The Token System – Chapter 897
राजेंद्र चुप हुआ।
"क्योंकि आपको लगता है कि टोकन मिल जाने पर हम हवेली पर हक़ जता देंगे," बंसी ने कहा। "और आपने बीस साल इसी दिन के लिए नहीं काम किया कि कोई और हवेली ले जाए।"
राजेंद्र का चेहरा बदला। उसने चश्मा उतारा, पोंछा, फिर से पहना।
"तुम हिसाब नहीं जानते," उसने कहा।
"हम हिसाब नहीं जानते," मैंने कहा, "पर हमें पता है कि किसी की चीज़ जबरदस्ती लेना क्या होता है। राजेंद्र जी, आपने ये नहीं सोचा कि टोकन देने के बाद भी मैं वो कर सकता हूँ जो मुझे सही लगता है।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — ग़ुस्सा नहीं, थकान।
"तो क्या चाहते हो तुम?"
"सुमन को पहले जाने दो," मैंने कहा। "फिर बात करते हैं।"
राजेंद्र ने सुमन की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया, जैसे किसी सोच में हो। सुमन उठी और मेरे पास आई। उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था।
"ये सब ले लिया," उसने धीरे से कहा। "पेटी से। पूरा हिसाब। पर एक पन्ना उसने निकाल लिया — मेरे हाथ से। वही जो राजेंद्र के पिता का था।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।
"वो पन्ना मेरा है," राजेंद्र ने कहा। "मेरे पिता का था, ये तुम्हारे दादा का है — बीस साल से यही सवाल है। अदालत कल जवाब देगी।"
"अच्छा," मैंने कहा। "तो कल तक टोकन नहीं लौटाऊँगा।"
राजेंद्र का चेहरा कठोर हुआ।
"तो फिर उस संदेश का जवाब भी नहीं मिलेगा जो रात को तुम्हारे फ़ोन पर आया था," उसने कहा।
मैं ठिठक गया।
"वो संदेश तुमने भेजा था?"
राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा। उसने बस सुमन के हाथ से एक पन्ना लिया, मेज़ पर रखा, और कुर्सी से उठकर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"तुम जानते हो," उसने दरवाज़े पर रुककर कहा, "जो संदेश आया उसमें 'असली कॉपी' लिखा था। पर मैंने तुम्हें कोई संदेश नहीं भेजा। मैं पिछले तीन घंटे से इसी कमरे में हूँ।"
और वो चला गया।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी का चेहरा पहली बार सफ़ेद पड़ा।
"मतलब," बंसी ने धीरे से कहा, "जो संदेश आया, वो किसी और का है।"
हम तीनों चुप खड़े रहे। रात की हवा खिड़की से आ रही थी। दूर कहीं कुत्ता भौंका।
हम नीचे उतरे। चौकीदार अब अपनी जगह पर था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। सुमन ने काग़ज़ों का बंडल अपनी बैग में रखा।
"अब क्या?" सुमन ने पूछा।
"घर चलो," बंसी ने कहा। "पर वो जो संदेश है — उसका जवाब देना है।"
"क्या लिखें?"
"लिख — टोकन चाहिए तो आओ, ले जाओ। पर एक शर्त है। आमने-सामने।"
मैंने वो संदेश टाइप किया। भेजा।
जवाब आया — एक लाइन में।
"कल सुबह पाँच बजे। हवेली के कुएँ पर। अकेले आना। अगर कोई और आया, तो काग़ज़ अदालत में।"
हम घर लौटे। माँ और रीना सो रही थीं। बंसी दुकान चला गया ये कहकर कि कुछ काग़ज़ देखने हैं।
मैं अपने कमरे में गया। दीवार पर घड़ी टिक-टिक कर रही थी। मैंने जेब से टोकन निकाला। ठंडा नहीं था। गरम था। बहुत गरम।
मैंने उसे मेज़ पर रख दिया।
तभी मेरा मोबाइल फिर बजा।
वही अनजान नंबर।
संदेश आया — "एक बात और। जो काग़ज़ तुमने अदालत में दिए हैं, वो असली नहीं हैं। असली वाले मेरे पास हैं। और कल सुबह तक अगर हवेली के कुएँ वाला आधा टोकन मेरे हवाले नहीं हुआ, तो मैं वो असली काग़ज़ अदालत में पेश कर दूँगा — और तुम्हारे दादा चोर साबित होंगे।"
॥
मैंने वो संदेश पढ़ा और मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। पास में बैठे बंसी को फ़ोन दिखाया। बंसी ने पढ़ा, फिर फ़ोन मेज़ पर रख दिया।
"ये श्यामलाल का काम है," बंसी ने कहा। "सिर्फ़ वही जानता है कि कुएँ में क्या मिला था। उसके आदमी वहाँ मौजूद थे।"
"तो क्या करें? आधा टोकन दे दें?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैंने कोई बेतुकी बात कह दी हो।
"तू पागल है? वो टोकन तेरे दादा का है। जिस दिन वो निकला था, उस दिन से ये सब शुरू हुआ। अब जाकर किसी को दे दें?"
