The Token System – Chapter 968
सीढ़ियाँ गीली थीं। पहली सीढ़ी पर पैर फिसला, दूसरी पर हाथ से दीवार पकड़ी। नीचे गई तो एक छोटी-सी कोठरी थी, जिसमें दीपक जल रहा था और सामने एक चटाई पर आदमी बैठा था।
वो मेरी तरफ़ पीठ किए बैठा था, पर जैसे ही मेरा पैर आख़िरी सीढ़ी पर पड़ा, उसने सिर घुमाया।
मेरे हाथ से टोकन नीचे गिर गया।
पापा थे। बीस साल की थकान चेहरे पर, आँखों में पानी, और हाथ में वो काग़ज़ जिसके लिए पूरा शहर खड़ा था।
"मैं जानता था," उन्होंने कहा, "तू आएगा।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया। कोई लाइन तैयार नहीं थी। मैंने बस टोकन उठाया और उनके सामने बैठ गया।
"तूने माँ को बताया नहीं," मैंने कहा।
"नहीं," उन्होंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि वो जानती है," पापा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरकाया। "वो बीस साल से जानती है। जिस दिन वो काग़ज़ उसके हाथ लगा, उसने उस पर अपना हस्ताक्षर कर दिया और मुझसे कहा — अब जो काग़ज़ पर लिखा है, वो तेरे बेटे के नाम होगा। तू बस इसे पहुँचा दे।"
मैंने काग़ज़ खोला। पीला, मोटा, मुड़ा हुआ। चार नाम थे — हरि सिंह, रामदीन मिस्त्री, सुखदेव माली और चौथा — कौशल्या। और आख़िरी लाइन में लिखा था — "मेरे बेटे को मत बताना।"
"ये किसने लिखा?"
"माँ ने," पापा ने कहा। "जिस दिन उसने हस्ताक्षर किए। उसने कहा — बीस साल में जो हुआ, उसका बोझ मेरे बेटे पर मत डालना। वो ख़ुद अपना हिसाब लिखेगा।"
मेरे हाथ काँप रहे थे।
"मैंने बीस साल कहाँ काटे," पापा ने धीरे से कहा, "ये मैं तुझे नहीं बताऊँगा। पर इतना जान ले — मैं लड़ा हूँ। भवानी की गोली कंधे में लगी। मौत के डर से नहीं, इस डर से भागा कि अगर मैं मर गया तो ये काग़ज़ किसी गलत हाथ में चला जाएगा।"
उन्होंने अपना कंधा दिखाया — कपड़े के नीचे पुराने ज़ख्म का उभार था।
"अब बताओ," पापा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, "क्या करना है?"
मैंने काग़ज़ लिया। फिर टोकन जेब से निकाला और उसके ऊपर रखा। टोकन धीरे-धीरे गरम होने लगा।
"पहले," मैंने कहा, "माँ को बताऊँगा।"
"हाँ," पापा ने कहा, और आँखों में पहली बार हल्की रोशनी आई।
मैं काग़ज़ लेकर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा, और उसी पल ऊपर से भवानी की आवाज़ गूँजी।
"किशन भाई," उसने कहा, "यह हिसाब तुमने बीस साल पहले शुरू किया था, अब मैं इसे ख़त्म करूँगा।"
और ऊपर से एक जलता हुआ मशाल नीचे गिरा।
मशाल चट्टान से टकराई और दो टुकड़ों में बँटकर फ़र्श पर लुढ़क गई। एक टुकड़ा दीपक के पास गिरा, तेल बहा और आग भड़क उठी।
पापा ने मेरा हाथ पकड़ा और दीवार की तरफ़ खींचा।
"कोने में," उन्होंने कहा। "जल्दी।"
हम दोनों दीवार के साथ दबकर खड़े हो गए। ऊपर से भवानी के जूतों की आवाज़ आ रही थी, धातु की जाली पर भारी कदम।
"किशन भाई," भवानी ने ऊपर से कहा, "बीस साल पहले तुमने मेरे सामने काग़ज़ रखा था और कहा था — ले लो, सब तुम्हारा। मैंने तब मना किया था। अब तुम्हें भी मना करना होगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर नहीं था, थकान थी — बीस साल की।
"सुन," पापा ने धीरे से कहा, "एक बात कभी मत मानना कि भवानी बेवकूफ़ है। वो सामने से नहीं मारता। वो तेरे हाथ से काग़ज़ छीनवाता है।"
"कैसे?"
"जबसे तू यहाँ आया, तू सोच रहा है कि बीस मिनट से राजेंद्र ऊपर क्यों है।"
मेरा पेट गिर गया।
मैंने जेब से मोबाइल निकाला। सिग्नल नहीं था। बावड़ी के नीचे।
"राजेंद्र से मिलने गया था?" मैंने पूछा।
"नहीं," पापा ने कहा। "पर भवानी जानता है कि राजेंद्र ऊपर है। इसलिए उसने मशाल गिराई — राजेंद्र को नीचे बुलाने के लिए। और जब राजेंद्र नीचे आएगा, तो जाली पर उसके आदमी खड़े हो जाएँगे।"
ऊपर जाली की आवाज़ आई। भारी धातु का खिंचना।
"मन्नू!" राजेंद्र की आवाज़। "नीचे सब ठीक है?"
पापा ने मेरा हाथ कसा।
"जवाब दे," उन्होंने कहा। "पर ऐसे जवाब दे जैसे मैं यहाँ नहीं हूँ।"
मैंने गला साफ़ किया।
"ठीक हूँ!" मैंने ऊपर चिल्लाया। "दीपक गिर गया, कुछ नहीं हुआ। तुम वहीं रहो।"
एक पल की चुप्पी।
"तेरी आवाज़ अजीब है," राजेंद्र ने कहा।
"क्योंकि धुआँ है," मैंने कहा। "बाहर से पानी का बर्तन लेकर आओ।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और हल्का सिर हिलाया — मतलब सही सोचा।
भवानी ने ऊपर से फिर बात की।
"किशन भाई, तुम्हारा बेटा समझदार है। तुम उससे कह दो कि काग़ज़ नीचे रख आए और ऊपर आ जाए। मैं दोनों को नहीं मारूँगा। काग़ज़ देखना है बस।"
पापा हँसे। ऐसी हँसी जो ज़ख्म से निकलती है।
"भवानी," पापा ने ऊपर की तरफ़ आवाज़ दी, "बीस साल में एक बात सीखी — जो आदमी काग़ज़ देखने को कहे, वो उसे देखकर सब कुछ मिटा देता है। मैंने तेरा नाम देखा था, उसी दिन से तू मेरे पीछे है।"
ऊपर चुप्पी छा गई। फिर भवानी की आवाज़ आई, और इस बार हँसी में कुछ ठंडा था।
"तो काग़ज़ में मेरा नाम है," भवानी ने कहा। "बीस साल मैं सिर्फ़ अंदाज़ा लगाता रहा। आज तुमने पक्का कर दिया।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे का रंग उड़ गया था।
"मैंने गलती की," उन्होंने फुसफुसाया। "कभी दुश्मन को मत बताना कि उसका नाम तेरे हाथ में है।"
"अब क्या?"
पापा ने दीवार पर टिककर सोचा। फिर उन्होंने मेरे हाथ से टोकन लिया और उसे दीपक की लौ के पास ले गए। टोकन का रंग बदलने लगा।
"ये टोकन कहाँ से आया?" उन्होंने पूछा।
"सक्सेना मैडम ने दिया। लोहे की तिजोरी खोलने के लिए।"
पापा ने टोकन को करीब देखा।
"ये सिर्फ़ तिजोरी का नहीं है," उन्होंने कहा। "यही है जो माँ ने बनवाया था। बीस साल पहले। तीन टोकन बने थे — एक माँ ने रखा, एक सक्सेना को दिया, और एक…" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "एक उस आदमी को दिया जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा था।"
"कौन?"
"हरि सिंह। मुनीम।"
मैं सीढ़ी से टकराया। मुनीम — वही जो हवेली आया था, जिसने काग़ज़ लिखे थे, जिसे मैंने सबके सामने पकड़ा था।
"तो मुनीम झूठ बोल रहा था?"
"नहीं," पापा ने कहा। "मुनीम ने जो कहा, वो सच था। उसने मुझे बाप मानकर काग़ज़ लिखे, मेरा कर्ज़ चुकाने के लिए। पर उसने ये नहीं बताया कि तीसरा टोकन उसके पास है। और तीसरे टोकन से ये बावड़ी का दूसरा रास्ता खुलता है।"
"दूसरा रास्ता?"
"हाँ। भवानी यही सोचकर ऊपर खड़ा है कि मैं यहीं फँसा हूँ। उसको पता नहीं कि मुनीम ने मुझे बचाने के लिए वो टोकन छुपा रखा है।"
ऊपर जाली पर फिर भारी कदम पड़े। दो आदमी। तीन।
राजेंद्र की आवाज़ आई, कुछ दूर से।
"मन्नू, पानी लेकर आ रहा हूँ। जाली खुली है, कोई भीतर आ सकता है। संभलकर।"
मतलब — राजेंद्र ने देख लिया था कि भवानी के आदमी आ गए हैं, और वो मुझे चेतावनी दे रहा था।
पापा ने मेरा कंधा पकड़ा और दीवार के उस कोने की तरफ़ घुमाया जहाँ अंधेरा सबसे गहरा था।
"देख," उन्होंने कहा। "ईंटों में एक निशान है। तीन टोकन के तीन निशान। अगर तेरे पास एक है, तो बाकी दो कहीं आसपास ही हैं।"
मैंने दीवार पर हाथ फेरा। ईंटें ठंडी थीं। फिर उँगली एक गड्ढे पर रुकी। एक छोटा-सा गोल निशान।
"टोकन से मिलता है," मैंने कहा।
"तभी तो मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था," पापा ने कहा। "मेरे पास काग़ज़ था, पर टोकन नहीं। बीस साल से रास्ता बंद था।"
ऊपर से आवाज़ आई। भवानी का आदमी नीचे उतर रहा था। सीढ़ी पर पैर की आवाज़, धीरे-धीरे।
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