A Dark Secret – Chapter 132
छत पर पुरानी टीन की छत थी, और उस पर रात की ओस जम चुकी थी। मेरे पैर फिसलने लगे। मैंने अपने तेल वाले रुमाल से ज़मीन पोंछी और चल पड़ा।
अलमारी छत के कोने में थी। लकड़ी की नहीं, लोहे की — काली, मोटी, ऊपर दो खाने और नीचे दो दरवाज़े। उसका रंग ऐसा पड़ गया था जैसे सालों से धूप में खड़ी हो।
और उसका ताला…
मैं रुक गया।
ताला टूटा नहीं था।
ताला लगा हुआ था, पर खुला हुआ था। यानी हैंडल ऊपर था, कुंडी बाहर निकली हुई, और दरवाज़े की दरार में हवा जा रही थी — मैं दरार से आती हवा की हल्की सीटी सुन सकता था।
किसी ने चाबी से खोला था, फिर दरवाज़ा बंद कर दिया था, पर ताला लगाना भूल गया था। या जल्दी में लगा नहीं पाया था।
मैंने उस दरवाज़े को खींचा। लोहे की चरचराहट में एक अलग आवाज़ थी — जैसे मरा हुआ लोहा ज़िंदा होकर कराह रहा हो।
अंदर से एक महक निकली।
वो महक मैं जानता था।
वो महक मुझे अपने बचपन से पता थी — तेल, पुराना कपड़ा, और एक आदमी का पसीना जो दिन भर गाड़ियों के नीचे रहता था। मैंने आँखें बंद कर लीं और एक लंबी साँस ली।
अलमारी में ऊपर तीन पुरानी साड़ियाँ रखी थीं। उनके नीचे एक लकड़ी का बक्सा, जिस पर चमड़े का पट्टा बँधा था। बक्से के पास तीन पुराने रसीदों के बंडल — छोटे, सूखे, पीले। और सबसे नीचे, बाईं तरफ़ एक फोटो का फ्रेम, काँच के बिना।
मैंने वो फ्रेम उठाया।
पापा थे। उनके हाथ में एक बड़ा पाना था। पीछे एक पीला ट्रक खड़ा था और ट्रक पर कुछ लिखा था, जो उस पुरानी तस्वीर में मिट गया था। पापा हँस रहे थे — वो ऐसे हँसते थे जैसे दुनिया से कोई शिकायत नहीं हो।
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने फ्रेम को दोनों हाथों से पकड़ा और उस पर धूल दिखी…
फिर मैं रुक गया।
फ्रेम का काँच नहीं था, पर फ्रेम के किनारे पर, ऊपर बाईं तरफ़, धूल में एक लकीर थी।
एक उँगली की लकीर।
ताज़ी।
धूल बाकी जगह मोटी, मटमैली, सालों की जमी हुई थी। पर उस जगह धूल हट गई थी, साफ़, चिकनी लकीर में — जैसे किसी ने उँगली रखकर ऊपर से नीचे खींची हो। लकीर के नीचे लकड़ी का रंग साफ़ दिख रहा था।
मतलब किसी ने कल रात इस फ्रेम को उठाया था। देखा था। और वापस रख दिया था।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने फोटो को ठीक से देखा, और मेरी नज़र पापा के हाथ में पकड़े उस पाने पर गई। एक रिंच। पर उस रिंच के सिरे पर कुछ था — मैंने आँख सिकोड़कर देखा। फोटो बहुत धुँधली थी। नहीं दिखा।
मैंने फ्रेम को पलटा।
पीछे लकड़ी पर कुछ लिखा था — हरी स्याही में, पापा के हाथ से, वो मैं पहचानता हूँ।
"सिमरिया का घर। जो इसे खोले, वो हिसाब पूरा करे।"
मेरी साँस रुक गई।
मैंने अलमारी के अंदर आख़िरी बार हाथ डाला। बक्सा उठाया। उसके नीचे की लकड़ी पर मैंने उँगली मारी — ठक, ठक।
आवाज़ सामान्य थी।
मैंने पीछे की दीवार पर उँगली मारी — ठक।
फिर मैंने दाईं तरफ़ की लकड़ी पर मारा — ठक।
और फिर, अपनी उँगली को नीचे ले जाकर मैंने अलमारी के पेंदे पर मारा।
टक-टक।
आवाज़ बदल गई थी।
पेंदा खोखला था।
मेरी उँगलियाँ वहीं रुक गईं। मैंने एक बार फिर मारा, और फिर धीरे से उस लकड़ी को खुरचा। एक कोना ज़रा उठा हुआ था, जैसे उसे कई बार खोला और बंद किया गया हो।
तभी नीचे से सीढ़ी की आवाज़ आई।
टन। टन। टन।
मैंने फ्रेम अपनी जगह रखा और अलमारी का दरवाज़ा वैसे ही छोड़ दिया जैसे मिला था। छत के किनारे तक गया और नीचे झाँका।
चाची नीचे चारपाई के पास खड़ी थीं। उनके हाथ में लालटेन थी, जो हवा में हिल रही थी, और उसकी रोशनी में उनका चेहरा दो हिस्सों में बँटा दिख रहा था।
"अर्जुन," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अब रोने वाली नहीं थी। अब उसमें कुछ और था। "तू ऊपर क्यों गया?"
"चाची, ये अलमारी —"
"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा, और उन्होंने लालटेन नीचे रख दी, जैसे अब उन्हें उसकी रोशनी की ज़रूरत नहीं थी। "मैंने तुझसे झूठ बोला, सुबह। उस वक़्त डर लग रहा था।"
मैं सीढ़ी के मुँह पर खड़ा रह गया।
"क्या झूठ?"
"तेरे चाचा कल रात आए थे," चाची ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक-एक शब्द तौलकर रखा जा रहा था। "भोर होने से पहले चले गए। मैंने तुझे नहीं बताया, क्योंकि उन्होंने कहा था कि अगर कुछ हो जाए तो तू सब छोड़कर भाग जाएगा, और वो नहीं चाहते थे कि तू भागे।"
"चाची —"
"अर्जुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार सच में टूटी, "तेरे चाचा ने कल रात इसी अलमारी को खोला था। मैंने अपनी आँखों से देखा। वो ऊपर गए, अलमारी खोली, और जब नीचे आए तो उनके हाथ खाली थे। और उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो उन्हें इससे पहले कभी नहीं दिखा।"
छत पर हवा चलने लगी, और अलमारी का खुला दरवाज़ा धीरे-धीरे हिलकर टिन की छत से टकराने लगा।
टक। टक। टक।
जैसे कोई भीतर से खटखटा रहा हो।
॥
मैं सीढ़ी के मुँह पर खड़ा रह गया।
छत पर हवा चल रही थी और अलमारी का खुला दरवाज़ा धीरे-धीरे हिलकर टिन से टकरा रहा था। टक। टक। टक। जैसे कोई भीतर से खटखटा रहा हो और कह रहा हो, देख ले, देख ले।
"चाची," मैंने कहा, "चाचा ने अलमारी खोली, तो उन्हें क्या मिला?"
चाची ने लालटेन उठाई और उसकी रोशनी मेरे चेहरे पर डाल दी। उनकी आँखें लाल थीं, पर अब उनमें आँसू नहीं थे। अब उनमें वो चीज़ थी जो औरतों के चेहरे पर तब आती है जब वो बहुत देर तक डरकर अब थक चुकी हों।
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "वो नीचे आए, चारपाई पर बैठे, दोनों हाथ घुटनों पर रखे और बहुत देर चुप बैठे रहे। मैंने चाय बनाई। उन्होंने हाथ तक नहीं बढ़ाया। फिर बोले — सीमा, अब मैं कुछ नहीं कर सकता।"
"और फिर?"
"और फिर बोले कि मुझे कुछ दिन बाहर रहना है। मैंने पूछा कहाँ। वो बोले, जहाँ कोई न पूछे।" चाची की आवाज़ टूटी। "अर्जुन, तेरे चाचा ने मुझसे एक बात कही थी जो मैं अब तक नहीं भूली। उन्होंने कहा — जो चीज़ मैं ढूँढने गया था, वो अलमारी में नहीं थी। और जो अलमारी में थी, वो मेरी समझ से बाहर थी।"
मेरा मुँह सूख गया।
"उन्होंने कुछ उठाया?"
"नहीं। हाथ खाली थे। मैंने अपनी आँखों से देखा — दोनों हाथ खाली। बस उनकी उँगलियों पर धूल थी। बहुत धूल।" चाची ने लालटेन नीचे की। "और अर्जुन, जाते वक़्त वो दरवाज़े पर रुके और बोले — सीमा, अगर अर्जुन ऊपर जाए, तो उसे मत रोकना। पर उसके साथ मत जाना।"
मैंने फ्रेम उठाया और चाची के सामने किया।
"चाची, ये पढ़िए।"
उन्होंने लालटेन पास की और पीछे की लकड़ी पर उँगली रखकर धीरे-धीरे पढ़ा। वो ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं, इसलिए उन्होंने हर शब्द को ज़ोर से बोला, जैसे बच्चे स्कूल में बोलते हैं।
"सिमरिया का घर। जो इसे खोले, वो हिसाब पूरा करे।"
फिर उन्होंने उँगली हटाई और मेरी तरफ़ देखा।
"ये तेरे पापा की स्याही है," उन्होंने कहा। "ये हरी स्याही वो हर रसीद पर लगाते थे। मैंने सौ बार देखी है।"
"चाची, पापा के पास कोई रजिस्टर था? काली जिल्द वाला? कुछ ऐसा जिसमें वो हिसाब लिखते थे?"
चाची ने मुँह पर हाथ रख लिया।
"ये तू क्यों पूछ रहा है?"
"क्योंकि मुझे लगता है कि सब कुछ उसी में है।"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "तेरे चाचा से पूछ। वो तेरे पापा के साथ दुकान पर बैठते थे। मैं औरत हूँ, मुझे क्या पता कि मर्द कौन सा काग़ज़ कहाँ रखते हैं।" फिर उनकी आवाज़ धीमी हुई। "बस इतना याद है कि उस साल तेरे पापा कई रातें देर से आते थे, और जब आते थे तो पहले अलमारी खोलते थे, फिर हाथ धोते थे।"
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