A Dark Secret – Chapter 121
"अगर ये उसकी जान से महँगी है," नैना ने धीरे से कहा, "तो ये उस अलमारी की है जिसकी चाबी देवा भाई अपनी जेब में रखते हैं।"
"और अगर ये उस अलमारी की है," मैंने कहा, "तो सवाल ये है — बनवारी लाल के पास ये चाबी कैसे आई?"
रात के पौने दो बजे थे।
मैं और नैना नैना की छोटी पुरानी गाड़ी में बैठे थे। गाड़ी का एक पहिया हवा कम होने से अलग बोल रहा था — धक-धक, धक-धक — जैसे कोई चलते-चलते गिनती कर रहा हो। ऊपर के धातु के फ़्रेम से हल्की खड़खड़ आ रही थी।
"गाड़ी का पहिया कम है," मैंने कहा।
"अभी मत करो," नैना ने कहा।
"मैं अभी नहीं कर रहा। मैं बता रहा हूँ कि जब ये रुकेगी, तो मुझे बदलना पड़ेगा।"
"अर्जुन।"
"हाँ।"
"अगर ये अलमारी नहीं खुली और अंदर कोई आ गया—"
"तो हम ये कहेंगे कि हम रास्ता भूल गए थे।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। हवा में उसका चश्मा फिर सरक आया था।
"तुम ऐसे कैसे हो सकते हो?"
"कैसे?"
"इतने लोग तुम्हारे पीछे पड़े हैं। तुम्हारे पापा मरे। तुम्हारा चाचा ग़ायब है। और तुम गाड़ी के पहिये की बात कर रहे हो।"
मैंने सड़क देखी।
"क्योंकि अगर मैं पहिये की बात नहीं करूँगा," मैंने कहा, "तो मैं उस बात को सोचने लगूँगा जो मुझे देखनी है। और उसे सोचकर मैं कहीं नहीं पहुँचूँगा।"
वो चुप हो गई।
हम टोल के पीछे वाली गली से गोदाम तक गए। रात में गोदाम सोता है, पर पूरा नहीं सोता। कोई एक बल्ब जलता रहता है। कोई एक कुत्ता जागता रहता है। और आज वो कुत्ता भी नहीं जागा — वो एक ईंट के ढेर के पीछे सो रहा था, जैसे उसे पहले से बता दिया गया हो कि आज रात उसे कुछ नहीं देखना है।
गोदाम का छोटा दरवाज़ा। कुंडी लगी थी पर ताला नहीं। क्योंकि अंदर वाला हिस्सा पहले से ही बंद जगह है। जो लोग सोचते हैं कि उनकी बाड़ काफ़ी है, वो अंदर के दरवाज़े का ताला नहीं लगाते।
मैंने कुंडी उठाई।
अंदर अंधेरा था। सिर्फ़ एक पीली लाइट, बहुत दूर, गोदाम के बीच में, जल रही थी। मैंने अपनी पुरानी आदत से पहले आवाज़ सुनी — कोई साँस नहीं, कोई कुर्सी नहीं, कोई फ़ोन नहीं। बस दीवार के पीछे से किसी ट्रक का ठंडा होता इंजन, जो टक-टक कर रहा था जैसे बूढ़े आदमी के दाँत।
नैना मेरे पीछे आई। उसने अपना कैमरा उठाया, फिर नीचे कर दिया।
"अंधेरे में कुछ नहीं आएगा," मैंने कहा।
"मुझे कुछ नहीं चाहिए," उसने कहा। "मुझे सिर्फ़ तुम्हारी आवाज़ सुननी है, ताकि पता चले तुम कहाँ हो।"
देवा भाई का कमरा गोदाम के पीछे था। एक छोटा कमरा, जिसका दरवाज़ा आज खुला था। शायद मुनीम जी भूल गए थे। शायद जानबूझकर छोड़ गए थे — क्योंकि जिसे फँसाना हो, उसके लिए दरवाज़ा खुला छोड़ दिया जाता है।
मैंने अंदर कदम रखा।
चाय की महक अब भी थी। इलायची की महक अब भी थी। मेज़ पर एक फ़ोन उल्टा पड़ा था, दूसरा किनारे पर। और तीसरा — अलमारी के अंदर, चुप।
अलमारी कमरे के कोने में थी। लोहे की, गहरे हरे रंग की, ऊपर तीन खाने, नीचे दो दरवाज़े। उसकी पुताई उतर रही थी और जहाँ हाथ लगता था, वहाँ चिकना हो गया था। मतलब कोई उसे बहुत छूता था।
मैंने चाबी जेब से निकाली।
मेरे हाथ ठंडे थे, पर चाबी उससे भी ठंडी थी। मैंने उसे ताले में डाला।
वो घुस गई।
पूरी अंदर गई। जैसे कोई घर में लौटकर आता है।
मैंने साँस रोकी और घुमाया।
वो नहीं घूमी।
मैंने फिर घुमाया। ज़ोर से। मेरी कलाई का तार खिंचा। उलटी तरफ़ से घुमाया।
कुछ नहीं।
चाबी अंदर थी, ताले को पहचानती हुई लग रही थी, पर घूमने से मना कर रही थी। जैसे ताला कहे — तुम सही हो, पर वक़्त ग़लत है।
"क्या हुआ?" नैना ने धीरे से पूछा।
"अंदर जा रही है," मैंने कहा। "पर घूम नहीं रही।"
"मतलब?"
"मतलब ये अलमारी की चाबी है," मैंने कहा। "पर ये अलमारी का ताला नहीं है।"
मैंने अपने पीछे से पापा का औज़ार थैला खोला और उसमें से पतला पाना निकाला। मैंने उसे ताले में डालकर अंदर टटोला। मेरी उँगली को कुछ महसूस हुआ — ताले के अंदर एक दूसरी परत। दो ताले। एक के पीछे दूसरा।
"इसमें दो ताले हैं," मैंने कहा। "ऊपर वाला जो दिख रहा है, वो नकली है। असली अंदर है।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदल गया था — डर नहीं, हिसाब।
"मतलब बनवारी के पास जो चाबी थी," उसने कहा, "वो पहला ताला खोलती है। दूसरे की चाबी अभी भी—"
"दूसरे की चाबी किसी और के पास है," मैंने कहा।
मैंने चाबी निकाली और उसे देखा। उसके घिसे दाँत। उसका धुँधला अंक। इतनी छोटी चीज़, और उस पर एक आदमी की जान टिकी थी।
मैंने हाथ नीचे किया।
"आज नहीं," मैंने कहा। "आज नहीं खुलेगी। इसे ज़बरदस्ती नहीं तोड़ सकते, वरना पता चल जाएगा कि कोई आया था।"
"तो कल?"
"कल हम उस चाबी को लेकर आएँगे जो अंदर वाले ताले की है। और उसके लिए हमें उस आदमी को ढूँढना पड़ेगा जिसने बनवारी को ये चाबी दी।"
मैं मुड़ा, ताकि नैना को बताऊँ कि चलो।
और तभी मेरे पीछे, कमरे के दरवाज़े के बाहर, अंधेरे में, कोई चीज़ बोली।
पहले आवाज़ नहीं आई। पहले आई ठक-ठक। छोटी, तेज़, नपी हुई। जैसे कोई जेब में पड़ा लोहा उँगली से खेल रहा हो।
मुझे वो आवाज़ पहचानी। मैंने उसे तीन जगह सुना था। एक बार नाली के मोड़ पर। एक बार रुक्मा दीदी के आँगन के बाहर। और एक बार उस रात, जब मैं पीले ट्रक के नीचे लेटा था और किसी ने ट्रक की तरफ़ देखकर सिर हिलाया था।
"चाबी तो मेरे पास है, अर्जुन।"
आवाज़ धीमी थी। इतनी धीमी कि जैसे कोई मेरे कान के बिल्कुल पास बोल रहा हो।
मैंने धीरे से मुड़कर देखा।
दरवाज़े के बाहर, पीली लाइट के किनारे, एक आदमी खड़ा था। चौड़ा शरीर। गले में काला धागा। भौंह पर कटा हुआ निशान। और उसके दाएँ हाथ में वो लाल प्लायर, जो अब भी खुल रहा था और बंद हो रहा था, ठक-ठक, ठक-ठक, जैसे कोई उँगली से दरवाज़ा खटखटा रहा हो।
कालू ने एक कदम अंदर रखा।
"इतनी रात को," उसने कहा, "भाई साहब की अलमारी के सामने। तुम्हें शर्म नहीं आई?"
मैंने चाबी अपनी मुट्ठी में बंद कर ली।
"शर्म आती है," मैंने कहा। "पर उससे ज़्यादा भूख लगी है।"
कालू हँसा। उसकी हँसी में कोई मज़ाक नहीं था।
"अब तू मज़ाक करेगा," उसने कहा, "तो मैं भी करूँगा।" उसने प्लायर को अपनी तरफ़ घुमाया और उसकी नोक मेरी तरफ़ कर दी। "चाबी दे। और जो काग़ज़ गार्ड ने तुझे दिए, वो भी दे।"
मैंने नैना की तरफ़ देखा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, एक हाथ अब भी कैमरे पर, और उसकी आँखें कालू से हट नहीं रही थीं।
"अगर न दूँ?" मैंने पूछा।
कालू ने प्लायर बंद किया। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी आई, और वो नरमी सबसे ख़तरनाक थी।
"अर्जुन," उसने कहा, "तेरे पापा भी इसी अलमारी के सामने खड़े थे। दस साल पहले। सत्ताईस सितंबर की रात। और वो भी यही बोले थे — अगर न दूँ?"
कमरे में एक पल के लिए कुछ भी नहीं बचा। न चाय की महक, न इलायची, न पीली लाइट।
सिर्फ़ उसकी आवाज़ और उसके हाथ में चुप हो गया प्लायर।
"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ उलटी धीमी हो गई थी। मुझे पता था कि मेरी आवाज़ कब ऐसी होती है।
कालू मुस्कुराया।
"फिर," उसने कहा, "तेरे पापा ने वो किया जो तू करने वाला है।"
उसने प्लायर जेब में डाला और अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"चाबी दे, अर्जुन। वरना आज रात ये गोदाम एक और नाम याद रखेगा।"
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"चाबी दे, अर्जुन। वरना आज रात ये गोदाम एक और नाम याद रखेगा।"
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