A Dark Secret – Chapter 133
मैंने अपना फोन निकाला।
छत पर सिग्नल एक ही जगह पर मिलता था, छत के उस कोने में जहाँ टिन का जोड़ टूटा हुआ था। मैं वहीं गया और घुटने के बल बैठकर अम्मा का नंबर मिलाया।
पाँच घंटी बजीं। छह। सात।
"हाँ अर्जुन?" अम्मा की आवाज़ नींद में डूबी थी और उसी में घबराहट थी। "क्या हुआ? सब ठीक है? इतनी रात को क्यों फ़ोन किया?"
"अम्मा, सब ठीक है।"
"तबीयत तो ठीक है ना? खाना खाया?"
"अम्मा," मैंने कहा। "मुझे कुछ पूछना है।"
उस तरफ़ चुप्पी छा गई।
मैंने घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। हमेशा की तरह।
"पूछ ना," अम्मा ने कहा, पर उनकी आवाज़ में वो ज़रा सी हिचक थी जो बच्चे को पता चल जाती है, चाहे माँ कितना भी छिपाए।
"अम्मा, पापा के पास कोई रजिस्टर था? काली जिल्द वाला? जिसमें वो हिसाब लिखते थे?"
उस तरफ़ हवा की आवाज़ आई। कहीं दूर एक कुत्ता भौंका। फिर बस सनसनाहट।
मैंने सोचा फोन कट गया।
"अम्मा?"
"कौन बोला तुझसे?" उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ अब नींद में नहीं थी।
"किसी ने नहीं बोला।"
"तो ये सवाल तू क्यों पूछ रहा है? दस साल बाद?"
"क्योंकि अम्मा, मुझे लगता है कि पापा की मौत का पूरा हिसाब उसी में है।"
उस तरफ़ फिर चुप्पी। बहुत लंबी। इतनी लंबी कि मैंने अपनी ही साँस सुन ली।
फिर अम्मा रोई। धीरे-धीरे, दाँतों में रुमाल दबाकर, जैसे कोई रोने की आवाज़ को भी नंगा नहीं छोड़ना चाहता।
"अम्मा —"
"था," उन्होंने कहा। एक ही शब्द में सब कह दिया।
"क्या?"
"था। एक रजिस्टर था। काली जिल्द, मोटा सा, कोने पर लोहे की गोली लगी थी और अंदर पन्नों के किनारे लाल रंग से रेखा खींची थी।" उन्होंने एक साँस ली। "तेरे पापा उसे कभी घर में नहीं छोड़ते थे। रात को उसे अपने साथ ले जाते थे, और सुबह लौटकर पहले उसे अलमारी में रखते थे, फिर चाय पीते थे।"
मेरे हाथ में फोन था और मुझे लगा जैसे फोन भारी हो गया है।
"उस रात?" मैंने पूछा।
अम्मा ने बहुत देर साँस ली।
"उस रात वो घर से उसी रजिस्टर को लेकर निकले थे," उन्होंने कहा। "मैंने दरवाज़े पर कहा था — इतनी रात को कहाँ? रख दो, सुबह जाना। मुझे याद है मैंने उनका हाथ पकड़ा था।"
"और उन्होंने क्या कहा?"
"उन्होंने कहा — कमला, ये आज रात मेरे पास रहेगा, तो सुबह सब ठीक हो जाएगा। और अगर कल सुबह तक मैं न लौटूँ, तो ये जला देना। किसी को मत देना।"
मेरी गर्दन के पीछे ठंडी हवा फिर गई, जबकि छत पर गर्मी थी।
"और फिर?"
"और फिर वो गए और नहीं लौटे।" अम्मा की आवाज़ सपाट हो गई, जैसे अब कोई डर नहीं, बस थकान है। "सुबह मैंने अलमारी खोली। रजिस्टर नहीं था। शाम को मैंने आंगन में उनकी साइकिल जलाई, उनकी शर्ट जलाई, पर रजिस्टर कहीं नहीं था। न जला, न मिला।"
"अम्मा, दस साल —"
"दस साल मैंने ये बात किसी को नहीं बोली, अर्जुन।" उनकी आवाज़ में अब गुस्सा आ गया, वो गुस्सा जो सबसे ज़्यादा दर्द से बनता है। "तेरे चाचा को भी नहीं बोली। पुलिस को तो कभी नहीं। क्योंकि मुझे डर था कि तू सुनकर कहीं का नहीं रहेगा।"
"अम्मा —"
"तू अपने पापा की तरह है। तेरे पापा भी एक बात पकड़ लेते थे तो दुनिया छोड़ देते थे। तेरे पापा को लोग कहते थे — रघुवीर, तू ट्रक ठीक करने वाला है, तू काग़ज़ों के पीछे क्यों पड़ता है। वो हँसते थे, पर हँसते हुए भी वही काग़ज़ पढ़ते रहते थे।" अम्मा ने साँस भरी। "और मुझे पता है कि अगर तुझे वो रजिस्टर मिल जाए, तो तू भी वही करेगा।"
"अम्मा, उस रजिस्टर में क्या था?"
