A Dark Secret – Chapter 123
मैंने नैना की तरफ़ देखा। नैना ने हल्का सिर हिलाया।
"दीदी," मैंने कहा, "ये अलमारी देवा भाई के कमरे में है। इसमें दो ताले हैं। मेरे पास वो चाबी है जो पहला ताला खोलती है। पर असली ताला अंदर है।"
रुक्मा दीदी ने अलमारी देखी।
वो देर तक देखती रहीं। इतनी देर कि मुझे लगा वो कुछ गिन रही हैं।
"हरी अलमारी," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा।
"हाँ।"
"तीन खाने ऊपर, दो दरवाज़े नीचे।"
"हाँ।"
रुक्मा दीदी ने अपनी कमर से चाबियों का गुच्छा उतारा। वो गुच्छा भारी था। उन्होंने उसे दोनों हाथों में पकड़ा और देर तक देखा। फिर उन्होंने एक चाबी अलग की — काली, घिसी, बड़ी।
"ये नहीं," उन्होंने कहा, और वापस लगा दी।
"दीदी," मैंने कहा, "आपका हिसाब—"
"अभी नहीं," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं सुना था। "अभी तू यहाँ से निकल। और ये चाबी और ये काग़ज़ ऐसी जगह रख जहाँ कोई न ढूँढ सके।"
"गैराज—"
"गैराज में मत रख।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "गैराज में कल तेरे चाचा का नाम आएगा। मुझे लग रहा है।"
मेरी कलाई पर पापा की घड़ी थी, जो हमेशा पाँच मिनट आगे चलती है। उस वक़्त रात के ग्यारह बजकर अड़तालीस मिनट हो रहे थे। मेरे हिसाब से।
"दीदी," मैंने कहा, "आपको कैसे पता कि गैराज में नाम आएगा?"
वो एक पल चुप रहीं।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "तेरे पापा के साथ भी ऐसा ही हुआ था। पहले नाम आया था। फिर हादसा।"
फिर वो मुड़ीं और चल दीं।
जुगनू मेरे पास खड़ा था और उसका हाथ मेरी कमीज़ में उलझा हुआ था।
"भैया," उसने कहा, "दीदी अभी ऐसे क्यों बोलीं?"
"क्योंकि वो हमसे ज़्यादा जानती हैं," मैंने कहा। "और वो हमें थोड़ा-थोड़ा बताती हैं। जैसे कोई चारा डालता है।"
बूढ़ा गार्ड, जो अब तक दरवाज़े के बाहर खड़ा हमारी बातें सुन रहा था, अंदर आया। उसने अपनी सीटी जेब से निकाली और उसे हाथ में घुमाया।
"बेटा," उसने कहा, "मैं तो अब तेरे साथ हूँ। पर मुझे एक बात समझा दे। ये जो तू काग़ज़ जोड़ रहा है, इनसे क्या होगा? भाई साहब के पास वकील हैं।"
"गार्ड चाचा," मैंने कहा, "वकील काग़ज़ पढ़ता है। और जिस दिन इस शहर में आठ लोग एक साथ एक ही बात बोलेंगे, उस दिन वकील को भी पढ़ना पड़ेगा।"
वो हँसा। उसकी हँसी में दाँत कम थे।
"तेरे पापा भी ऐसी ही बातें करते थे," उसने कहा।
"ये आप आज तीसरी बार कह रहे हैं।"
"क्योंकि ये सच है," उसने कहा। "और सच बार-बार बोला जाता है।"
हम गोदाम से बाहर निकले।
बाहर धूल में सफ़ेद गाड़ी के टायर के निशान अभी भी थे, और गोदाम का बड़ा लोहे का फाटक खुला पड़ा था। रात की हवा में डीज़ल और जले काग़ज़ की महक मिली हुई थी। ऊपर आसमान में तारे नहीं थे, बस टोल की पीली लाइटें थीं, जो दूर से ऐसी लग रही थीं जैसे किसी ने आसमान में रस्सी पर बल्ब टाँग दिए हों।
नैना मेरे पास आई।
"अर्जुन," उसने कहा, "मैं आज रुक्मा दीदी के यहाँ रुकूँगी। टीटू वहीं सो रहा है।"
"ठीक है।"
"तू कहाँ?"
"गैराज।"
"दीदी ने मना किया था।"
"दीदी ने कहा था काग़ज़ गैराज में मत रख। मुझे गैराज में रहने से नहीं रोका।"
नैना ने चश्मा ऊपर धकेला।
"अर्जुन, तू कभी-कभी बहुत ज़िद्दी हो जाता है।"
"मेरी आदत है।"
"ये भी तेरे पापा की आदत थी?"
मैं रुक गया।
"नहीं," मैंने कहा। "ये मेरी अम्मा की है।"
वो हँसी। पहली बार उस रात।
फिर वो मुड़ी और रुक्मा दीदी के पीछे चल दी। जुगनू दौड़कर उसके साथ हो गया। बूढ़ा गार्ड मेरे पास खड़ा रहा।
"तू गैराज जा रहा है?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"मैं साथ चलूँ?"
