A Dark Secret – Chapter 120
और तभी मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।
क्योंकि मुझे एक कमरा याद आ गया।
दस बजे का कमरा। टोल के पीछे। सादा दरवाज़ा। अंदर चाय की महक, इलायची की महक, दो फ़ोन मेज़ पर, और एक तीसरा फ़ोन जो अलमारी के अंदर बज रहा था। और देवा भाई, जो अपनी जेब से पीतल की एक छोटी चाबी निकालकर उसे उलटी हथेली में छिपा लेते थे जब मैंने उस तरफ़ देखा था।
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
"मुझे एक अलमारी याद है," मैंने कहा।
"कहाँ?"
"देवा भाई के कमरे में। जो अलमारी बंद रहती है। जिसके अंदर फ़ोन बजता है और वो उसे उठाते भी नहीं।"
नैना की आँखें धुंध में चमकीं।
"और उसकी चाबी कहाँ रहती है?"
मैंने धीरे से कहा, "उसकी जेब में। हमेशा।"
हम दोनों वहीं खड़े रह गए। सड़क पर एक भी गाड़ी नहीं थी। बस धुंध और उस धुंध में टोल की पीली बत्ती।
और मेरे हाथ में एक चाबी थी जो शायद उसी अलमारी की थी। या शायद नहीं भी थी। यही सबसे बुरी बात थी — कि मैं नहीं जानता था।
तभी पीछे से एक गाड़ी आई।
मैंने उसकी आवाज़ पहले सुनी। इंजन साफ़ था, नरम, जैसे किसी नए कपड़े को हाथ लगाना। ब्रेक बजे नहीं। गाड़ी रुकी और उसमें से एक आदमी उतरा।
गोल चेहरा। सफ़ेद शर्ट। गले में पतली सोने की चेन। हाथ में कुछ नहीं, बस उँगलियाँ मुड़ी हुईं, जैसे वो हवा में कोई गिनती कर रहा हो।
मैंने मन में उसका नाम गोलू रख लिया। डर में भी आदमी को कुछ तो करना पड़ता है।
"अर्जुन यादव?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"भाई साहब ने भेजा है।" उसने जेब से एक मोटी गड्डी निकाली। सफ़ेद धागे से बँधी। गाँठ के नीचे एक मुड़ा हुआ काग़ज़ दबा था। "ये रख लो। और अब ये सब बंद करो। भाई साहब ने कहा है, तुम चुप हो जाओ, बाकी सब वो संभाल लेंगे।"
गड्डी मेरी तरफ़ बढ़ी हुई थी।
मैंने उसे नहीं छुआ।
"कितने हैं?" मैंने पूछा।
"गिनने की ज़रूरत नहीं।"
"मुझे गिनने की आदत है," मैंने कहा। "ट्रक के पुर्ज़े गिनता हूँ, रसीदें गिनता हूँ, चाय के कटोरे गिनता हूँ। पैसे भी गिन लूँगा। कितने हैं?"
वो एक पल रुका। फिर बोला, "पचास हज़ार।"
मैंने सिर हिलाया।
"पचास हज़ार," मैंने दोहराया। "और ये पचास हज़ार किस काम के?"
"इस काम के कि तुम अपनी गाड़ी लेकर अपने शहर लौट जाओ।" उसकी आवाज़ में अब भी वो नरमी थी, पर वो नरमी अब चाकू की तरह लग रही थी। "क्योंकि अगर तुम नहीं लौटोगे, तो भाई साहब को मजबूरी में कुछ और करना पड़ेगा। और भाई साहब कोई काम मजबूरी में करते हैं तो बहुत कम लोग बचते हैं।"
गार्ड ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। नैना ने अपना हाथ मेरी बाँह पर रख दिया, जैसे वो मुझे रोक रही हो — या खुद को।
मैंने गड्डी की तरफ़ देखा। फिर उसकी तरफ़।
"भाई साहब ने ठीक नहीं सोचा," मैंने कहा।
"क्या?"
"मेरी मज़दूरी साफ़ है," मैंने कहा। "मैंने जो काम किया, उसका पैसा लिया। जो नहीं किया, उसका नहीं लिया। आज मैंने पाँच बेंच ठीक किए, चालीस रुपये लिए। उसमें से चाय पी ली। हिसाब बराबर है।"
मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया — गड्डी लेने के लिए नहीं। उसकी तरफ़ इशारा करने के लिए।
"ये पैसे ले लिए तो कल से मेरी हर मज़दूरी पर सवाल उठेगा। फिर मैं जो कमाऊँगा, वो मेरा नहीं होगा। वो उधार होगा। और मुझे उधार पसंद नहीं।"
गोलू ने गड्डी नीचे कर दी।
"तुम्हें पता है कि तुम किससे बात कर रहे हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "आप कौन हैं?"
