A Dark Secret124 / 536

A Dark Secret – Chapter 124

7 min read November 6, 2026

और मैंने पहली बार उस रात अपनी घड़ी उतारी। उसे हाथ में लेकर देखा। पाँच मिनट आगे। हमेशा पाँच मिनट आगे। मैंने उसे कभी ठीक नहीं किया, क्योंकि पापा कहते थे — जो घड़ी आगे चलती है, वो आदमी को जल्दी उठाती है।

मैंने उसे कलाई पर वापस बाँधा।

और मैंने तय किया कि कल, जो भी हो, मैं नौ बजे काँच के दफ़्तर के फाटक पर पहुँचूँगा। कबीर ने पर्ची दी है। कबीर कुछ जानता है। कबीर का कैलकुलेटर गिरा था। कबीर का चेहरा बदला था। कबीर ने कहा था — आँकड़े झूठ नहीं बोलते।

और कबीर ने एक बात और कही थी जो मुझे अब समझ आ रही थी। उसने कहा था — "मैं इस काम का हिस्सा हूँ। न दुश्मन, न दोस्त, सिर्फ़ हिसाब वाला आदमी।"

हिसाब वाला आदमी कभी मुफ़्त में हिसाब नहीं देता।

मैं सो गया। या शायद सोया नहीं, बस आँखें बंद करके लेटा रहा।

सुबह की पहली आवाज़ जो मुझे सुनाई दी, वो गैराज के फाटक पर पड़ी चोट थी।

नहीं — वो चोट नहीं थी। वो किसी चीज़ का खींचा जाना था। ज़ंजीर।

मैं उठा। बाहर का उजाला स्लैट के फटे हिस्से से आ रहा था, सफ़ेद और तेज़।

फिर आई आवाज़।

"यादव मोटर गैराज। खोलो।"

मैं फाटक के पास गया और फटे हिस्से से बाहर झाँका।

बाहर सफ़ेद पुलिस गाड़ी खड़ी थी। छत की लाल बत्ती जल नहीं रही थी। और गाड़ी के सामने खड़ा था — इंस्पेक्टर शेखर तिवारी।

आज उसने धूप का चश्मा जेब में नहीं रखा था। आज उसने चश्मा पहना हुआ था। और उसके हाथ में वो फाइल थी, जिसके नीचे हमेशा एक मुड़ा हुआ पीला नोट दबा होता है।

आज नोट नहीं था।

आज उसके हाथ में कुछ और था।

आठ सिपाही थे। दो गाड़ियाँ। एक के पीछे खड़ा हुआ एक सिपाही हाथ में काली थैली लिए था।

और तिवारी के बाएँ हाथ में — हथकड़ी।

वो उसे हवा में लहरा रहा था। धीरे। जैसे कोई चाबी घुमा रहा हो।

मैंने कुंडी खोली।

"इंस्पेक्टर साहब," मैंने कहा। "सुबह-सुबह?"

"सुबह-सुबह," उसने कहा। "और तेरे लिए तो ये देर हो गई।"

वो अंदर आया। उसके सिपाही पीछे आए। गैराज में उनके जूतों की आवाज़ अजीब लग रही थी — जैसे कोई धातु के फ़र्श पर चल रहा हो।

तिवारी रुका। उसने चारों तरफ़ देखा। दीवार पर टँगी रिंच। कैलेंडर। पुरानी चारपाई। मेरा औज़ार थैला, जो मेरे पैरों के पास ज़मीन पर पड़ा था।

"तू आज कहाँ जाने वाला था?" उसने पूछा।

"कहीं नहीं।"

"झूठ।" उसने फाइल खोली। "कल रात ग्यारह बजे तू टोल के पीछे था। तेरे साथ एक लड़की थी। एक बूढ़ा आदमी था। और एक लड़का।"

मैं चुप रहा।

"तेरे पास काग़ज़ थे," उसने कहा। "जो काग़ज़ हमने इस गैराज से जब्त किए, उनमें कुछ था जो तेरे पास नहीं मिला।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"हमने तेरे चाचा को पूछताछ के लिए बुलाया था," तिवारी ने कहा। "वो नहीं आया। कल रात से लापता है।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।

"इंस्पेक्टर साहब," मैंने कहा, "मेरे चाचा का इससे कोई—"

"चाचा का नाम," उसने कहा, "एक काग़ज़ पर लिखा है। और वो काग़ज़ तेरे पास है।" उसने फाइल बंद की। "मुझे वो चाहिए। और मुझे वो चाबी भी चाहिए जो तू कल रात से जेब में रखे घूम रहा है।"

मैंने अपनी जेब की तरफ़ बिना देखे उसका वज़न महसूस किया।

"अब तू अंदर जाएगा," तिवारी ने कहा। "और कोई तुझे नहीं बचा सकता। न तेरी वो रिपोर्टर। न रुक्मा। न तेरा बूढ़ा गार्ड।"

उसने हथकड़ी उठाई।

"अब तेरा सारा खेल ख़त्म," उसने कहा।

मैं मुस्कुराया।

मुझे पता है कि उस वक़्त मुस्कुराना बेवकूफ़ी थी। पर मैंने सोचा — अगर मैं अब नहीं मुस्कुराया, तो शायद फिर कभी नहीं मुस्कुरा पाऊँगा।

"साहब," मैंने कहा, "मेरे पास तो सिर्फ़ पुराने औज़ार हैं।"

