A Dark Secret128 / 536

A Dark Secret – Chapter 128

7 min read November 6, 2026

तिवारी साहब ने रसीद उठाई। मैंने गर्दन आगे की।

तारीख़ देखी — पच्चीस। यानी छापे से दो दिन पहले की।

"पच्चीस तारीख़ की?" तिवारी साहब ने कहा। "इसका यहाँ क्या काम?"

"आप पढ़िए साहब," कबीर ने कहा। "नीचे लिखा है — यादव मोटर गैराज के काग़ज़, हिसाब में जमा।"

मैंने देखा, बाबू का हाथ रुक गया।

"क्या मतलब?" तिवारी साहब ने कहा।

"मतलब ये साहब," कबीर ने कहा, "कि गैराज का हर काग़ज़, हर रसीद, हर हिसाब — पच्चीस तारीख़ को ही मेरी दुकान की बही में चढ़ चुका था। मोहर के साथ। क्योंकि गैराज ने मुझे अपने पुर्ज़े का हिसाब देना था और मैंने उसका पूरा हिसाब अपनी बही में दर्ज कर लिया था। अब आप जो काग़ज़ कल ज़ब्त करके लाए हैं साहब, वो असली नहीं, नक़ल हैं। असली हिसाब तो तीन जगह है — मेरी बही में, गैराज के अपने खाते में, और तीसरी जगह, जो मैं नहीं बताऊँगा। आप एक उठा लीजिए, दो बची रहेंगी।"

थाने में एक पल के लिए सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रह गई।

ठुन। ठुन। ठुन।

तिवारी साहब ने रसीद को दोनों हाथों से पकड़ा और फिर मेज़ पर रख दिया। उन्होंने बही का पन्ना पलटा। मोहर देखी। मोहर देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तुमने ये रसीद पहले क्यों नहीं दी?"

"क्योंकि साहब," कबीर ने धीरे से कहा, "आपने पहले नहीं माँगी।"

तिवारी साहब ने कुछ सोचा। फिर उन्होंने अपनी कुर्सी पीछे सरकाई, जिससे उसका पाया फ़र्श पर खुरचा, और फाइल बंद कर दी।

"दस हज़ार का मुचलका," उन्होंने कहा। "दो ज़मानतदार। अगली तारीख़ की पर्ची ले जाओ। और सुनो —"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"—शहर में रहना। भागने की कोशिश मत करना। भागोगे, तो मैं नहीं, वो ढूँढ लेगा जो मुझसे ज़्यादा जल्दी ढूँढता है।"

मैंने सिर हिलाया।

"साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"मेरा औज़ार थैला? उसमें मेरे पापा का बनाया पुलर है। वो मेरा नहीं, उनका है।"

तिवारी साहब ने बाबू की तरफ़ देखा। बाबू ने कंधे उचकाए।

"कल आ जाना," तिवारी साहब ने कहा। "थैला मिल जाएगा।"

वो उठे और खिड़की की तरफ़ चले गए। मुझे लगा कि बात ख़त्म हो गई। पर वो रुके और बिना मुड़े बोले —

"अर्जुन।"

"जी साहब।"

"तुम्हारे चाचा ने जो बयान दिया है, वो मेरी फाइल में है। मैं उसे बदल नहीं सकता।"

"मैं नहीं कह रहा बदलिए साहब," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ ये कह रहा हूँ कि वो काग़ज़ अभी भी आपकी फाइल में है। किसी दिन किसी वकील को पढ़ने के लिए खुलेगी। और उस दिन ये भी पढ़ा जाएगा कि बयान किसने लिखवाया और किसने लिखा।"

तिवारी साहब ने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उनकी आँखों में जल्दी नहीं थी। कुछ और था। जैसे किसी आदमी को अपनी ही जेब से कोई पुराना काग़ज़ निकलता दिख जाए।

वो कुछ नहीं बोले।

मैं बाहर निकला।

बाहर शाम की रोशनी आँखों में चुभी। धूल थी, गोबर की सूखी महक थी, और सड़क के किनारे एक कुत्ता अपनी पूँछ का पीछा कर रहा था, जैसे उसने भी कोई मामला हल करना बाकी रखा हो।

नैना सामने खड़ी थी।

उसका बैग कंधे से उतरा हुआ था और कैमरा उसके हाथ में। उसके चश्मे पर धूल थी। वो कबीर की तरफ़ देख रही थी, और मुझे पता था कि क्या आने वाला है।

"तुम?" नैना ने कहा। "तुम्हें ये सब कहाँ से मिला?"

कबीर ने कंधे उचकाए।

"क्या मिला?"

"मत बनो," नैना ने कहा, और उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। "दो दिन पहले की रसीद? मोहर लगी बही? मुचलका? तीन घंटे में इतना तैयार काग़ज़ कहाँ से आया? तुम रात भर क्या कर रहे थे?"