वो एक पल के लिए रुक गया। और उस रुकावट में मुझे साफ़ सुनाई दिया कि उसकी आवाज़ का नरम हिस्सा कहीं पीछे छूट गया था।
"तुम्हारी गाड़ी का पिछला पहिया," उसने धीरे से कहा, "वो अभी ठीक है।"
मेरे हाथ में जो चाबी थी, वो मुट्ठी में बंद हो गई।
"और अगली बार," उसने कहा, "पहिया नहीं होगा।"
वो मुड़ा, गाड़ी पर बैठा और चला गया। जाते वक़्त उसने एक बार भी पीछे नहीं देखा, और यही सबसे डरावनी बात थी। जो आदमी पीछे देखता है, वो डरता है। जो नहीं देखता, वो जानता है कि उसका काम हो चुका है।
हम वहीं खड़े रहे। गार्ड के हाथ से टॉर्च गिर गई और वो उसे उठाने नहीं झुका।
"बेटा," उसने कहा, "मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकता। मुझे—"
"आप मेरे साथ ही आएँगे," मैंने कहा। "अगर आप वहीं रुके, तो कल सुबह वो आपसे भी यही बात कहेंगे। और आपको पता है, आपके पास न पहिया है, न गाड़ी।"
गार्ड ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी टॉर्च उठाई, अपनी सीटी कमर से खोली और जेब में डाल दी, जैसे कोई नौकरी छोड़ रहा हो।
"चलो," उसने कहा।
रातरानी ढाबे पर उस वक़्त भी चूल्हा जल रहा था। कड़ाही में तेल का बुलबुला उठ रहा था और रुक्मा दीदी उस पर पूरी तरह झुकी हुई थीं। उनकी कमर पर चाबियों का गुच्छा था, और जब वो हिलती थीं तो वो गुच्छा बोलता था — चन-चन — जैसे ढाबे का दूसरा चूल्हा।
जुगनू नीम के नीचे उल्टे ढोल पर बैठा था। उसने हमें देखा और दौड़कर आया।
"दीदी," वो चिल्लाया, "गार्ड बाबा आए हैं!"
रुक्मा दीदी ने करछुल नीचे रखा। उन्होंने गार्ड को देखा, फिर मुझे, फिर गार्ड को।
"अरे," उन्होंने कहा, "ये तो टोल का है। ये चौबीस साल से वहीं खड़ा है। मैंने इसको कभी इधर आते नहीं देखा।"
"आज रात ये हमारे साथ है," मैंने कहा।
"क्यों?"
मैंने एक पल सोचा।
"क्योंकि आज रात ये गवाह है।"
रुक्मा दीदी ने कुछ नहीं पूछा। उन्होंने बस चार कटोरे निकाले, चार में चाय डाली और उन्हें बेंच पर रख दिया। फिर वो मेरे सामने खड़ी हो गईं।
"अर्जुन," उन्होंने कहा, "मुझे सब बताओ। और सच बताओ, क्योंकि मैं झूठ को चाय में पहचान लेती हूँ, वो फीकी लगती है।"
मैंने बताया। पैकेट, चार काग़ज़, चाबी, गोलू, पचास हज़ार, धमकी।
मैंने कुछ नहीं छिपाया।
जब मैं ख़त्म हुआ तो रुक्मा दीदी ने अपनी करछुल उठाई और कड़ाही में पटक दी। तेल उछला।
"पचास हज़ार," उन्होंने कहा।
"हाँ।"
"और तूने लिए नहीं।"
"नहीं।"
वो मेरे पास आईं। उनकी आँखें छोटी हो गई थीं, जैसे वो किसी को पहचान रही हों — पर मुझे नहीं, किसी और को।
"तेरे पापा भी ऐसे ही थे," उन्होंने कहा। "रघुवीर के पास भी पैसा आता था। बहुत आता था। लोग उसे बीच रास्ते में रोककर लिफ़ाफ़े देते थे। वो लेता नहीं था। और जो नहीं लेता, उसका हिसाब सबसे महँगा पड़ता है।"
उन्होंने मेरा सिर पकड़कर अपने सीने से लगा लिया। ऐसे कोई अपने बेटे को नहीं लगाता — ऐसे कोई अपने बचे हुए को लगाता है।
"तू अपने पापा जैसा है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा। "और यही सबसे बड़ी मुसीबत है।"
जुगनू ने मेरी जेब में झाँका, जहाँ चाबी थी।
"ये किसकी है?" उसने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा।
"तो फिर पता करो," जुगनू ने कहा, जैसे कोई बड़ा आदमी फ़ैसला सुनाता है। "पता करने से पहले कौन सोता है?"
नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा और हँसी।
"ठीक कह रहा है," उसने कहा।
टीटू बेंच के नीचे बैठा था, आँखें बड़ी किए। उसने जब चाबी देखी तो उसका चेहरा पत्थर हो गया।
"ये," उसने कहा, "ये मैंने देखी है।"
हम सब उसकी तरफ़ घूम गए।
"कहाँ?"
"बनवारी जी के पास।" टीटू ने अपना घुटना दबाया। "वो इसे कभी-कभी जेब से निकालते थे, देखते थे, और वापस रख देते थे। एक बार मैंने पूछा कि ये किसकी है, तो उन्होंने कहा — बेटा, ये वो चाबी है जो मेरी जान से भी महँगी है।"
मैंने चाय का कटोरा नीचे रख दिया। मेरा हाथ अब भी हिल रहा था — पैसों की धमकी से नहीं। उस बात से जो टीटू ने अभी कही थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno