A Dark Secret – Chapter 119
अब मैंने उसे पहचाना।
वो टोल का गार्ड था। वो बूढ़ा आदमी जो हर रात फाटक पर खड़ा रहता था, सफ़ेद कमीज़, कमर पर बंधी काली बेल्ट, गले में धागे में लटकी सीटी, और हाथ में हमेशा वही लकड़ी की टॉर्च। जब भी मैं टोल से गुज़रता था, वो सीटी बजाता था और कहता था — भाई साहब, गाड़ी साइड में।
"आप?" मैंने कहा।
वो पीछे हटा। उसकी एड़ी ईंट से टकराई और वो लड़खड़ाया।
"बेटा, मैं… मैं यहाँ चौकीदारी कर रहा हूँ। रात में चोरी होती है।"
"कौन सी चोरी?" मैंने कहा। "जो आप खुद कर रहे हैं?"
नैना उसके पीछे आ गई थी। उसने अपना नैना वाला पुराना कैमरा सामने कर दिया, और उसकी लाल बत्ती गार्ड के चेहरे पर पड़ी।
गार्ड ने वो रोशनी देखी और उसका चेहरा ऐसे बदला जैसे किसी ने उसकी कमीज़ उतार दी हो। वो दीवार से टिक गया, फिर धीरे-धीरे नीचे बैठ गया, जैसे उसकी टाँगें खुद ही मुड़ गईं।
"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ काग़ज़ पहुँचाता हूँ।"
"किसके लिए?"
"बेटा—"
"किसके लिए?" मैंने दोहराया। मेरी आवाज़ उलटी धीमी हो गई थी। मुझे खुद पता चल जाता है जब मेरी आवाज़ ऐसी हो जाती है।
गार्ड ने अपनी कमीज़ के अंदर से वो काग़ज़ निकाला और घुटनों पर रख दिया। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि काग़ज़ खुल ही नहीं रहा था।
"मुझे तो बनवारी जी ने कहा था," उसने कहा। "पर अब वो खुद किसी को नहीं मिलते।"
और मैं वहीं खड़ा रह गया।
क्योंकि मुझे याद आया कि नैना ने उस रात मुझसे क्या कहा था — असली रसीद काग़ज़ नहीं होती। असली रसीद काउंटर वाले का हाथ होता है।
वो हाथ टीटू था। और ये हाथ टोल का गार्ड था, जो चौबीस साल से फाटक पर खड़ा था और हर रात सीटी बजाकर गाड़ियों को रोकता था।
गार्ड ने अपना चेहरा उठाया। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो झूठ बोलने वाले की आँखों में होता है। उसकी आँखों में थकान थी। बहुत पुरानी थकान।
"बेटा," उसने धीरे से कहा, "मैं दो साल से हर महीने सत्ताईस तारीख़ को ये काग़ज़ इस दीवार में रख रहा हूँ, और सुबह होने से पहले कोई उसे उठा ले जाता है। मैंने कभी उस आदमी का चेहरा नहीं देखा। मैं सिर्फ़ दस रुपये लेता हूँ। हर महीने के दस रुपये।"
मैं उसके सामने बैठ गया। धुंध हमारे बीच से गुज़र रही थी।
"दस रुपये," मैंने कहा।
"और एक बात," उसने कहा। "जब भी मैं ये काग़ज़ रखता था, अगले दिन वो मुझे चाय में इलायची डालकर देता था।" उसने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। "मुझे नहीं पता था कि इसमें क्या लिखा है। मैं पढ़ नहीं सकता।"
मैंने काग़ज़ लिया। खोला।
उस पर तारीख़ थी। सत्ताईस। और नीचे की तरफ़ एक फीका नीला गोल निशान।
और मैंने आँख बंद करके सुना — दूर, टोल की लाल बत्ती के पीछे, कोई गाड़ी तीन बार स्टार्ट हो रही थी। एक बार। बंद। दोबारा। बंद। और तीसरी बार, वो चली।
इस बार वो पास आ रही थी।
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
"अर्जुन," उसने कहा, "ये गार्ड अब हमारा गवाह है।"
मैंने गार्ड का हाथ पकड़ा और उसकी कमीज़ के बटन बंद किए, जैसे कोई अपने बड़े की कमीज़ ठीक करता है।
"चलिए," मैंने कहा। "आप आज रात यहाँ नहीं रुकेंगे।"
"कहाँ?"
"जहाँ आज रात कोई सवाल नहीं पूछता," मैंने कहा। "रुक्मा दीदी के ढाबे पर।"
और जब हम दीवार से हट रहे थे, मेरे हाथ में वो काग़ज़ था जिसे उस गार्ड ने अभी छेद में रखा था, और मेरे दिल में एक ही आवाज़ बज रही थी — कि पूरा टोल, पूरा नाका, पूरी चौकी, सब एक ही हाथ पर टिका था।
बस वो हाथ सामने खड़ा नहीं था। वो हाथ हर रात दस रुपये लेता था और सुबह चाय में इलायची डालकर उसका हिसाब बराबर कर देता था।
॥
धुंध इतनी मोटी थी कि टोल की लाल बत्ती पीछे छूटकर पीली पड़ गई थी। बूढ़े गार्ड की चप्पलें सड़क पर चर-चर कर रही थीं। उसकी सफ़ेद कमीज़ पर इतनी धूल जमी थी जैसे उसने कमीज़ नहीं, कोई पुरानी दीवार पहन रखी हो। कमर पर काली बेल्ट, बेल्ट में सीटी, और हाथ में वो लकड़ी की टॉर्च जिसकी रोशनी अब काँप रही थी।
नैना उसकी दूसरी तरफ़ चल रही थी। उसने कैमरा बंद कर दिया था। बत्ती बुझ गई थी, पर उसका हाथ अब भी कैमरे पर था, जैसे किसी का हाथ किसी के कंधे पर रहता है।
"बाबा," मैंने कहा, "आपको क्या लगता है, वो काग़ज़ किसके लिए थे?"
गार्ड ने कुछ कदम चलकर जवाब दिया। उसकी आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो डर में होती है। उसमें वो चीज़ थी जो बहुत साल तक चुप रहने के बाद बच जाती है।
"बेटा, मुझे नहीं पता," उसने कहा। "मैंने कभी खोलकर नहीं देखा। मैं तो ये भी नहीं जानता कि उसमें क्या लिखा होता था। मैं पढ़ना नहीं जानता।"
"आपने कभी किसी को पूछते देखा? जो उसे उठाता था?"
"एक बार देखा था।" उसने टॉर्च की रोशनी सड़क पर डाल दी। "तीन साल पहले। सुबह के चार बजे। मैंने दीवार के पास एक साया देखा, सफ़ेद कपड़े में। मैंने सीटी बजा दी।"
"फिर?"
"फिर वो रुक गया। मेरी तरफ़ देखा। और मुस्कुराया।" गार्ड ने साँस ली। "बेटा, मैंने उस दिन के बाद सीटी नहीं बजाई। मैं सिर्फ़ काग़ज़ रखता रहा और अपने दस रुपये लेता रहा।"
हम चुपचाप चलते रहे। दूर कहीं एक ट्रक का हॉर्न बजा और धुंध ने उसे भी निगल लिया।
तभी गार्ड रुका।
"एक बात है," उसने कहा। "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
मैं भी रुका।
"बनवारी जी मुझे पिछले हफ़्ते मिले थे। रात में। फाटक पर। वो ऐसे चल रहे थे जैसे किसी ने उनकी आवाज़ चुरा ली हो। उन्होंने मेरे हाथ में एक पैकेट रखा। जूट की रस्सी से बँधा भूरा पैकेट। बोले, इसे उसी सफ़ेद गाड़ी वाले को देना, जो हर महीने आता है।"
"और आपने दिया?"
"नहीं।" गार्ड ने टॉर्च नीचे कर दी। "वो आदमी उस हफ़्ते नहीं आया। और समझो, मैंने उस पैकेट को अपनी अलमारी में रख दिया, क्योंकि मुझे लगा पैसा होगा। फिर मैंने सोचा, अगर पैसा होगा तो कोई मुझे पूछेगा। कोई नहीं पूछा।"
"और अब?"
"अब वो पैकेट मेरे साथ है," उसने कहा, और अपनी कमीज़ के अंदर से एक चीज़ निकाली। "बनवारी जी ग़ायब हो गए। मुझे लगा, इसे किसी को देना चाहिए। पर किसे?"
उसने वो पैकेट मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
भूरा काग़ज़। जूट की रस्सी। रस्सी की गाँठ पर कोई मोहर नहीं, बस एक छोटा सा उँगली का निशान, जैसे किसी ने दबाकर बाँधा हो।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।
मैंने रस्सी खोली।
पैकेट के अंदर चार काग़ज़ थे और एक चाबी।
चारों काग़ज़ वो ही पुराने रंग के थे — पीले, मुड़े हुए, जिन पर सिर्फ़ तारीख़ें छपी थीं। तीन पर सत्ताईस लिखा था। चौथे पर सत्ताईस छपा था पर कोई ने उसे पेंसिल से काटकर अट्ठाईस कर दिया था। काटने वाला जल्दी में था।
"ये देखो," नैना ने कहा। उसने अपना छोटा गोल लेंस निकाला और चौथे काग़ज़ के कोने पर रख दिया। "यहाँ नीला गोल नहीं है। यहाँ उसका सिर्फ़ आधा हिस्सा है, जैसे मोहर आधी दबी हो और छूट गई हो।"
मैंने चाबी उठाई।
वो बहुत छोटी थी। पीतल की। मेरी छोटी उँगली के जोड़ से बड़ी नहीं। उसके सिरे पर कुछ खुरचा हुआ था — कोई अंक, पर घिस जाने से सिर्फ़ एक धुँधली लकीर बची थी। चाबी के दाँते इतने घिसे हुए थे जैसे कोई उसे सालों से रोज़ घुमाता हो।
नैना ने उसे मेरी हथेली से ले लिया और धुंध में उसकी तरफ़ देखा।
"ये किसी दरवाज़े की चाबी नहीं है, अर्जुन," उसने कहा। "दरवाज़े की चाबी लंबी होती है। ये छोटी है। ये किसी अलमारी की है। या किसी लॉकर की।"
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