A Dark Secret134 / 536

A Dark Secret – Chapter 134

7 min read November 6, 2026

मेरे पास औज़ार का थैला नहीं था, वो तिवारी के पास था। मैंने चाची से कहा, "नीचे चारपाई के नीचे चाचा का पुराना डिब्बा रखा है, उसमें से कोई छेनी और हथौड़ी ले आइए।"

वो उतरीं। टिन की छत पर हवा तेज़ चलने लगी थी और अलमारी का दरवाज़ा फिर टकराने लगा। मैंने उसे पत्थर से रोक दिया।

चाची लौटीं। उनके हाथ में पुरानी छेनी थी जिसका लकड़ी का हैंडल टेप से लिपटा हुआ था, और एक छोटी हथौड़ी जिसकी मूठ फटी थी।

"ये तेरे चाचा के हाथ की हैं," उन्होंने कहा। "जब घर पर कोई चीज़ ठीक करते हैं तब निकालते हैं।"

मैंने पहले उँगलियों से पेंदे का कोना टटोला। वो ज़रा उठा हुआ था, जैसे किसी ने उसे कई बार उँगली से उखाड़ा हो और फिर दबा दिया हो। मैंने छेनी की नोक उस दरार में रखी।

"सँभालकर," चाची ने कहा।

"सँभालकर ही कर रहा हूँ, चाची।"

पहला हल्का मुक्का। लकड़ी चटकी नहीं। दूसरा। तीसरा।

टक।

और फिर वो पेंदा ऊपर उठा।

उसके नीचे एक खोखली जगह थी, हाथ भर गहरी, और उसमें सबसे ऊपर एक पुरानी बनियान रखी थी। मटमैली, पीली पड़ चुकी, कई जगह से मरम्मत किया हुआ सूती कपड़ा। उस पर नौसादर और तेल की महक थी। मैंने वो बनियान उठाई और मेरे हाथों में आ गई पापा की टोपी — धूसर, हल्की भूरी, किनारे से घिसी हुई, अंदर पसीने की लकीरें।

मेरी आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया।

मैंने टोपी धीरे से अलमारी के ऊपर रखी, जैसे वो ज़िंदा हो और मुझे छूने से नाराज़ हो जाए।

उसके नीचे दो औज़ार पड़े थे — एक टूटा पाना, जिसका मुँह आधा चटका हुआ था, और एक हथौड़ी जिसकी मूठ बीच से फटी थी। दोनों पर ज़ंग की लाल परत चढ़ी थी।

और उस सबके नीचे, खोखली जगह के एक कोने में, धूल से ढका हुआ एक डिब्बा पड़ा था।

मैंने उसे दोनों हाथों से उठाया।

वो पुराना टेप रिकॉर्डर था।

लगभग डेढ़ हाथ लंबा, काला भूरा शरीर, ऊपर चपटा। सामने स्पीकर की जाली थी जिसमें धूल भर गई थी, और जाली के नीचे उँगली के निशान बने थे — किसी ने बार-बार वहीं हाथ रखा था। ऊपर चार बटन थे, खुरदुरे, घिसे हुए, और उनके नीचे धातु का ढक्कन जिस पर चमकदार लकीरें चढ़ी थीं।

उसके एक तरफ़ उठाने के लिए हैडल था, पर उसका एक सिरा टूटा हुआ था। बैटरी का ढक्कन गायब था।

मैंने उसे अलमारी के ऊपर रखा और अपना तेल में डूबा रुमाल निकाला।

"चाची, ये कभी देखा?" मैंने पूछा।

चाची लालटेन के पीछे खड़ी थीं और उनका चेहरा अंधेरे में था।

"नहीं," उन्होंने धीमे से कहा। "मैंने ये अलमारी बीस साल में कभी नहीं खोली। ये तेरे चाचा की चीज़ थी, इसलिए मैंने छुई नहीं।"

मैंने रुमाल से अंदर का ढक्कन पोंछा और ढक्कन खोला।

अंदर टेप लगी थी।

दो छोटे गोल पहिये, उनके बीच भूरी पट्टी, और ऊपर काँच की खिड़की के अंदर पट्टी घूमी हुई पड़ी थी। पट्टी का किनारा पहली बार लगा हुआ था — मुझे ये मेरे गैराज के टेपों से पता है, कबीर के पास गानों की टेपें रहती थीं, उनकी पट्टी पर ऐसा ही ज़रा सा घुमाव आता था।

टेप के पीछे एक पीला सा लेबल चिपका था, उस पर कुछ लिखा था।

पर मैंने उसे अभी नहीं पढ़ा।

क्योंकि उस वक़्त मेरी नज़र रिकॉर्डर के नीचे पड़ी उस छोटी टिन पर चली गई जो खोखली जगह में बची रह गई थी।

वो सिगरेट के डिब्बे से थोड़ी बड़ी थी, चौकोर, और उसका ढक्कन ज़ंग पकड़ चुका था। ऊपर का रंग पूरा उतर गया था और ज़ंग ने उसे लाल भूरी झुर्रियों में बदल दिया था। एक तरफ़ उँगली रखने की जगह घिसी हुई थी।

मैंने उसे उठाया। भारी थी।

"अर्जुन, वो खोलना ज़रूरी है?" चाची ने कहा।

"चाची —"

"मैं डर रही हूँ," उन्होंने सीधे कहा। कोई नाटक नहीं, कोई मरोड़ नहीं। बस सच।

"मैं भी," मैंने कहा। "पर आपको याद है चाचा ने क्या कहा था? जो अलमारी में था, वो उनकी समझ से बाहर था। मतलब उन्होंने इसे देखा। और अगर देखकर भी उन्होंने इसे नहीं उठाया, तो वो ये ढूँढ ही नहीं रहे थे।"

चाची ने मुझे देखा।

"वो रजिस्टर ढूँढ रहे थे," मैंने कहा। "और ये रजिस्टर नहीं है।"

मैंने टूटा पाना उठाया और उसकी नोक ढक्कन के किनारे में लगाई। ज़ंग ने पहले तो झुकने से मना किया, फिर एक जगह से टूटी और ढक्कन उछलकर अलग गिरा।

और मेरी हथेली पर बदबू आई।

पुराने काग़ज़ की बदबू। वो बदबू जो नमी, धूल और स्याही से बनती है। जैसे पुरानी किताबों का ढेर। मैंने वो बदबू अपनी नाक में भरी और मुझे ऐसा लगा जैसे अभी कोई दरवाज़ा खुला है जो बहुत सालों से बंद था।

मैंने अंदर झाँका।

काग़ज़ थे। कई पन्ने, बार-बार मोड़े हुए, ऊपर से किसी काली डोर से बँधे। और उन पन्नों के ऊपर एक छोटी चीज़ रखी थी, धातु की, गोल, जो लालटेन की रोशनी में एक पल के लिए चमकी और फिर अंधेरे में गुम हो गई।

मैंने उसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, और मेरी उँगली उस चीज़ से टकराई।

टिं।

एक पतली, मीठी सी आवाज़।

मेरी साँस रुक गई। मैंने हाथ वहीं रोक लिया।

"क्या है?" चाची ने पूछा।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर आवाज़ ऐसी है जैसे काँच हो, या बहुत पतली धातु।"

"अर्जुन, इसे मत निकाल। अभी मत।"

मैंने हाथ खींच लिया।

और मुझे अपनी कमज़ोरी पर गुस्सा आया, क्योंकि मेरे कान जो हर आवाज़ पकड़ लेते हैं, वो उस एक टिं से काँप गए थे।

मैंने हाथ पीछे किया और अपनी जेब से रुमाल निकाला। अब भी उस पर तेल, धूल और पापा के ट्रक की गंध थी। मैंने वो रुमाल पानी की तरह इस्तेमाल किया — रिकॉर्डर के ऊपर, लेबल के ऊपर।

धूल पहले नहीं हटी। तीन बार फेरना पड़ा।

और फिर पापा की हरी स्याही निकल आई।

वो स्याही मैंने हजार रसीदों पर देखी थी। उस स्याही का झुकाव, उस स्याही का तिरछापन, मैं उसे बंद आँखों से भी पहचान सकता हूँ। वो स्याही मुझसे कभी झूठ नहीं बोली।

लेबल पर एक ही लाइन थी। छोटी, सीधी, कोई जल्दी में लिखी हुई, जैसे लिखने वाले को मालूम था कि उसके बाद कुछ नहीं लिखा जाएगा।

जो इसे सुने, वो अकेला न सुने।

मैं वहीं बैठ गया।

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। ऐसे ठंडे जैसे सुबह चार बजे लोहे की रॉड खोलते वक़्त पड़ते हैं। मैंने रुमाल हटाया, फिर से लगाया और फिर पढ़ा, क्योंकि मुझे लगा मैंने ग़लत पढ़ लिया।

लेबल बदला नहीं था। लाइन वही थी।

"अर्जुन, क्या लिखा है?" चाची ने दोबारा पूछा। उनकी आवाज़ आ रही थी, पर मुझे ऐसा लगा कि वो बहुत दूर से आ रही है।

"चाची," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ उल्टी धीमी निकली, "पापा ने यहाँ मेरे लिए कुछ छोड़ा है।"

"क्या?"

"आवाज़," मैंने कहा। "पापा की आवाज़।"

चाची ने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया और वो वहीं अलमारी के सहारे बैठ गईं।

मैंने अपनी बनियान उतारी और रिकॉर्डर तथा टिन दोनों को उसमें लपेटकर अपने सीने से लगा लिया। छत पर हवा चल रही थी, टिन ठंडा हो रहा था, और नीचे बस्ती में कोई गाड़ी बज रही थी — कोई पुराना मॉडल, जिसका हॉर्न बीच से फटा हुआ था।

मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।

मेरे कान आज पहली बार बंद हो गए थे।

॥

टिन का ढक्कन अलग गिरा और उसमें से वो बदबू उठी जो सिर्फ़ पुराने काग़ज़ की होती है। नमी, धूल और स्याही। तीनों मिलकर।

मैंने अंदर हाथ डाला।

काली डोर ऊपर से बँधी थी, पर गाँठ ढीली थी। जैसे किसी ने बाँधा हो और फिर बाँधने की जल्दी में छोड़ दिया हो। मैंने गाँठ खोली और पन्ने बाहर निकाले।

वो पन्ने नहीं थे।

वो पर्चियाँ थीं। छोटी, चौकोर, कई बार मोड़ी हुई। एक-एक करके मैंने उन्हें खोला और चाची की लालटेन के नीचे रखती गईं।

सात।

सात पर्चियाँ।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho