A Dark Secret110 / 536

A Dark Secret – Chapter 110

6 min read November 6, 2026

चाचा ने कुछ नहीं कहा।

वो चला गया। गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ। इंजन स्टार्ट हुआ। गाड़ी गई।

गैराज फिर से चुप हो गया।

चाचा चारपाई पर बैठ गए। अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।

मैं उनके पास नहीं गया।

मैं कोने में गया, अपने घुटनों पर बैठा, और पापा का कैनवास थैला उठाया।

उसकी ज़िप खोली। अंदर एक-एक करके देखा — दो नंबर का पाना जिस पर तार लिपटा था, चार रिंचों का सेट जिसमें से एक गायब था, छोटा भारी हथौड़ा जिस पर जले निशान थे, पुरानी स्क्रू ड्राइवर जिसकी नोक घिसी थी, और पापा का खुद बनाया बेयरिंग पुलर जिस पर वही घिसाई थी जो पीतल के नटों पर थी।

मैंने काग़ज़ निकाले।

एक ज़िप में।

एक सील। धीरे से।

मैंने काग़ज़ों को एक-एक करके अंदर रखा — रवि की रसीद, मिल की पर्चियाँ, रसीद का फटा कोना, आधा मिटा नाम वाली पर्ची, "कल चाय ठंडी नहीं होगी" वाली पर्ची, बनवारी की कोठरी से निकले दो आधे जले पन्ने, और पीला लिफ़ाफ़ा जिसमें दूसरा पीतल नट और धमकी वाली पर्ची थी।

मैंने सब एक साथ रखा, औज़ारों के बीच, एक कोने में जहाँ पापा का पुराना तेल में डूबा रुमाल पहले से रखा था।

मैंने ऊपर से एक रिंच डाल दिया। फिर दूसरा।

अब वो बस औज़ारों का थैला था।

"अर्जुन।"

नैना दरवाज़े पर खड़ी थी।

"तिवारी गया?"

"गया।"

"तू ठीक है?"

मैं उठा। मेरी टाँगें भारी थीं, जैसे रात भर खड़ी रही हों।

"हाँ।"

"तू झूठ बोल रहा है।"

"हाँ।" मैंने कहा।

वो अंदर आई। उसने इधर-उधर देखा — गैराज, फिर चाचा, फिर मुझे।

"ये सब…" उसने धीरे से कहा। "ये सब देवा का काम है।"

मैंने सिर हिलाया।

"तिवारी उसका आदमी नहीं है," मैंने कहा। "पर वो उसकी जेब से चलता है। ये फर्क है। तिवारी अपने आप को ईमानदार समझता है, इसीलिए सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है।"

नैना ने चाचा की तरफ़ देखा।

"वो ठीक है?"

मैं चाचा के पास गया।

"चाचा।"

उन्होंने चेहरा नहीं उठाया।

"चाचा।"

"तेरे पापा ने मुझे कभी किसी चीज़ में नहीं फँसाया।" उन्होंने कहा। "कभी नहीं।"

"मुझे पता है।"

"और मैं —" उनकी आवाज़ टूटी। "मैं तेरे पापा के लिए कुछ भी करता था।"

मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।

"चाचा, तिवारी का रजिस्टर ले जाना —"

"वो रजिस्टर उसी का है, जो चाहे करे।" उन्होंने कहा। "पर वो जो काग़ज़ दिखा रहा था — वो शिकायत मेरी है ही नहीं। मैंने कोई शिकायत नहीं की।"

"मुझे पता है, चाचा।"

"तो —"

"तो," मैंने कहा, "किसी ने उसके नाम एक शिकायत लिखवा दी है। और उसे तिवारी तक पहुँचा दिया है। ये सिर्फ़ छापे के लिए नहीं था, चाचा। ये एक मैसेज था।"

चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।

"किसके लिए?"

"मेरे लिए।"

वो चुप रहे।

"चाचा," मैंने धीरे से कहा। "उस रात, तीन दिन पहले, जब मैं पहुँचा था — तुमने मुझे गैराज में क्यों बुलाया?"

उन्होंने हाथ गर्दन के पीछे ले जाने की कोशिश की, फिर रोक लिया।

"तू मेरा भतीजा है," उन्होंने कहा। "भतीजे को बुलाने के लिए वजह चाहिए?"

मैंने उनकी आँखों में देखा।

"नहीं चाहिए," मैंने कहा।

वो उठकर चलने लगे।

मैंने उन्हें रोका नहीं।

नैना दरवाज़े के पास खड़ी थी।

"अर्जुन," उसने धीरे से कहा। "तेरी घड़ी।"

मैंने देखा। पाँच मिनट आगे। आज — दस मिनट आगे।

"कल सुबह नौ बजे," उसने कहा। "काँच का दफ़्तर। कबीर की पर्ची।"

"हाँ।"

"तू वहाँ जाएगा?"

"जाऊँगा।"

"और अगर वहाँ भी तिवारी मिल गया?"

"तो मैं कहूँगा, साहब, आप हमारा पीछा क्यों कर रहे हैं? हम तो बस चाय पीने आए हैं।"

वो नहीं हँसी।

"अर्जुन," उसने कहा। "मेरे पास तेरह काग़ज़ हैं। और एक भी गवाह नहीं है।"

"मेरे पास अब एक और जुड़ गया," मैंने कहा। "और एक गवाह है।"

"कौन?"

"तिवारी।"

उसने पलक झपकी।

"वो गवाह नहीं है —"

"नहीं, वो नहीं," मैंने कहा। "पर आज उसने एक बात कही जो अब मेरे पास है। उसने कहा कि उसे मिली शिकायत में मोती, सत्ताईस और रात ग्यारह बजे लिखा है। उसे किसने बताया कि मोती पलटा? हादसे की रिपोर्ट में ये बात कहीं नहीं लिखी थी — मैंने पढ़ी है। और उसने ये बात बोल दी, अपनी मर्ज़ी से, अपने मुँह से।"

नैना ने चश्मा ऊपर धकेला।

"यानी शिकायत झूठी है," वो बोली। "क्योंकि असली शिकायत में ये तीन लफ़्ज़ नहीं हो सकते — मोती, सत्ताईस और ग्यारह। ये तीनों सिर्फ़ उन्हें पता हैं जो हादसे में शामिल थे।"

"ठीक।"

"पर ये हमें क्या देता है?"

"ये देता है," मैंने कहा, "कि तिवारी ने उस शिकायत को पढ़ा। और जिसने वो शिकायत लिखी, वो उन तीन बातों में शामिल था। तिवारी की जेब तक जो काग़ज़ पहुँचता है, वो किसी न किसी की उँगली से होकर पहुँचता है। और मुझे सिर्फ़ उस उँगली का नाम चाहिए।"

नैना ने कुछ सोचा।

"जुगनू?" उसने पूछा।

मेरी आँखें भरीं।

"जुगनू," मैंने कहा। "उसने सुबह कहा था, तिवारी की फाइल के नीचे एक पीला नोट दबा रहता है।"

"तो?"

"तो उस पीले नोट को देखना है," मैंने कहा। "चाहे किसी भी तरह से।"

चाचा गैराज के पिछले हिस्से से लौटे। उनके हाथ में एक गिलास था।

"पानी पी," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ बदली हुई थी, तेज़, बड़ी। जैसे अभी कुछ नहीं हुआ। जैसे पुलिस नहीं आई थी। जैसे उनकी आँखें अभी गीली नहीं थीं।

मैंने गिलास लिया।

"चाचा," मैंने कहा। "उस रात —"

"अर्जुन," उन्होंने कहा। "अभी रात के तीन बज रहे हैं। तू कुछ सो जा। सुबह सब ठीक लगेगा।"

"चाचा, कुछ भी ठीक नहीं होने वाला। सुबह सब और ख़राब होगा।"

वो मेरी तरफ़ देखते रहे।

"तेरे पापा से यही ज़िद मुझे अच्छी लगती थी," उन्होंने कहा। "और यही ज़िद उन्हें ले डूबी।"

वो अपनी चारपाई पर लेट गए और आँखें बंद कर लीं।

मैंने पानी पिया।

नैना के साथ गैराज के बाहर निकला।

"मैं जा रही हूँ," उसने कहा। "छह बजे आऊँगी। आठ बजे सात बेंच ठीक करने हैं। नौ बजे काँच का दफ़्तर।"

"तू सो जा," मैंने कहा।

"तू भी।"

"मैं —"

"अर्जुन," उसने कहा। "तू तीन दिन से सो नहीं रहा। जब तू थकेगा, तू सुनेगा नहीं। और मुझे तेरे कान ठीक चाहिए।"

मैं मुस्कुराया।

"ठीक है, मैडम।"

वो मुस्कुराई। मुझे लगा महीनों बाद किसी ने मेरे मुँह पर वाकई मुस्कुराहट देखी है।

वो अपनी गाड़ी तक गई और स्टार्ट की। इंजन एक बार हिचका। फिर चला।

मैं गैराज के अंदर लौटा।

चाचा करवट ले रहे थे। उनकी साँस भारी थी। हर बात पर एक छोटी कराहट, जैसे सपने में कोई उनसे पूछताछ कर रहा हो।

मैं गैराज के कोने में गया। वहाँ एक पुरानी चारपाई थी, खाली, जिस पर रज़ाई पड़ी थी।

मैं लेट गया।

पर आँख नहीं लगी।

मैं कुछ देर छत को देखता रहा। फिर उठा। फिर अपने थैले के पास गया। फिर ज़िप खोली। फिर वो सब निकाला जो मैंने रखा था — रसीदें, काग़ज़, कोना, पर्ची। एक-एक को अपने हाथ में लिया।

और फिर, उनके बीच से, कुछ और निकला।

मैंने उसे नहीं रखा था।

ये एक रसीद थी। पीली, पुरानी, कोने से मुड़ी — जैसे बाईस नंबर टोल की रसीदें होती थीं।

मैंने उसे पलटा।

ऊपर — एक तारीख़ नहीं थी। सिर्फ़ एक शब्द था।

सत्ताईस।

न महीना, न साल। सिर्फ़ सत्ताईस।

और नीचे, दाईं तरफ़, कोने में — एक फीका नीला गोल निशान। इतना फीका कि अगर आप रसीद को उँगली से न रगड़ें, तो वो नज़र ही न आए। मैंने रगड़ा। नीला और गहरा हुआ।

नीचे कुछ लिखा था — टाइप किया, छोटे अक्षरों में। मैंने आँखें सिकोड़कर पढ़ा।

"आगे मत बढ़ो।"

तीन शब्द।

बस तीन शब्द।

मेरा हाथ काँपा।

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