The Token System – Chapter 883
"श्यामलाल," मैंने कहा।
"हाँ," बूढ़े ने कहा। "पर सिर्फ़ श्यामलाल नहीं। उस रात दो आदमी थे कुएँ के पास। श्यामलाल, और उसका एक साथी। उस साथी का नाम मुझे नहीं पता। पर उसकी कलाई पर एक जला हुआ निशान था — पीतल के सिक्के जैसा।"
मेरे हाथ में चाय का कप रुक गया। मैंने बूढ़े की आँखों के नीचे का जला निशान देखा — वोही।
"आपके चेहरे पर भी…" रीना ने कहा।
"हाँ," बूढ़े ने कहा। "मेरे भाई ने भी ये निशान देखा था और मुझे बताया था। और उस रात के बाद वो साथी कभी नहीं दिखा। मुझे लगता है वो कुएँ में ही है।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"ठहरो," माँ ने कहा। "अभी कुछ मत करो। अंधेरे में कुआँ नहीं खोदते।"
"माँ, अगर वहाँ कोई है—"
"अगर वहाँ कोई है," माँ ने कहा, "तो वो बीस साल से वहाँ है। एक और रात रुक जाएगा।"
बूढ़े ने धीरे से कहा, "वो रुक जाएगा, पर तेरे पास वक़्त नहीं है। उस सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा था न — तुझे उस जगह ले चलूँगा जहाँ असली कन्हैया की हड्डियाँ आज तक दबी पड़ी हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"वो कहाँ है?" मैंने कहा।
बूढ़े ने चाय का कप मेज़ पर रखा। उसकी आवाज़ अब साफ़ थी — वो काँप नहीं रही थी।
"मैं अदालत में गवाही दूँगा," उसने कहा, "पर पहले तुम्हें उस जगह ले चलूँगा जहाँ असली कन्हैया की हड्डियाँ आज तक दबी पड़ी हैं। और वो जगह तुम्हारी हवेली के कुएँ के अंदर है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। बंसी ने भी।
मैंने बूढ़े की आँखों में देखा — उनमें डर नहीं था। थकान थी। और उस थकान के पीछे एक चीज़ और थी — किसी पुराने हिसाब का बोझ, जो अब उतर रहा था।
"कुएँ के अंदर," मैंने दोहराया।
"हाँ," बूढ़े ने कहा। "पर सुबह। अंधेरे में नहीं।"
"क्यों?" बंसी ने कहा।
"क्योंकि," बूढ़े ने कहा, "उस कुएँ में जो है, वो सिर्फ़ हड्डियाँ नहीं है।"
रीना ने चाय के कप उठाए और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी। फिर रुकी और पलटी।
"एक बात पूछूँ?" उसने कहा।
"पूछ," बूढ़े ने कहा।
"उस रात," रीना ने कहा, "जब आपको हवेली में बंद किया गया था — आपने सब देखा था। सुना था। फिर भी आपने कुछ नहीं किया।"
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने एक बार कुछ किया था, बेटी," उसने कहा। "मैंने अपने भाई की लाश को हवेली के ऊपर वाले कमरे में ले जाने से पहले देखा था। मैंने उसकी आँखें बंद करने की कोशिश की थी। फिर श्यामलाल ने मुझे पीछे खींच लिया।"
रीना कुछ नहीं बोली। सीढ़ियाँ चढ़ गई।
मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा।
"आपने कहा था," मैंने कहा, "कि असली कन्हैया ज़िंदा है। आज सुबह अदालत की खिड़की में बैठा था।"
बूढ़ा चुप हो गया।
"क्या आपने झूठ कहा था?" मैंने कहा।
"नहीं," बूढ़े ने धीरे से कहा। "पर वो ज़िंदा नहीं है।"
"तो फिर?"
"मैंने," बूढ़े ने कहा, "आज सुबह उस खिड़की में अपने भाई को देखा था। मरे हुए भाई को। मुझे लगता है कि ये मेरी आँखों का वहम था।"
"या फिर," माँ ने कहा, "तुम्हारा भाई ज़िंदा है और तुम्हें दिखाना चाहता था।"
बूढ़े ने माँ की तरफ़ देखा। उसकी आँखें फिर भर आईं।
"अगर वो ज़िंदा है," उसने कहा, "तो उसने मुझसे बीस साल बात क्यों नहीं की?"
"क्योंकि," माँ ने कहा, "वो तुम्हारे चेहरे से डरता होगा।"
कमरा फिर चुप हो गया।
तभी मेरे हाथ में टोकन गरम हुआ। मैंने उसे जेब से निकाला। उस पर एक नया शब्द उभर रहा था — धीरे-धीरे, जैसे कोई दूर से लिख रहा हो।
'सुबह'
मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा।
"कुआँ," मैंने कहा। "सुबह।"
बूढ़े ने सिर हिलाया।
"पर एक बात," उसने कहा। "श्यामलाल को पता चल जाएगा। वो अदालत में मेरी गवाही से पहले हमें रोकेगा।"
"तो हम उससे पहले निकलेंगे," बंसी ने कहा।
"कैसे?" माँ ने कहा। "हवेली में उसके आदमी हैं।"
"होंगे," मैंने कहा। "पर कुएँ तक उसके आदमी नहीं जानते।"
"तू जानता है?" बूढ़े ने कहा।
"अब जानता हूँ," मैंने कहा।
मैंने टोकन जेब में रखा और खिड़की की तरफ़ बढ़ा। बाहर अंधेरा था। कहीं दूर कुत्ते भौंक रहे थे।
"रीना," मैंने कहा। "तू घर जा। माँ के साथ रह।"
"नहीं," रीना ने कहा। "मैं चलूँगी।"
"रीना—"
"मन्नू," रीना ने कहा, "अगर तू सुबह हवेली के कुएँ में जाएगा, तो मैं वहाँ रहूँगी। और मैं तुझे अकेले नहीं जाने दूँगी।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने सिर हिलाया — हाँ में।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर सुबह तक सब यहीं रहेंगे। कोई बाहर नहीं जाएगा।"
बूढ़ा उठा। उसने अपनी कॉपी उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये अपने पास रख," उसने कहा। "अगर मुझे कुछ हो जाए, तो ये तेरे काम आएगी।"
मैंने कॉपी ली। उसका वज़न भारी था — बीस साल का हिसाब था उसमें।
"एक आख़िरी बात," बूढ़े ने दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए कहा। "श्यामलाल के पास चाबियाँ हैं। दो। संदूक की। अगर वो संदूक खोल लेगा, तो जो अंदर है वो हमारे हाथ कभी नहीं आएगा।"
"संदूक में क्या है?" मैंने कहा।
बूढ़ा दरवाज़े पर रुका। उसने पलटकर देखा।
"तेरे पापा की लिखाई," उसने कहा। "और एक नाम।"
"किसका नाम?"
"उस आदमी का," बूढ़े ने कहा, "जिसने मेरे भाई को मारा था। और वो नाम श्यामलाल का नहीं है।"
दरवाज़ा खुला और बूढ़ा बाहर निकल गया। सीढ़ियों पर उसके कदमों की आवाज़ आई, फिर दरवाज़े की कुंडी की आवाज़, फिर सन्नाटा।
मैं कमरे के बीच में खड़ा रहा, हाथ में कॉपी लिए।
"मन्नू," माँ ने कहा। "वो नाम क्या हो सकता है?"
मैंने कॉपी खोली। पन्ने पलटे। आख़िरी पन्ने पर एक लाइन थी, फीकी स्याही में।
"ये नाम," मैंने पढ़ा, "मेरे भाई को मारने वाले का नहीं है। ये उस आदमी का है जिसने उसे मरवाया। और वो आदमी आज भी ज़िंदा है।"
उसके नीचे एक नाम लिखा था, मगर वो किसी ने मिटा दिया था। सिर्फ़ एक अक्षर बचा था — 'श'।
मैंने कॉपी बंद की।
"श," माँ ने धीरे से कहा।
"श्यामलाल नहीं," मैंने कहा। "वो तो मारने वाला है। ये मरवाने वाला है।"
बंसी ने खिड़की से बाहर देखा।
"तो फिर वो कौन है," उसने कहा, "जिसका नाम 'श' से शुरू होता है और जो आज भी ज़िंदा है?"
जवाब किसी के पास नहीं था।
मैंने टोकन फिर जेब से निकाला। उस पर अब 'सुबह' के नीचे एक और शब्द उभर रहा था।
'कुआँ'
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"सुबह," मैंने कहा। "कुआँ।"
"और अगर वहाँ कुछ और निकला?" बंसी ने कहा।
मैंने कॉपी अपनी बगल में दबाई।
"तो जो निकलेगा," मैंने कहा, "वो बीस साल का हिसाब होगा।"
रात बाकी थी। रीना ने खटिया बिछाई और माँ उस पर बैठ गई। बंसी दरवाज़े के पास कुर्सी डालकर बैठा और चाकू अब भी जेब में रखा था।
मैं खिड़की के पास बैठा रहा, कॉपी गोद में। बाहर आकाश साफ़ था। सुबह होने में अभी वक़्त था।
तभी दरवाज़े पर फिर खटखटाहट हुई।
बंसी उठा, चाकू निकाला।
"कौन?" मैंने कहा।
"मैं," आवाज़ आई। "राजेंद्र।"
मैंने दरवाज़ा खोला। राजेंद्र बाहर खड़ा था, हाथ में लालटेन। उसके पीछे एक सिपाही था।
"भवानी का आदमी," राजेंद्र ने कहा, "हवेली के कुएँ के पास देखा गया है। दो आदमी हैं। और उनके हाथ में फावड़े हैं।"
मैंने कॉपी कसकर पकड़ी।
"तो वो हमसे पहले पहुँच रहे हैं," मैंने कहा।
"हाँ," राजेंद्र ने कहा। "और एक बात — उनके साथ श्यामलाल खुद है।"
॥
राजेंद्र की लालटेन की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी और उसके पीछे खड़ा सिपाही हथियार पर हाथ रखे मुझे देख रहा था।
"श्यामलाल खुद है," मैंने दोहराया। "तो फिर देर किस बात की।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno