A Dark Secret130 / 536

A Dark Secret – Chapter 130

7 min read November 6, 2026

एक नाम। कोई रिश्ता नहीं। कोई प्यार नहीं। जैसे किसी ने फ़ोन में नंबर तो सहेज लिया हो, पर उसे क्या कहकर सहेजे, ये तय न कर पाया हो।

कबीर ने फ़ोन झटके से उल्टा कर दिया, इतनी ज़ोर से कि उसका अंगूठा स्क्रीन पर खुरचा।

"गलत नंबर है," उसने कहा।

"ले लो," मैंने कहा।

"गलत नंबर है," उसने दोहराया, और इस बार उसकी आवाज़ में वो कंपन थी जो मैं पहचानता हूँ। "पुराना नंबर है। कोई और अब इस्तेमाल करता है।"

फ़ोन बजता रहा। उसने जेब में डाल दिया और जेब पर हाथ रखकर दबाए रखा, जैसे अंदर कुछ ज़िंदा हो जिसे दबाकर रखना पड़े।

मैंने कुछ नहीं कहा।

पर मैंने मन में लिख लिया, जैसे अपनी सिली हुई कॉपी में लिखता हूँ — शांति। एक नाम। और एक आदमी जिसकी आवाज़ में उस नाम पर कंपन आई।

कबीर ने एक गहरी साँस ली। फिर उसने अपना कैलकुलेटर जेब में डाला और कहा —

"कल नौ बजे। काँच का दफ़्तर। मैं वहाँ पहले पहुँचूँगा। और अर्जुन —"

वो रुका।

"क्या?"

"मैंने आज तुम्हारे लिए रसीद बनाई," उसने कहा। "कल अगर किसी ने तुमसे पूछे कि यही रसीद कहाँ से आई, तो तुम सच बोल देना। मुझ पर चाहे जो आए।"

"क्यों?"

"क्योंकि आँकड़े झूठ नहीं बोलते," उसने कहा, "और मैं थक गया हूँ, हर बार ये दोहराते हुए।"

वो चला गया।

नैना ने मेरी तरफ़ देखा।

"अर्जुन," उसने कहा, "ये आदमी झूठ बोल रहा है या सच?"

मैंने उसके जाने की तरफ़ देखा। अंधेरे में उसकी परछाईं दीवार पर चढ़ती जा रही थी, और फिर मुड़कर गायब हो गई।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर आज पहली बार उसकी आवाज़ में कंपन आया। और जिस चीज़ पर कंपन आया, वो कोई काग़ज़ नहीं था।"

"क्या था?"

मैंने अपनी घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। हमेशा की तरह।

"एक नाम," मैंने कहा। "शांति।"

हवा में धूल थी, और उस धूल में एक पुरानी गाड़ी की आवाज़ आ रही थी, जो दूर कहीं तीन बार स्टार्ट होकर चुप हो गई।

॥

नैना ने मेरी बाँह पकड़ी।

"अर्जुन, तुम कहाँ जा रहे हो?"

मैंने गैराज का नया ताला एक बार फिर देखा। ज़ंजीर पुरानी थी, ज़ंग खाई हुई, पर ताला चमक रहा था। एकदम नया। जैसे किसी ने सोच-समझकर ऐसा ताला लगाया हो जिसे देखकर हर आने-जाने वाला समझ जाए कि यहाँ कुछ बंद हो चुका है।

"चाचा के घर," मैंने कहा।

"इस वक़्त? रात के ग्यारह बज रहे हैं।"

"तो सुबह जाऊँगा तो भी वही चाचा मिलेंगे। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि सुबह की बात सुनने के लिए मुझे रात भर इंतज़ार करना पड़ेगा। और मुझे इंतज़ार करना कभी नहीं आया।"

नैना ने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपना फटा बैग कंधे पर ठीक किया। उसके चश्मे पर गैराज की लाइट पड़ रही थी, जिससे उसका एक काँच बिल्कुल सफ़ेद दिख रहा था।

"मैं चलूँ साथ?"

"तुम्हारी गाड़ी का एक पहिया हवा कम है," मैंने कहा। "कल सुबह ठीक कर दूँगा। और तुम टोल की तरफ़ जाओ। जुगनू वहीं है। उसके पास पचास का नोट है जो उसने कहीं से उठाया है, और उसने गोलू की बात सुनी है। मुझे लगता है वो नोट भी अपनी जगह बता देगा।"

"तुम मुझे टाल रहे हो।"

"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि चाची रोएँगी, और जब वो रोएँगी तो मुझे सुनने के लिए चुप होना पड़ेगा। और तुम्हारे होते हुए मैं चुप नहीं रह पाता।"

नैना कुछ कहने को हुई, फिर रुक गई। उसने अपना कैमरा बैग के अंदर ठीक से रखा और चली गई।

मैं कंधा बस्ती की तरफ़ चला।

रास्ते में धूल थी, और उस धूल में एक पुरानी गाड़ी की आवाज़ आ रही थी, जो दूर कहीं तीन बार स्टार्ट होकर चुप हो गई थी। मैंने एक पल को रुककर सुना। इंजन की घरघराहट में एक जगह ऐसी थी जहाँ आवाज़ साफ़ नहीं थी — जैसे कोई आदमी साँस लेते हुए बीच में रुक जाए। फिर आवाज़ आई, और फिर आई नहीं।

