A Dark Secret – Chapter 129
"तुम्हें पता है इसका मतलब क्या है?" नैना ने कहा। "तिवारी ने गैराज सील कर दिया है। कल सुबह वो यहाँ औपचारिक ताला लगाएगा, सूची बनेगी, गवाह होंगे। उसके बाद अंदर जाना मतलब सीधे जेल।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"और तुम्हारे पास कुछ नहीं है," उसने कहा। "कुछ भी नहीं। काग़ज़ अंदर, थैला तिवारी के पास, चाबी—"
"चाबी मेरे पास है," मैंने कहा।
वो रुकी और मेरी कलाई की तरफ़ देखने लगी। मैंने घड़ी का पट्टा ज़रा ऊपर किया और छोटी पीतल की चाबी दिखाई। चाँद की रोशनी में वो सिर्फ़ एक पीली चमक थी।
नैना ने लंबी साँस ली।
"अर्जुन," उसने कहा, "मैं आज रात तुम्हारे साथ चलूँगी या नहीं, ये तुम बताओ। पर एक बात पहले साफ़ कर लो — अगर कल सुबह नौ बजे तक हम काँच के दफ़्तर के फाटक पर नहीं पहुँचे, तो कबीर की दी पर्ची का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। और मुझे लगता है वहाँ कुछ ऐसा मिलेगा जो इन सारे तालों से बड़ा है।"
"मैं पहुँचूँगा," मैंने कहा।
"भूखे?"
मैंने सोचा। सुबह से कुछ नहीं खाया था। पर भूख जैसी चीज़ अब मुझे शरीर में नहीं, कानों में लग रही थी।
"नहीं," मैंने कहा।
वो हँसी। पहली बार।
"झूठे," उसने कहा।
फिर ज़मीन पर बैठ गई, उसी फाटक के सामने, और अपने कैमरे की पट्टी साफ़ करने लगी।
मैं भी बैठ गया। गैराज की दीवार पर वो पुराना कैलेंडर अंदर लटका था, जिसका पन्ना दो साल पहले का अटका था और जिस पर से किसी ने नाम कैंची से काट दिया था। बाहर से वो नहीं दिखता। पर मुझे पता था कि वो वहाँ है।
लगभग आधी रात को ढाबे की तरफ़ से रोशनी आई।
रुक्मा दीदी थीं। सिर पर साड़ी का कोना, हाथ में कटोरे रखी एक थाली, कमर पर चाबियों का गुच्छा जो चलते वक़्त खनकता रहता था, और चेहरे पर वो भाव जो माँ के चेहरे पर होता है जब बेटा देर से घर लौटे और माँ ने खाना गर्म रखा हो।
"तुम दोनों," उन्होंने कहा, "यहाँ बैठे हो? ज़मीन पर?"
"दीदी—"
"चुप," उन्होंने कहा। "पहले हाथ धोओ।"
वहाँ पानी नहीं था। उन्होंने खुद अपनी पानी की बोतल से हमारे हाथ धुलवाए, जैसे हम दोनों आठ बरस के हों। फिर थाली रखी।
चार रोटियाँ, एक कटोरी में आलू, एक कटोरी में दाल, और नीचे एक मिट्टी का कटोरा जिसमें दही थी।
"खाओ," उन्होंने कहा।
"दीदी," मैंने कहा, "मेरे काग़ज़ अंदर हैं। कल सुबह सील हो जाएँगे।"
रुक्मा दीदी मेरे सामने बैठ गईं। उन्होंने मेरे घुटने पर हाथ रखा।
"सुन," उन्होंने कहा। "भूखा आदमी काग़ज़ नहीं पढ़ सकता। भूखा आदमी आवाज़ भी ठीक से नहीं सुन सकता, क्योंकि उसके अंदर एक आवाज़ चलती रहती है जो कहती रहती है कि पेट में कुछ नहीं है। मैं पैंतीस साल से रोटी बना रही हूँ। मुझे पता है। पहले रोटी खा। फिर जो करना है कर।"
मैंने रोटी उठाई। पहला कौर निगला और मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ ढीला हो गया है — कोई गाँठ, जो सुबह से कस रही थी।
नैना भी खाने लगी।
रुक्मा दीदी ने अपने आसपास देखा।
"जुगनू कहाँ है?"
"गया है," मैंने कहा। "कह रहा था कि टोल के पास रात भर बैठेगा।"
"अकेला?"
