A Dark Secret – Chapter 127
"वापस चलो," उन्होंने ड्राइवर से कहा।
"कहाँ साहब?"
"जहाँ से आए थे।"
गाड़ी मुड़ी।
और तभी — तिवारी साहब की वही जेब फिर बजी।
वो नहीं निकालना चाहते थे। मैंने देखा, उनके हाथ ने जेब की तरफ़ जाने से पहले एक बार सोचा। पर उन्होंने निकाला, क्योंकि जिसका फ़ोन बज रहा हो, उसे उठाना पड़ता है।
उन्होंने कान पर रखा।
उस मीठी आवाज़ ने वही कहा जो पहले कहा था, पर इस बार ज़्यादा नरमी से, जैसे कोई बूढ़ा आदमी बच्चे को गोद में बिठाकर समझा रहा हो।
"बेटा, ज़्यादा तामझाम मत करो। गाड़ी वापस कर दो।"
गाड़ी में चार आदमी थे। एक भी नहीं बोला।
मैंने उस आवाज़ में वो हल्की कंपन सुनी जो झूठ बोलते वक़्त आती है। या शायद डर की थी।
मैं धीरे से मुस्कुराया। और उतनी ही धीमी आवाज़ में, उतनी ही मिठास से कहा —
"भाई साहब, आपका नंबर तो तिवारी साहब की जेब में निकला।"
॥
"भाई साहब, आपका नंबर तो तिवारी साहब की जेब में निकला।"
तिवारी साहब ने फ़ोन कान से दूर किया। गाड़ी में चार आदमी बैठे थे और चारों चुप थे। ड्राइवर ने पीछे देखने की कोशिश की, फिर आगे देखने लगा, जैसे उसे कुछ नहीं सुनाई दिया हो।
फ़ोन से वही मीठी आवाज़ आई, पर इस बार उसमें मिठास नहीं थी। जैसे किसी ने गुस्से में दाँत भींचकर बात की हो और फिर भी आवाज़ नीची रखी हो।
"तिवारी," आवाज़ ने कहा, "तुम्हारी जेब में सिर्फ़ तुम्हारा फ़ोन होना चाहिए।"
"साहब, मैंने कोई—"
"तुमने कुछ नहीं किया। तुम जो करना था, वो नहीं कर पाए। गाड़ी वापस कर दो। और उस लड़के का मुँह बंद करो। तामझाम मत करो।"
फ़ोन कट गया।
तिवारी साहब ने फ़ोन जेब में डाला। उनका हाथ एक बार काँपा — इतना हल्का कि अगर मैं सीट पर पसरा न होता, तो शायद मुझे भी न दिखता। पर मैं ग्यारह बरस की उम्र से गाड़ियों के नीचे पड़ा हूँ। आदमी की आवाज़ से पहले उसकी साँस बदलती है, और साँस से पहले उसका हाथ। मैं वही हाथ देखता हूँ।
"ड्राइवर," तिवारी साहब ने कहा। "थाना।"
"साहब, गैराज तो बाहर ही—"
"मैंने थाना कहा।"
गाड़ी मुड़ी। खिड़की से धूल अंदर आई और मेरे होंठों पर बैठ गई। मैंने जीभ से साफ़ किया और सोचा, अब ये मुझे गैराज नहीं ले जा रहे। मतलब भाई साहब का फ़ोन, गैराज से ज़्यादा ज़रूरी हो गया।
अब सुनो आगे क्या हुआ।
थाना छब्बीस नंबर का बाहर का दरवाज़ा लोहे का था और उस पर हरा रंग चढ़ा था, जो नीचे से उखड़ रहा था। अंदर ले जाने पर सबसे पहले वो पंखा दिखा जो छत पर लटका था और हर चक्कर पर ठुनकता था। ठुन, ठुन, ठुन। जैसे कोई बूढ़ा आदमी चलते-चलते हर तीसरे कदम पर लाठी टिकाता हो।
मुझे एक सीमेंट की बेंच पर बैठाया गया। बेंच ठंडी थी। दीवार पर चूना झड़ रहा था और उस पर किसी ने पेंसिल से कोई नाम लिखा था, जिसे बाद में किसी ने मिटाने की कोशिश की थी। मिटाने वाले का हाथ तेज़ नहीं था। नाम आज भी वहाँ है।
तिवारी साहब ने मेरी कलाई में लगी हथकड़ी देखी। उन्होंने अपनी जेब से चाबी निकाली और खोल दी।
"इसे ढीला किसने किया?" उन्होंने पूछा।
"आपके आदमी ने लगाया था साहब," मैंने कहा। "मैंने तो कुछ किया ही नहीं।"
उन्होंने मेरी कलाई देखी। मेरी कलाई पतली है। बल्लू कहता है कि तू ट्रक के नीचे जाता है, इसलिए सूखा रहता है। सच ये है कि मैं खाता कम हूँ और सोचता ज़्यादा हूँ।
तिवारी साहब ने हथकड़ी अपनी मेज़ पर रख दी और बैठ गए। मेज़ पर एक फाइल थी, एक रजिस्टर था और एक गिलास था जिसकी तली में चाय का भूरा छल्ला सूख रहा था।
"अर्जुन यादव," उन्होंने पढ़ा। "पिता का नाम रघुवीर यादव।"
"जी साहब।"
"ग्यारह साल पहले मरे।"
"जी साहब।"
"और तुम कल रात उसी गैराज में काग़ज़ जला रहे थे।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर उनमें वो चीज़ नहीं थी जो कालू की आँखों में होती है। उनमें बस ये था — जल्दी। काम जल्दी निपटाओ, फाइल जल्दी बंद करो, और घर जल्दी जाओ।
"साहब," मैंने कहा, "मैंने कुछ नहीं जलाया। और आपने जो काग़ज़ ज़ब्त किए, वो भी मेरे नहीं थे।"
"तुम्हारे चाचा ने लिखवाया है।"
"मैं जानता हूँ साहब। मेरे चाचा ने बयान लिखवाया, और उसी बयान में ये भी लिखवाया होगा कि काग़ज़ उन्होंने खुद जलाए। अब सोचिए साहब, जो आदमी खुद कह रहा है कि मैंने जलाए, वो अपने भतीजे पर शक क्यों डाल रहा है?"
