A Dark Secret – Chapter 125
हथकड़ी मेरी कलाई पर थी, पर वो मेरी नहीं थी। वो बस मेरे ऊपर पड़ी थी, जैसे किसी की कुर्सी पर कोई अपनी जैकेट रख दे और भूल जाए।
तिवारी ने दूसरा छोर अपनी उँगली पर घुमाया। धातु की आवाज़ आई — बहुत पतली, बहुत सस्ती।
मैं हिला नहीं।
मैंने कान लगाया।
बाहर, ज़ंजीर पर हाथ पड़ा। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी बार — और तीसरी बार के साथ एक खाँसी आई।
सूखी खाँसी। जैसे किसी के गले में धूल बैठी हो और वो उसे निकालना भी न चाहता हो।
मैंने वो खाँसी पहचान ली।
यही खाँसी मैंने सुबह सुनी थी — जब गैराज के बाहर से ज़ंजीर खींची गई थी। यही खाँसी उस आदमी की थी जिसने सफ़ेद कुर्ता पहना था और जिसने बाहर से बड़ा लोहे का ताला लगाया था।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। बायाँ हाथ खुला था, इसलिए आसानी से गया।
पीतल की छोटी चाबी। पीतल का नट। और फ़ौलाद का वो नट जिस पर रघुवीर खुदा था।
तीनों मेरे पास थे।
और मैंने उन्हें वहीं, उसी पल, अपनी घड़ी के पट्टे के नीचे सरका दिया। घड़ी का पट्टा ढीला था — बरसों से ढीला था, और मैंने कभी ठीक नहीं कराया, क्योंकि पापा की घड़ी थी और पापा की चीज़ों में हाथ नहीं लगाते।
पट्टे के नीचे चाबी दबी रह गई।
तिवारी ने कहा, "जेबें खाली कर।"
मैंने एक हाथ से जेबें खाली कीं। तेल में डूबा रुमाल निकला। रुमाल के किनारे पर ज़ंग की वो लकीर थी, जो चाचा के रुमाल पर भी थी।
तिवारी ने रुमाल को दो उँगलियों से उठाया, जैसे कोई मरा चूहा उठा रहा हो।
"ये क्या है?"
"रुमाल है, साहब," मैंने कहा। "गाड़ी के नीचे काम करते वक़्त हाथ पोंछने का।"
"इसमें से बदबू आ रही है।"
"तेल की है, साहब। इत्र नहीं है।"
तिवारी ने रुमाल वापस मेरी तरफ़ फेंका।
बाहर ज़ंजीर फिर हिली। और इस बार नैना की आवाज़ आई, बहुत साफ़, बहुत ऊँची।
"सुनिए! मैं रिपोर्टर हूँ। मेरा नाम नैना जोशी है। मैं इस गैराज के बाहर खड़ी हूँ और मैं पूछ रही हूँ — अंदर कौन है? फाटक किसने बंद किया? बाहर से ताला लगाने का हुक्म किसने दिया?"
तिवारी ने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरी जान-पहचान की है?"
"साहब," मैंने कहा, "इस शहर में मेरी जान-पहचान सिर्फ़ गाड़ियों से है। बाकी सब संयोग है।"
तभी दूर से, पतली और तेज़, जुगनू की आवाज़ आई।
"भैया! भैया, मैंने देख लिया! मैंने देख लिया किसने ताला लगाया! भैया, सुन रहे हो? उसके हाथ में चाबियों का गुच्छा था और उसने फ़ोटो भी खींची!"
तिवारी का चेहरा सख़्त हुआ।
"फ़ोटो?" उसने कहा, जैसे खुद से।
मैंने कुछ नहीं कहा। पर मेरे अंदर एक चीज़ बैठ गई।
फ़ोटो।
मतलब जिसने ताला लगाया, वो अकेला नहीं था। वो किसी को दिखा रहा था कि काम हो गया।
तिवारी ने अपने एक सिपाही को इशारा किया। सिपाही दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"साहब," मैंने कहा, "वो बाहर खाँस रहा है।"
तिवारी रुका।
"कौन?"
"आपका आदमी। जिसने ज़ंजीर डाली। सूखी खाँसी है उसकी — धूल वाली। जब वो खाँसता है, ज़ंजीर की आवाज़ दब जाती है।"
तिवारी ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ नहीं था, पर उसकी आवाज़ में एक हल्की कंपन आई — बहुत हल्की, जैसे किसी पुरानी मशीन में कोई पेंच ढीला हो और बस उतना ही पता चले।
"तू बहुत सुनता है," उसने कहा।
"आदत है, साहब," मैंने कहा। "गाड़ी के नीचे काम करते-करते आदत पड़ गई।"
तिवारी ने अपनी फाइल बगल में दबाई और मेरा औज़ार थैला उठाया।
"ये साथ चलेगा," उसने कहा।
"ये मेरा है।"
"तभी तो साथ चलेगा।"
मैंने थैले को देखा। उसमें रिंच थे, हथौड़ा था, स्क्रू ड्राइवर थी, दो नंबर का पाना था जिसके हैंडल पर तार लिपटा था, और पापा का बनाया बेयरिंग पुलर था।
और उस पुलर की नोक पर वही घिसाई थी जो पीतल के नटों पर थी।
ये बात मैंने तिवारी को नहीं बताई।
कुछ बातें बतानी नहीं होतीं। कुछ बातें जेब में रहती हैं, जैसे तेल में डूबा रुमाल।
वो मुझे बाहर ले गया।
फाटक खुला, और बाहर सड़क पर नैना खड़ी थी। उसने अपना पुराना काला कैमरा दोनों हाथों से उठा रखा था। उसका चश्मा नाक पर सरका हुआ था और वो उसे नहीं भी रही थी, क्योंकि दोनों हाथ कैमरे पर थे।
"इंस्पेक्टर साहब!" उसने कहा। "मैं नैना जोशी हूँ। मैं इस गैराज के बाहर आठ बजे से खड़ी हूँ। मैंने देखा कि एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी आया, उसने बाहर से ज़ंजीर लगाई, गाड़ी में बैठा और चला गया। आपने उसे रोका क्यों नहीं?"