"वो अकेला नहीं है दीदी," मैंने कहा। "वो चलता-फिरता टोल है।"
रुक्मा दीदी हँसीं। उनकी हँसी इतनी बड़ी है कि पूरी गली जाग जाए। फिर वो चुप हो गईं और उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अर्जुन," उन्होंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"उस दिन तुमने मेरे आँगन में कहा था कि मेरे घर का कटा पहिया तीन जगह से कटा है।"
"जी।"
"मैंने वो पहिया खुद धोया था," उन्होंने कहा। "सुबह चार बजे, अँधेरे में, कुएँ के पास। मैंने सोचा था कि कहीं कोई साँप न काट गया हो। फिर मैंने देखा — तीन निशान, बराबर दूरी पर। ऐसा साँप नहीं काटता। ऐसा आदमी काटता है जो जानता है कि कहाँ काटना है।"
उसका हाथ मेरे घुटने पर से उठा और खुद के घुटने पर आ गया।
"मेरे पति तीस साल का था," उन्होंने कहा। "ट्रक के पीछे छोटी गाड़ी लेकर चलता था। सत्ताईस की रात थी। उसने कहा था कि आज जल्दी लौटूँगा, क्योंकि बच्चा बुख़ार में था।"
वो रुकीं।
"वो नहीं लौटा," उन्होंने कहा।
मैंने रोटी नीचे रख दी।
"दीदी—"
"नहीं," उन्होंने कहा। "आज मत पूछो। मैंने आज तुम्हें खाना दिया, कल तुम्हें जवाब दूँगी। कल मैं ढाबे में सब ड्राइवरों को बुला रही हूँ। जब वो सब बैठेंगे, तब बोलूँगी। अभी मेरी आवाज़ काँपेगी, और काँपती आवाज़ कमज़ोर आदमी की लगती है। मैं कमज़ोर नहीं हूँ।"
वो उठीं और अपनी साड़ी ठीक की।
"बेंच," उन्होंने कहा। "आठ बजे। सात बेंच। भूलना मत।"
"नहीं भूलूँगा दीदी।"
"और तुम," उन्होंने नैना से कहा, "तुम अपनी चाय खुद बनाना। मेरे ढाबे की चाय में तुम्हें चीनी कम लगती है।"
नैना हँस पड़ी।
रुक्मा दीदी चली गईं। उनकी चाबियों की आवाज़ दूर तक आती रही, फिर गली के मोड़ पर मिल गई।
हम कुछ देर चुप बैठे रहे।
"अर्जुन," नैना ने कहा।
"हूँ।"
"जब तुमने कहा कि तुम आवाज़ से झूठ पकड़ते हो — क्या ये हर बार सच होता है?"
मैंने आसमान देखा। तारे नहीं थे। सिर्फ़ धुएँ जैसा आसमान था, जिस पर शहर की लाइटें पीली चादर की तरह पड़ी थीं।
"नहीं," मैंने कहा। "कभी-कभी अच्छे लोग भी काँपते हैं। डर से। भूख से। ठंड से। और मैं उन्हें झूठा समझ बैठता हूँ।"
"तो फिर?"
"तो फिर," मैंने कहा, "जब भी मुझे कंपन मिले, मैं एक पल रुककर खुद से पूछता हूँ — इसे झूठ बोलने से फ़ायदा क्या है? और अगर जवाब न मिले, तो समझता हूँ कि वो डर है, झूठ नहीं।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम ये सब कहाँ से सीखा?"
"गाड़ियों से," मैंने कहा। "ट्रक भी काँपता है। हर ट्रक का एक कंपन होता है जो उसकी असली हालत बताता है। बाकी सब शोर है।"
तभी पीछे से पैरों की आहट आई।
कबीर।
वो अब भी वही साफ़ कपड़ों में था, पर अब उसके कंधे झुके हुए थे और थैला गायब था। उसने हमारे सामने आकर खड़े होकर कुछ नहीं कहा। बस खड़ा रहा, जैसे किसी ने उसे भेज दिया हो और वो खुद नहीं जानता हो कि क्या कहना है।
"कबीर," मैंने कहा।
"मैंने सुना," उसने कहा, "कि तुम्हें मुचलके पर छोड़ दिया।"
"हाँ।"
"दस हज़ार," उसने कहा। "मैंने भरे हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि तुम अंदर थे और मैं बाहर," उसने कहा। "बाहर वाला आदमी यही कर सकता है।"
"कबीर," नैना ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो शक था जो अब भी नहीं गया था, "वो रसीद, वो बही — तुमने दो दिन पहले से क्यों तैयार रखी थी?"
कबीर ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर उसने अपना कैलकुलेटर जेब से निकाला और इस बार उसे दबाया नहीं, सिर्फ़ हाथ में पकड़कर घुमाया।
"मेरी दुकान पर एक घड़ी है," वो धीरे से बोला। "दस बजकर सत्ताईस मिनट पर रुकी हुई है। दो साल से। मैंने उसे ठीक नहीं कराया, क्योंकि मुझे लगता है कि जिस वक़्त चीज़ें रुक जाती हैं, उस वक़्त को याद रखना चाहिए। और जो आदमी दो साल से एक रुकी घड़ी के नीचे बैठा हो, वो हर चीज़ दो दिन पहले से तैयार रखता है। मुझे आदत है।"
वो चुप हो गया।
"और तुम्हारी अम्मा?" नैना ने अचानक पूछा। "तुमने कहा था वो बीमार हैं।"
कबीर का हाथ रुक गया।
और उसी पल उसकी जेब से फ़ोन बजा।
उसने निकाला। स्क्रीन जल रही थी। मैं उसके कंधे के पीछे से देख सकता था — पर मैंने देखा नहीं, मैंने सुना। मैंने उसकी साँस सुनी, जो एक पल के लिए रुक गई।
स्क्रीन पर नाम लिखा था।
माँ नहीं।
सिर्फ़ — शांति।
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