तिवारी साहब ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने फाइल उलटी। फिर वो पीला नोट याद आया जो पहले इसी फाइल के नीचे दबा रहता था और आज नहीं था। मैंने पूछने की सोची, फिर सोचा कि अभी नहीं। कुछ चीज़ें तब पूछनी चाहिए जब सामने वाले के पास जवाब देने के सिवा कोई रास्ता न बचे।
तीन घंटे। मैं वहाँ तीन घंटे बैठा रहा।
तीन घंटे में मैंने बहुत कुछ सुना। बाहर की गली से एक ट्रक गुज़रा, जिसकी पिछली बेयरिंग घरघरा रही थी — मैंने मन में लिख लिया कि उसका मालिक कल तक इसी तरह चलाएगा और फिर हाफ़ पर खड़ा हो जाएगा। पीछे की तरफ़ से किसी ने दो बार पानी डाला, बाल्टी की तीन आवाज़ें आईं। और एक बार, बहुत दूर, किसी गाड़ी ने तीन बार स्टार्ट होकर बंद किया। स्टार्ट, बंद। स्टार्ट, बंद। स्टार्ट, चली।
मेरी कलाई पर पापा की घड़ी पाँच मिनट आगे चल रही थी, जैसे हमेशा। उसके नीचे छोटी पीतल की चाबी, पीतल का नट और फ़ौलाद का नट बंधे पड़े थे। मैंने उन्हें नहीं हिलाया। टोकरी में हाथ डालकर जो चीज़ निकाली जाए, वो बाद में किसी और को दिखती है। छिपाकर रखी चीज़ बाद में अपने आप पता चल जाती है।
बूढ़ा बाबू फाइल उठाकर आरोप पढ़ने लगा। उसका चश्मा मोटा था और नाक पर इतना नीचे बैठा था कि लगता था कभी भी गिरेगा। उसकी आवाज़ में सब शब्द पढ़े हुए थे। जैसे कोई बच्चा परीक्षा में पाठ सुना रहा हो और खुद उसका मतलब न जानता हो।
"आरोप यह है कि अभियुक्त ने रात ग्यारह बजे से सुबह चार बजे के बीच यादव मोटर गैराज में सरकारी काग़ज़ात को आग लगाकर नष्ट करने की कोशिश की—"
"बाबू जी," मैंने बीच में कहा।
वो रुक गए।
"ये काग़ज़ 'सरकारी' कब से हो गए?"
बाबू ने चश्मे के ऊपर से मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, फिर रुक गए, फिर उसने कुछ नहीं कहा और फाइल दोबारा उठा ली।
तिवारी साहब ने मुझे देखा। उनकी मूँछ एक बार हिली और मुझे लगा कि उनके अंदर कोई पुराना हिसाब बज रहा है — जैसे किसी बच्चे की फीस का बिल, जो हर महीने के आख़िर में पहाड़ जैसा बढ़ जाता है।
फिर दरवाज़े पर आहट हुई।
दरवाज़े पर खड़ा आदमी साफ़ कपड़ों में था। हल्की दाढ़ी, लंबा कद, हाथ में काला चमड़े का थैला जिस पर कोई वकील का नाम नहीं, सिर्फ़ एक मोहर थी। और दूसरे हाथ में एक काग़ज़ — पीला, मुड़ा हुआ, और उसके कोने पर गोल लाल मोहर।
कबीर।
मुझे लगा था कि वो अपनी दुकान पर होगा, अपने कैलकुलेटर के बटन दबाते हुए। पर वो यहाँ था, साफ़ कपड़ों में, और उसके चेहरे पर वो शांति थी जो अक्सर आदमी के चेहरे पर तभी आती है जब वो चीज़ें ख़त्म करके आता है, बातें नहीं।
"इंस्पेक्टर साहब," उसने कहा, "नमस्ते।"
"तुम कौन?"
"कबीर. गाड़ी महल, पंचर और पार्ट्स।"
तिवारी साहब ने उसे ऊपर से नीचे देखा। "क्या चाहिए?"
कबीर ने वो पीला काग़ज़ मेज़ पर रख दिया। फिर उसने थैला खोला और उसमें से एक मोटी सिली हुई बही निकाली, जिसका किनारा कई जगह से टेप लगाकर सँभाला गया था।
"साहब, ये मेरी दुकान के हिसाब की बही है। और ये रसीद उसी बही से निकली हुई है।"
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