तिवारी ने हथकड़ी की एक कड़ी पकड़ी और मेरी कलाई की तरफ़ बढ़ाया।

और तभी बाहर से आवाज़ आई।

दो आदमी। कोई बोल नहीं रहा था — बस चल रहे थे, और उनके चलने की आवाज़ से पता चल रहा था कि वो जल्दी में नहीं हैं।

फाटक के बाहर एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में बड़ा लोहे का ताला और ज़ंजीर।

उसने अंदर झाँका। मेरी तरफ़ नहीं देखा। तिवारी की तरफ़ देखा।

तिवारी ने हल्का सिर हिलाया।

आदमी ने फाटक पकड़ा और उसे बाहर से खींचकर बंद कर दिया।

फिर आई ज़ंजीर की आवाज़।

फिर ताले की।

टक।

गैराज के अंदर अंधेरा और सफ़ेद उजाला दोनों एक साथ आ गए, क्योंकि स्लैट के फटे हिस्से से रोशनी आ रही थी और बाक़ी सब बंद हो गया था।

तिवारी ने हथकड़ी मेरी कलाई पर लगाई।

उसकी आवाज़ में कोई जीत नहीं थी। थकान थी।

"अर्जुन यादव," उसने कहा। "तू मुझे बता — तेरे पापा भी इतने ज़िद्दी थे?"

मेरी नज़र नीचे गई।

मेरे पैरों के पास, ज़मीन पर, पापा का औज़ार थैला पड़ा था। वही थैला जिसमें रिंच थे, हथौड़ा था, स्क्रू ड्राइवर थी, और पापा का बनाया बेयरिंग पुलर था।

और उस थैले के अंदर, एक जेब में, वो चाबी नहीं थी। वो काग़ज़ नहीं थे।

पर थैले के अंदर, पुरानी बनियान की तरह मुड़े कपड़े के नीचे, पापा का पुलर था।

और पुलर की नोक पर वही घिसाई थी जो पीतल के नटों पर थी।

मैंने तिवारी की तरफ़ देखा।

"साहब," मैंने कहा, "मेरे पापा ज़िद्दी नहीं थे। वो बस जल्दी में थे।"

तिवारी ने मेरी कलाई में हथकड़ी कसी।

और उसी वक़्त, बाहर, ज़ंजीर के पीछे, किसी ने फाटक पर हाथ रखा।

मैंने सुना — हाथ की हथेली लोहे पर। फिर एक आवाज़।

नैना की।

"अर्जुन! अर्जुन, अंदर कौन है? फाटक किसने बंद किया?"

तिवारी ने अपना सिर झुकाया।

"साहब," मैंने कहा, "वो बाहर रहेगी तो बेहतर है।"

"क्यों?"

"क्योंकि उसके पास कैमरा है," मैंने कहा, "और उसकी बैटरी दो घंटे चलती है।"

तिवारी ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला — न गुस्सा, न डर, कुछ और।

फिर उसने अपनी फाइल उठाई और मेरे सामने खोली।

"ये देख," उसने कहा। "ये तेरे चाचा का बयान है। कल रात का।"

मैंने पढ़ा नहीं। मैंने सुना।

क्योंकि तिवारी ने वो बयान पढ़ा नहीं। उसने बस एक लाइन बोली।

"तेरे चाचा ने लिखवाया है कि गैराज के सारे काग़ज़ उसने खुद जलाए।"

मेरे हाथ की हथकड़ी ठंडी थी।

"और," तिवारी ने कहा, "उसने ये भी लिखवाया है कि उसे तेरे ऊपर शक है।"

गैराज के बाहर नैना फिर फाटक पर हाथ मार रही थी।

और अंदर, अंधेरे में, मैं अपने पैरों के पास पड़े उस थैले को देख रहा था, जिसमें पापा का पुलर था।

और मैं सोच रहा था — अगर चाचा ने ये लिखवाया है, तो चाचा ज़िंदा है। और अगर चाचा ज़िंदा है, तो वो किसी के पास है।

और अगर वो किसी के पास है, तो वो किसी से डरकर ये लिखवा रहा है।

तिवारी ने फाइल बंद की।

"अब बता," उसने कहा, "तेरे पास जो काग़ज़ हैं, वो कहाँ हैं?"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

और मैंने वो किया जो मेरे पापा करते थे। मैंने सीधा जवाब नहीं दिया। मैंने एक सवाल पूछा।

"साहब," मैंने कहा, "आपकी फाइल के नीचे जो पीला नोट दबा रहता था — आज वो कहाँ है?"

तिवारी की मूँछ हिली।

पहली बार।

और उसी पल, बाहर, ज़ंजीर के पीछे, नैना की आवाज़ आई — इस बार किसी और से बोल रही थी।

"सुनिए, साहब! मैं रिपोर्टर हूँ। मुझे अंदर जाने दीजिए।"

और फिर एक तीसरी आवाज़ आई, दूर से, पतली और तेज़।

जुगनू की।

"भैया! भैया, मैंने देख लिया! मैंने देख लिया किसने ताला लगाया!"

तिवारी का चेहरा सख़्त हुआ।

और मैंने अपनी कलाई में हथकड़ी महसूस की, और मैंने महसूस किया कि वो हथकड़ी मेरी कलाई पर बहुत ढीली है।

क्योंकि मेरी कलाई पतली है।

और मेरे पास अभी भी एक हाथ खुला था।

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