"तो सुबह पाँच बजे कौन जाएगा?"
"तू जाएगा," बंसी ने कहा। "पर अकेला नहीं। मैं पीछे रहूँगा। दूर से। और काग़ज़ देखने के बाद ही कोई फ़ैसला।"
मैंने सिर हिलाया। पर नींद नहीं आई। चारपाई पर करवटें बदलता रहा। घड़ी की टिक-टिक कमरे में गूँज रही थी। टोकन मेज़ पर पड़ा था, ठंडा। एक बार भी गरम नहीं हुआ।
चार बजे मैं उठ गया। मुँह धोया, शर्ट पहनी, जेबें टटोलीं — दो पीतल के टुकड़े एक जेब में, दो दूसरी में। टोकन अलग जेब में। घर से निकला तो माँ जाग रही थीं, चूल्हे पर चाय रख रही थीं।
"इतनी सुबह?" उन्होंने पूछा।
"अदालत की तैयारी है," मैंने कहा। वो कुछ नहीं बोलीं, पर उनकी आँखों में सवाल था।
हवेली पहुँचा तो आसमान में हल्की लाली थी। गली सूनी थी। कुएँ की तरफ़ बढ़ा। ईंटों की जगह अब खुली थी — कल के खुदाई के निशान अभी मिट्टी में ताज़े थे।
कुएँ के पास कोई नहीं था। मैं रुका। चारों तरफ़ देखा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"तू वक़्त से पहले आ गया।"
श्यामलाल कुएँ की दूसरी तरफ़ से निकला। हाथ में पीला लिफ़ाफ़ा था। सफ़ेद कुर्ता, पर आज कोई चश्मा नहीं। आँखें लाल थीं, जैसे रात भर सोया न हो।
"तूने हमें बुलाया," मैंने कहा। "तो अब बात कर।"
"पहले टोकन दिखा।"
"पहले लिफ़ाफ़ा।"
श्यामलाल हँसा। वो हँसी ठंडी थी।
"तू समझता है ये कोई सौदा है? ये तेरे दादा का काग़ज़ है। उनकी लिखाई। उनका अँगूठा। बीस साल पहले उन्होंने ख़ुद लिखा था — कि उन्होंने एक बार टोकन अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया था। जिस रात हवेली का हिसाब बिगड़ा, उस रात उनके हाथ भी गंदे थे।"
"दिखा," मैंने कहा।
श्यामलाल ने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर से एक मुड़ा हुआ पीला काग़ज़ निकाला। मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने लिया। काग़ज़ पुराना था, किनारे से फटा हुआ। लिखाई दादा की थी — वो मोटी, टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई जो मैंने कुएँ से निकले काग़ज़ों में देखी थी।
पढ़ा — "मैं सुखदेव, ये लिखकर छोड़ता हूँ कि एक बार मैंने टोकन से वो किया जो नहीं करना चाहिए था। मेरे हाथ से एक काम का हिस्सा किसी और के हिस्से में डाल दिया गया। उसका नुक़सान किसी मासूम ने उठाया। मैंने उस दिन के बाद टोकन छुआ नहीं, पर हिसाब बाकी रहा। जो इसे पढ़े, वो मेरी ग़लती सुधारे।"
मेरे हाथ काँपने लगे। नीचे दादा का अँगूठा था। और तारीख़ — वही साल, वही महीना जब पापा गायब हुए थे।
"देखा?" श्यामलाल ने कहा। "तेरा दादा भी उसी हिसाब का हिस्सा था। सिर्फ़ भवानी ही गंदा नहीं था। तेरे दादा ने टोकन अपने फ़ायदे के लिए चलाया। और उसका नुक़सान किसी और ने उठाया।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा। जेब में रखा।
"अब चुन," श्यामलाल ने कहा। "आधा टोकन दे — या ये काग़ज़ अदालत में जाएगा। कल तेरे दादा का नाम हर अख़बार में होगा — चोर, बेईमान। तेरी माँ का सामने झुकना मुश्किल हो जाएगा।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। कुएँ की मिट्टी में पैरों के निशान थे। श्यामलाल मेरे चेहरे को पढ़ रहा था।
"मैं ये काग़ज़ अदालत में ख़ुद पेश करूँगा," मैंने कहा।
श्यामलाल का चेहरा बदला।
"क्या?"
"तूने सुना नहीं? मैं ख़ुद पेश करूँगा। दादा ने जो किया, वो छिपाना नहीं है। अगर उन्होंने ग़लती की, तो हिसाब बराबर होगा। पर तेरे हाथ से नहीं — मेरे हाथ से।"
श्यामलाल मेरी तरफ़ झपटा। उसका हाथ मेरे कॉलर तक पहुँचा, पर तभी पीछे से आवाज़ आई।
"छोड़ उसे।"
श्यामलाल रुक गया। उसने पीछे देखा।
भवानी खड़ा था। दो आदमी साथ। हाथ में कोई काग़ज़ नहीं, बस खड़ा था।
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