"नहीं, गार्ड चाचा। आप टोल के पास रहिए। अगर सुबह कोई नई गाड़ी आए और कुछ अजीब हो, तो मुझे बताइए।"
"मैं नौकरी छोड़ चुका हूँ।"
"तो अब आपके पास वक़्त है," मैंने कहा।
वो हँसा और चला गया।
मैं अकेला गैराज की तरफ़ चला।
रास्ते में मैंने एक बार पीछे देखा। कोई नहीं था। पर मैंने चलते-चलते अपनी कमीज़ के नीचे चाबी वाली मुट्ठी दबाकर रखी, जैसे कोई बच्चा मिठाई छिपाता है।
यादव मोटर गैराज पहुँचा तो रात के बारह बज चुके थे।
फाटक पर ताला नहीं था। मैंने उसे खोला, अंदर गया, और उसे अंदर से कुंडी लगा दी।
गैराज के अंदर अंधेरा था। दीवार पर पुराना कैलेंडर टँगा था, जिसका पन्ना दो साल पहले का अटका हुआ था और ऊपर से किसी का नाम कैंची से काट दिया गया था। सिर्फ़ नाम का निशान बचा था। तार से बँधी बड़ी रिंच दीवार पर टँगी थी, जिसका हैंडल कई बार फिसल चुका था इसलिए उसे तार से बाँधा गया था।
मैंने पापा का औज़ार थैला उठाया।
वो भारी था। मैंने उसे खोला।
अंदर — दो नंबर का पाना, जिसके हैंडल पर तार लिपटा था। चार रिंच का सेट, जिसमें एक रिंच गायब था। छोटा भारी हथौड़ा, जिसके हैंडल पर जले निशान थे। पुरानी स्क्रू ड्राइवर, जिसकी नोक घिसी हुई थी। और पापा का बनाया बेयरिंग पुलर।
और इन सबके बीच, कपड़े में लिपटे, मेरे काग़ज़।
मैंने उन्हें बाहर निकाला।
इक्कीस काग़ज़। उन्नीस पर सत्ताईस। दो पर सिर्फ़ फीका नीला गोल। एक पीली रसीद, जिस पर टाइप किए शब्द थे — आगे मत बढ़ो। गार्ड का काग़ज़। भूरे जूट के पैकेट के चार काग़ज़ — तीन पर सत्ताईस, चौथे पर सत्ताईस काटकर पेंसिल से अट्ठाईस। टीटू का फटा पन्ना। और बिना साल की सत्ताईस की रसीदें।
मैंने उन्हें गिना। एक बार। दोबारा।
मैंने सोचा, अगर आज रात कुछ हो जाए, तो ये सब एक जगह नहीं रहने चाहिए।
मैं उठा और गैराज के पीछे गया, जहाँ छत के नीचे लोहे की एक पुरानी पट्टी चलती है जिस पर आम तौर पर पुराने पंखे लटकाए जाते हैं। मैंने एक कुर्सी उठाई, उस पर चढ़ा, और पट्टी के ऊपर हाथ डाला।
ऊपर धूल की मोटी परत थी। मैंने अपना रुमाल निकाला — वो तेल में डूबा रुमाल, जिसे मैं हमेशा जेब में रखता हूँ — और उससे धूल हटाई।
फिर मैंने सारे काग़ज़ एक साफ़ कपड़े में लपेटे। वो कपड़ा मेरी पुरानी बनियान थी, जो मैंने उस रात अपनी कमीज़ के नीचे पहनी थी। मैंने उसे उतारा, काग़ज़ उसमें रखे, और दोनों सिरों पर गाँठ लगाई।
फिर उन्हें उस पट्टी के ऊपर, दीवार और छत के जोड़ में, बीम के पीछे रख दिया।
वो जगह ऐसी थी कि नीचे से कुछ नहीं दिखता। और ऊपर से देखने के लिए आदमी को कुर्सी पर चढ़ना पड़ेगा, और कुर्सी पर चढ़ने वाले की परछाईं दरवाज़े पर दिख जाएगी।
मैंने नीचे उतरकर कुर्सी वापस अपनी जगह रखी।
फिर मैंने अपनी जेबें टटोलीं।
चाबी — जेब में।
पीतल का नट — जेब में।
फ़ौलाद का नट, जिस पर रघुवीर खुदा था — जेब में।
पापा की घड़ी — कलाई पर।
टीटू की टूटी चप्पल — थैले में। मैंने उसे बाहर निकाला और देखा। छोटी चप्पल, धूल से भरी, एड़ी से टूटी। मैंने उसे वापस थैले में रख दिया।
फिर मैं गैराज के कोने में पड़ी पुरानी चारपाई पर लेट गया।
नींद नहीं आई।
मैं बस छत देखता रहा।
सोचता रहा — कालू जो कहकर गया, वो सबसे ज़्यादा डराने वाली बात नहीं थी। डराने वाली बात ये थी कि उसने मेरे पापा के बोलने का तरीक़ा बताया — "अगर न दूँ"। जैसे वो उस वक़्त वहाँ था। जैसे वो उन शब्दों को अपने कानों से सुनकर याद रखे हुए है।
और मेरे कानों में एक और आवाज़ बज रही थी। रुक्मा दीदी की — "पहले नाम आया था, फिर हादसा।"
मैं उठा और गैराज के बाहर झाँककर देखा।
सड़क खाली थी। दूर टोल की लाइटें जल रही थीं। कोई गाड़ी नहीं।
मैं लौटा और फिर लेट गया।
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