अमरीक ने कहा। "कल सुबह से सब गाड़ियाँ अपने रास्ते पर। ये हमारी जीत है भाइयों। हम किसी से नहीं डरते।"
उसने हाथ ऊपर उठाया। भीड़ ताली बजाने लगी।
पर मैंने ताली में कुछ सुना।
मैंने सुना कि आधे लोगों ने ताली बजाई और आधे लोगों ने नहीं बजाई। और जो नहीं बजा रहे थे, वो एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे।
किशन मेरे बगल में खड़ा था। उसने धीरे से कहा, "एक दिन की हड़ताल। एक दिन। मेरी जान।"
मैं आगे बढ़ा।
भीड़ चीरकर मैं चबूतरे के पास पहुँचा। अमरीक नीचे उतर रहा था। उसने मुझे देखा और एक पल के लिए उसकी आँखें सिकुड़ीं, फिर वो मुस्कुराया।
"लड़के," उसने कहा। "क्या बात है? तेरा काम तो चल रहा है। कल तेरी गाड़ी भी सड़क पर आ जाएगी।"
"अमरीक साहब," मैंने कहा, "एक सवाल है।"
"पूछ।"
"इतनी जल्दी क्यों?"
भीड़ चुप हो गई।
अमरीक ने कोट की जेब से लाल रुमाल निकाला और धीरे से अपना गाल पोंछा। पसीना नहीं था। फिर भी उसने पोंछा।
"जल्दी क्या है, लड़के? जब बात हो गई, तो हड़ताल रखने में क्या फ़ायदा? हड़ताल करना आसान है, हड़ताल खत्म करना मुश्किल। हमने आसान रास्ता चुना।"
"सरकार ने लिखकर क्या दिया?"
"लिखने की बात नहीं है।"
"तो क्या दिया?"
"भरोसा।"
"भरोसा किसने दिया? नाम क्या है? काग़ज़ कहाँ है?"
अमरीक ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो भाव आया जो कुत्ते की आँखों में आता है जब कोई बच्चा उसकी पूँछ पकड़ने को झुकता है।
"मज़दूर को यूनियन का हिसाब नहीं समझ आता," उसने कहा। "तू अभी छोटा है। तेरे पापा भी समझते तो आज ज़िंदा होते।"
मेरी मुट्ठी भर गई।
पर मैंने उसकी आवाज़ सुनी।
"यूनियन" शब्द पर उसकी आवाज़ थोड़ी ऊपर गई थी, और "हिसाब" शब्द पर वो थोड़ी धीमी पड़ गई थी। दो शब्दों के बीच में, वहाँ जहाँ साँस लेनी चाहिए थी, उसने साँस नहीं ली थी। और जब इंसान साँस रोककर बोलता है, तो आवाज़ के आख़िर में एक हल्की कंपन आती है।
मैंने वो कंपन सुनी।
कल भी सुनी थी। आज भी सुनी।
मैंने धीरे से कहा, "अमरीक साहब, अगर सरकार ने भरोसा दिया है, तो कम से कम एक काग़ज़ तो होगा जिस पर मुहर होगी। जिसे हम सब देख सकें।"
"काग़ज़ काग़ज़ करके तुम लोग क्या करोगे?"
"मैं कुछ नहीं करूँगा," मैंने कहा। "बस देखना चाहता हूँ।"
उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। हाथ भारी था और गरम था।
"कल आ जाना मेरे पास," उसने कहा। "तुझे काग़ज़ दिखाऊँगा। पर पहले तू ये बता — तेरे पास काग़ज़ कितने हैं?"
वो पलट गया।
और मैं वहीं खड़ा रह गया, ये सोचकर कि उसने ये क्यों पूछा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
रुक्मा दीदी।
वो ढाबे के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में लोहे का लंबा चमच। उन्होंने उसे उठाया और ज़ोर से ज़मीन पर पटक दिया।
ठन्।
पूरी भीड़ सन्न रह गई।
"अमरीक भाई!" रुक्मा दीदी की आवाज़ ढाबे के पूरे शोर को काटकर निकली। "एक बात बोलूँ?"
अमरीक रुका।
"जब हमारे आदमी हादसे में गए थे, तब किसी ने भरोसा नहीं दिया था। काग़ज़ देकर मुआवज़ा दिया था… नहीं दिया था। तब भरोसा कहाँ था?"
अमरीक ने कहा, "रुक्मा बहन, आज का दिन बड़ा है, तुम पुरानी बातें मत उठाओ।"
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