कबीर ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना कैलकुलेटर जेब से निकाला, उसे हवा में एक बार दबाया — ठक — और वापस जेब में डाल दिया।

"देखो," उसने कहा, "मेरे पास रसीद है, मोहर है, बही है। काग़ज़ पर सब लिखा है।"

"काग़ज़ पर किसने लिखा?" नैना ने पूछा। "ये सवाल है।"

कबीर एक पल रुका।

"आँकड़े झूठ नहीं बोलते," उसने धीरे से कहा। "आदमी बोलते हैं। मैंने आज सिर्फ़ आँकड़े बोले।"

और वो मुड़कर चलने लगा।

नैना ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसके चेहरे पर वो गुस्सा था जो आदमी के चेहरे पर तब आता है जब वो किसी को शक की नज़र से देख रहा हो और उसे पता हो कि ये शक उसी के ख़िलाफ़ लौटकर आएगा।

"तुम इसे जानते हो?" उसने मुझसे पूछा। "इस आदमी पर भरोसा है?"

"नैना," मैंने कहा, "मैं आज सुबह उसकी दुकान पर था। उसने मुझे रोका नहीं।"

"रोका नहीं, मतलब ईमानदार? तुम ऐसे ही हर चीज़ का हिसाब लगाते हो?"

"मैं ऐसे ही हर आवाज़ का हिसाब लगाता हूँ," मैंने कहा। "और उसकी आवाज़ में आज वो कंपन नहीं थी जो झूठ बोलते वक़्त आती है। जब वो 'आँकड़े झूठ नहीं बोलते' बोला, तब नहीं थी।"

"तो फिर किस बात में थी?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"जब उसने कहा कि आदमी बोलते हैं," मैंने कहा।

नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना चश्मा ऊपर धकेला और आगे चल पड़ी।

तभी एक पतली आवाज़ आई। किसी बच्चे की आवाज़, जो बिना रुके बोल रहा हो जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो।

"दीदी! दीदी, सुनो ना!"

जुगनू दौड़ता आया। उसके पाँव नंगे थे और घुटने पर वो पुराना निशान था। उसके हाथ में एक पचास का नोट था, जो उसने इस तरह पकड़ा हुआ था जैसे काँच का टुकड़ा पकड़ा हो।

"मैंने देखा," उसने कहा, साँस लेने के लिए भी न रुका। "मैंने देखा, सफ़ेद कुर्ते वाला चाय की ठेली पर गया था। वही जिसने ताले की चाबी वाला गुच्छा हिलाया था। वो वहाँ गोलू से मिला।"

"कौन गोलू?" नैना ने पूछा।

"वही गोल चेहरे वाला, जो रुक्मा दीदी के ढाबे पर आया था, गले में पतली सोने की चेन," जुगनू ने कहा। "वो दोनों पाँच मिनट खड़े रहे। फिर गोलू ने कुर्ते वाले को कुछ कहा और ये नोट मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।"

"तुमने पैसे लिए?" मैंने कहा।

"नहीं लिए," जुगनू ने कहा। "पर वो मेरी जेब में डालकर गया। मैंने फेंकने की सोची, फिर सोचा, अगर मैं फेंक दूँगा तो तुम लोगों को कैसे बताऊँगा कि कितने के थे?"

मैं हँस पड़ा। थकान इतनी थी कि हँसी भी अजीब लगी।

"और कुछ सुना?" मैंने पूछा। "उनकी बात? आवाज़?"

जुगनू ने आँखें बंद कीं, जैसे वो अपने अंदर किसी दराज़ को खोल रहा हो।

"कुर्ते वाले ने कहा — 'वो लड़का बाहर आ गया।' और गोलू ने कहा — 'तो बाहर ही निपटा दो।' फिर कुर्ते वाले ने कहा — 'अभी नहीं। भाई साहब ने मना किया है।' बस इतना। फिर वो चले गए।"

मैंने नैना की तरफ़ देखा।

"भाई साहब ने मना किया है," मैंने कहा। "मतलब आज रात मुझे कुछ नहीं होगा।"

"और कल?" नैना ने कहा।

"कल का कल देखेंगे," मैंने कहा। "पहले मुझे अपने काग़ज़ चाहिए।"

हम गैराज पहुँचे तो रात हो चुकी थी।

फाटक पर बाहर से बड़ा लोहे का ताला लगा था और उसके साथ मोटी ज़ंजीर, जो दो बार लिपटी हुई थी। ताला नया था। चमक रहा था। मैंने उसे छुआ — ठंडा था। और नीचे ज़मीन पर उसकी परछाईं थी, जो चाँद की रोशनी में साँप जैसी लग रही थी।

मैंने फाटक हिलाया। ज़ंजीर ने वही आवाज़ दी जो हर बंद दरवाज़ा देता है — एक छोटी, ठंडी, बेकार आवाज़।

"अंदर जाना है?" नैना ने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "अंदर मेरा कुछ नहीं है। जो है, वो अंदर नहीं, ऊपर है।"

"कहाँ?"

मैंने ऊपर देखा। छत के नीचे लोहे की वो पुरानी पट्टी चलती थी, जिस पर मैंने सुबह अपनी पुरानी बनियान में बाँधकर सारे काग़ज़ रखे थे — बीम के पीछे, जहाँ से नीचे खड़े आदमी को कुछ नहीं दिखता।

"वहाँ," मैंने कहा। "और वो मेरे पास है, पर मेरे हाथ में नहीं।"

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