तिवारी ने अपना हाथ उठाया।
"कैमरा नीचे करो।"
"ये सरकारी गाड़ी है," नैना ने कहा, "ये सड़क सरकारी है, और मैं सड़क पर खड़ी हूँ। कैमरा नीचे नहीं करूँगी।"
तिवारी के एक सिपाही ने आगे कदम बढ़ाया।
मैंने नैना की तरफ़ देखा और बहुत सीधी आवाज़ में, जैसे कोई रोज़ की बात कह रहा हो, मैंने कहा —
"नैना, बेंच मत छोड़ना। आठ बजे वाला काम। और नौ बजे वाला काम भी मत छोड़ना।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
उसका चश्मा फिर सरका। उसने उँगली से ऊपर धकेला और बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "समझ गई।"
तिवारी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या काम?"
"सरकारी राज़ नहीं है, साहब," मैंने कहा। "ढाबे की सात बेंचें टूटी हैं। दीदी ने कहा था सुबह आठ बजे ठीक करनी हैं। कारीगर आदमी का काम कभी नहीं छोड़ना चाहिए।"
तिवारी ने नाक भौं सिकोड़ी और मुझे गाड़ी में धकेल दिया।
गाड़ी पुरानी थी। पीछे की सीट का कवर फटा था और उसके अंदर से स्प्रिंग निकल रहा था। इंजन की आवाज़ में एक हल्की घरघराहट थी — क्लच की बेयरिंग जैसी, पर पक्का नहीं कह सकता, क्योंकि सड़क का शोर ज़्यादा था।
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
बाईस नंबर टोल दूर पीछे छूट रहा था। सड़क किनारे ट्रक खड़े थे, कोई इंजन चालू किए, कोई बंद। एक ड्राइवर अपनी गाड़ी के पहिये के पास बैठकर रोटी खा रहा था और उसके हाथ में मिट्टी का कटोरा था।
मैंने सोचा — कितने आदमी इस शहर में रोज़ अपना हिसाब जोड़ते हैं और किसी को पता नहीं चलता।
तिवारी आगे बैठा था। उसने पीछे मुड़कर देखा।
"सुन," उसने कहा, "तेरे चाचा ने खुद बयान दिया है। मैंने नहीं लिखवाया। वो खुद आया और उसने लिखवाया। समझा?"
"कब आया, साहब?"
"सुबह।"
"कितने बजे?"
"ये तू क्यों पूछ रहा है?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "मेरे चाचा को सुबह छह बजे के बाद किसी ने नहीं देखा। मैंने खुद देखा — वो जागकर मेरी तरफ़ देख रहे थे, और वो आँखें नींद की नहीं थीं। डर की थीं।"
तिवारी ने मुँह फेर लिया।
"काग़ज़ पर सब लिखा है बेटा," उसने कहा। "काग़ज़ झूठ नहीं बोलता।"
"साहब," मैंने कहा, "काग़ज़ खुद कुछ नहीं बोलता। जो लिखता है, वो बोलता है।"
गाड़ी एक गड्ढे से गुज़री और मेरी हथकड़ी खिड़की की सीट से टकराई।
मैंने उसे सहलाया, जैसे कोई चोट लगी बिल्ली को सहलाता है।
फिर मैंने कहा, "साहब, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"आपकी फाइल के नीचे जो पीला नोट दबा रहता था — आज वो कहाँ है?"
गाड़ी की रफ़्तार ज़रा धीमी हुई। या मुझे लगा।
तिवारी ने कुछ नहीं कहा।
"रोज़ होता था, साहब," मैंने कहा। "मैंने तीन बार देखा — एक बार थाने में, एक बार गैराज पर, एक बार आज सुबह। आज फाइल के नीचे कुछ नहीं था। या तो आपने उसे जेब में रख लिया, या किसी और ने उठा लिया।"
तिवारी की मूँछ हिली।
एक बार।
और मैंने उसकी आवाज़ में वो चीज़ सुनी जो मैं अब पहचानने लगा था — डर नहीं, घबराहट भी नहीं। बस एक हल्की सी कंपन, जैसे कोई आदमी अंदर से किसी से कह रहा हो, अब मुझे अकेला छोड़ दो।
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