मैंने जेब में हाथ डाला और तेल में डूबा रुमाल टटोला। रुमाल अब भी नम था, और उसमें पापा की पुरानी महक थी — तेल, धूल, और उस पुराने हाथ की महक जो किसी भी गाड़ी के नीचे जाकर लग जाती है।

बस्ती की गली के मोड़ पर झंडू भाई की दुकान बंद थी। उसका स्टोव उल्टा रखा था, और उसके पास एक कटोरी में राख पड़ी थी, जो अब भी हल्की गरम रह गई थी। किसी ने अभी-अभी चाय पीकर उठाया था।

चाचा के घर के दरवाज़े तक पहुँचते ही मैंने पहली आवाज़ सुनी — पानी गिरने की। गली में नाली के ऊपर लगा नल खुला छूट गया था, और उसकी टपकती आवाज़ पूरी बस्ती में गिनी जा सकती थी।

फिर मैंने दूसरी आवाज़ सुनी।

रोने की।

दरवाज़ा खुला था, पर कुंडी लगी थी। चाची दरवाज़े के पीछे खड़ी थीं, एक हाथ में गीला कपड़ा और दूसरे हाथ से कुंडी पकड़े हुए। चेहरे से पता नहीं चल रहा था कि वो कब से रो रही हैं, बस आँखें ऐसी थीं जैसे दो दिन से सोई न हों।

"चाची, मैं हूँ। अर्जुन।"

कुंडी खुली और वो दरवाज़े पर ही बैठ गईं।

"अर्जुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो इंसान के गले से अपने आप निकलती है, बनावट से नहीं आती। "तेरे चाचा कल सुबह से घर नहीं आए।"

मैं एक पल के लिए रुका।

"दुकान?" मैंने पूछा।

"बंद है। ताला लगा है। मैं गई थी देखने, सुबह। बाहर से बंद। और मोबाइल… मोबाइल स्विच ऑफ़ है। सुबह से लगा रही हूँ, वही आवाज़ आती है — जो नंबर आप डायल कर रहे हैं वो अभी उपलब्ध नहीं है।"

"कितनी बार लगाया?"

"गिनती छूट गई।"

मैं अंदर गया। घर में वो अजीब सी खाली आवाज़ थी जो किसी के लौटने पर ही भरती है। चाचा की चप्पल जूते के नीचे पड़ी थी — उलटी, एक जगह से घिसी हुई। सोचने वाली बात यह थी कि चप्पल घर में थी। मतलब वो चप्पल पहनकर नहीं गए थे।

"चाची, चाचा ने जूते पहने थे कल?"

वो रुकीं। उन्होंने छत की तरफ़ देखा, जैसे वहाँ से जवाब आएगा।

"पता नहीं," उन्होंने कहा। "कल सुबह मैं चूल्हे पर थी। वो उठे, मुँह धोया, गुटखा उठाया और निकल गए। मैंने कहा कि चाय पी लो। वो बोले, आते-आते पी लूँगा।"

फिर वो चुप हुईं और अपने गीले कपड़े को उलटकर हाथ पर रखने लगीं, बार-बार, जैसे उस कपड़े में कोई चीज़ छिपी हो जिसे साफ़ करके वो कुछ भूलना चाहती हों।

मैंने कुर्सी खींचकर बैठने की आवाज़ सुनी। कमरे में रखा पुराना पंखा धीमी रफ़्तार पर घूम रहा था और हर चक्कर पर एक बार टुनक रहा था। बाहर किसी के घर में टीवी चल रहा था, और उसकी आवाज़ इतनी दबी थी कि बस ढोल की थाप सुनाई दे रही थी।

"पुलिस आई थी?" मैंने पूछा।

चाची ने सिर हिलाया।

"कल सुबह आई थी। वो लंबा इंस्पेक्टर, और उसके साथ दो सिपाही। उन्होंने पूछा कि महेंद्र जी घर पर हैं? मैंने कहा नहीं, दुकान पर गए हैं। वो आदमी मुस्कुराया, फिर बोला — जब आएँ तो थाने आ जाएँ, बयान की कॉपी में कुछ सुधार करना है।"

"और फिर?"

"और फिर कुछ नहीं। वो चला गया। और मेरा आदमी उसके बाद घर नहीं आया।"

मैंने दोनों हाथ गोद में रखे और एक लंबी साँस ली। मेरे अंदर कुछ बैठ गया, ऐसा बैठा जैसे ट्रक के नीचे धूल बैठती है — चुपचाप, बिना आवाज़।

"चाची, मुझे सच बताइए," मैंने धीरे से कहा। "जब वो बयान देने गए थे, तब वो कैसे थे?"

चाची ने पहली बार मेरी आँखों में देखा।

"वो डरे हुए थे," उन्होंने कहा। "और वो बात मुझे बहुत बुरी लगी, अर्जुन। क्योंकि तेरे चाचा ज़िंदगी में कभी किसी चीज़ से नहीं डरे। न कर्ज़ से, न बीमारी से, न तेरे पापा की मौत से। पर उस दिन…"

वो रुक गईं।

"उस दिन क्या?"

"उस दिन वो रात भर बैठकर कुछ सोचते रहे। और सुबह उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं लौटकर न आऊँ, तो अर्जुन को बता देना कि घर की छत पर जो अलमारी है, वो मेरी नहीं है।"

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