"मुझे नहीं पता। वो मुझे कभी नहीं दिखाते थे। बस कभी-कभी रात को बैठकर उसमें कुछ लिखते थे और दोनों हाथ से उसे सहलाते थे, जैसे कोई जानवर को सहलाता है।" फिर उन्होंने धीमे से कहा, "एक बात कहते थे। कहते थे — जब तक ये मेरे पास है, वो मुझे छू नहीं सकता।"
"वो कौन?"
"नहीं बताते थे। मैंने पूछा था, एक बार। उन्होंने मुझे ऐसे देखा था…" अम्मा रुक गई, जैसे फिर से वो नज़र देख रही हो। "मुझे लगा मैंने ग़लत सवाल पूछ लिया। उसके बाद मैंने कभी नहीं पूछा।"
मैंने आँखें बंद कीं।
"अम्मा, एक बात और। उस हफ़्ते कुछ और हुआ था? कुछ अजीब?"
अम्मा चुप रहीं। फिर बोलीं, "उन्होंने बाज़ार से एक कैसेट खरीदी थी। मैंने कहा इतने पैसे में ये क्या? तो वो बोले — कुछ बातें लिखी नहीं जातीं, बोली जाती हैं। मैं समझी नहीं। मैंने सोचा बूढ़े हो रहे हैं, बच्चों जैसी बातें करते हैं।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"अम्मा," मैंने कहा। "आपने मुझे अलमारी से मना किया था। क्यों?"
"क्योंकि उस अलमारी में मुझे वो मिल जाएगा जो मैं दस साल से नहीं ढूँढना चाहती थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार पूरी तरह टूट गई। "अर्जुन, मैं बूढ़ी औरत हूँ। मेरे पास तेरी बहन है, ये घर है, ये आँगन है। मुझे अपनी बाक़ी ज़िंदगी शांति से काटनी है। पर तू… तू मुझे बता, तू क्या ढूँढने गया है वहाँ?"
"अम्मा, मैं सिर्फ़ सच ढूँढ रहा हूँ।"
"सच," अम्मा ने कहा, जैसे वो शब्द उनके मुँह में कसैला हो। "सच की क़ीमत चुकाने वाले लोग मरे हुए हैं, अर्जुन। सच का किराया बहुत महंगा है।"
मैं कुछ नहीं बोला।
"अब सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी सख़्ती लौट आई जो मुझे बचपन से पता है। "जो मैंने तुझे बताया, वो बस इसलिए बताया कि तू अंधेरे में हाथ न पटके। पर उन लोगों से मत उलझना। वो लोग नहीं छोड़ते। उन्होंने तेरे पापा को नहीं छोड़ा।"
"अम्मा, मैं किसी से उलझूँगा नहीं। मैं बस हिसाब लिखूँगा।"
अम्मा हँसी। एक छोटी, सूखी हँसी जिसमें हँसी कम और दुआ ज़्यादा थी।
"हिसाब लिखने वालों का ही तो हिसाब बिगड़ता है," उन्होंने कहा। "अच्छा, अब फोन रख। सुबह हो रही है। और हाँ — जो कुछ मिले, तू खुद मत खोलना। पहले मुझे बताना।"
"अम्मा, वो तो —"
"पहले मुझे बताना," उन्होंने दोहराया, और फोन काट दिया।
मैंने फोन टिन पर रखा और मैंने अपने हाथ देखे। वो काँप रहे थे।
मैंने दोनों हाथ जोड़े, उन्हें घुटनों पर दबाया, पर कंपन नहीं गई। मेरे पास काबू करने के लिए गुस्सा लाना पड़ता था और उस वक़्त गुस्सा कहीं नहीं था। सिर्फ़ एक गहरी ठंड थी, जो पेट से उठकर गले तक आ रही थी।
"अर्जुन?" चाची सीढ़ी के नीचे खड़ी थीं, मुँह उठाकर देख रही थीं। "अम्मा ने क्या कहा?"
"कहा कि पापा के पास एक रजिस्टर था," मैंने कहा। "काली जिल्द वाला। और उस रात वो उसे लेकर ही घर से निकले थे।"
चाची के हाथ से लालटेन एक इंच नीचे झुकी और फिर सँभल गई।
"हाय राम," उन्होंने फुसफुसाया।
"चाची, आप ऊपर आ जाइए।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो चीज़ चाचा ने कल रात देखी थी, वो मुझे अभी देखनी है। और मुझे रोशनी चाहिए।"
चाची सीढ़ी पर चढ़ीं। हर कदम पर लालटेन हिलती रही और छत पर परछाइयाँ नाचती रहीं। चढ़ते-चढ़ते उन्होंने एक हाथ सीढ़ी के सिरे पर रखा और कहा, "अर्जुन, बुरा मत मानना, पर तेरे चाचा इस वक़्त जहाँ हैं, वहाँ वो यही सोच रहे होंगे कि मैंने उनके पीछे क्या खोल दिया।"
"चाची, मैं घर की चीज़ चुरा नहीं रहा। ये सब मेरे ही घर का है।"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा, और छत पर आकर लालटेन अलमारी के सामने रख दी। "पर कभी-कभी घर की चीज़ घर को ही बर्बाद करती है।"
मैं अलमारी के सामने घुटनों के बल बैठ गया।
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