The Token System – Chapter 879
वो चला गया। गोविंद भी निकल गया, पर उसने जाते-जाते मेरी जेब की तरफ़ देखा, जहाँ टोकन रखे थे, और फिर जल्दी से नज़र हटा ली।
दरवाज़ा बंद होने के बाद रीना ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू सोएगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं इस संदूक के सामने बैठूँगा।"
"तो मैं भी बैठूँगी।"
माँ ने हम दोनों की तरफ़ देखा, कुछ नहीं कहा, और अंदर चली गईं। मैंने उन्हें रसोई से एक चादर उठाकर लाते देखा। रीना ने मेज़ के पास चटाई बिछाई।
मैं संदूक के सामने बैठ गया। रीना चटाई पर बैठी और दीवार से पीठ टिका दी। माँ हमारे बीच में बैठ गईं — उन्होंने संदूक की तरफ़ पीठ की, हमारी तरफ़ मुँह।
रात धीरे-धीरे बीतने लगी। मैंने कई बार जेब में टोकन को उँगलियों से छुआ। वो ठंडा था। पर एक बार, रात के किसी पहर में, जब मुझे हल्की झपकी आई थी और रीना की साँसें धीमी हो रही थीं, मुझे लगा कि संदूक के अंदर कुछ हिला — जैसे कोई काग़ज़ अपने आप पलट गया हो।
मैंने आँख खोली। रीना सो रही थी। माँ जाग रही थीं, दीवार की तरफ़ देख रही थीं।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "तुमने कहा था कि इस संदूक के नीचे वाला काग़ज़ बताएगा कि पापा आज तक ज़िंदा क्यों दिखते रहे। उसमें लिखा है — उन्होंने अपना नाम किसी और को दिया। पर किसे?"
माँ ने अपनी चादर कसकर लपेटी। "उसे जो उस रात जला था। अपने दोस्त को।"
"और वो दोस्त कौन था, माँ?"
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने आँख बंद कर लीं। मैंने उन्हें सोने दिया।
पर मैं सोया नहीं। मैं बैठा रहा और संदूक की उस तीसरी पट्टी की तरफ़ देखता रहा, जो मैंने उखाड़ी थी — अब वो खुली थी, और अंदर अंधेरा था।
रात के किसी पहर में एक बार फिर टोकन गरम हुआ। मैंने जेब में उँगली डालकर देखा — भवानी वाला टोकन था, और उस पर एक बार फिर से 'शेष' के नीचे पतली लकीर थी, पर अब उस लकीर के नीचे एक और निशान आ गया था — जैसे किसी ने दूर से अपनी उँगली उस पर रख दी हो।
मैंने टोकन जेब में वापस रखा।
और तब मुझे पीछे, संदूक के उस पीले काग़ज़ की तरफ़ देखने का मन हुआ — जो माँ ने अपने पल्लू में बाँध रखा था। वो उनके पास था। मैंने हाथ बढ़ाया और पल्लू के उस बंधन को धीरे से छुआ।
काग़ज़ की महक आई — पुरानी स्याही की, हल्की-सी भीगी मिट्टी की।
तभी टोकन फिर गरम हुआ, और इस बार गरमी के साथ एक हल्की धुन भी आई — जैसे कोई दूर किसी कोठरी में रखा रेडियो बज रहा हो और गली की हवा उसकी आवाज़ उठा लाई हो।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
सुबह तक मैं जागता रहा।
सुबह पाँच बजे माँ उठीं। उन्होंने चूल्हा जलाया, चाय बनाई, और उस चाय को उन्होंने ख़ुद पिया — पहली बार मैंने देखा कि माँ ख़ुद चाय पीती हैं; आम दिनों में वो हमें पिलाती थीं और ख़ुद नहीं पीती थीं।
छह बजे रीना उठी। उसने कपड़े बदले, बालों में कंघी की और मेरी तरफ़ देखा।
"संदूक?"
"तैयार है," मैंने कहा।
"लिफ़ाफ़ा?"
"दराज़ में है।"
सात बजे बंसी आ गया। उसके साथ उसका भतीजा था और उसके हाथ में डंडा। मोहन लाल भी आए — काले बैग के साथ।
आठ बजे मैंने संदूक उठाया — बंसी ने एक सिरा पकड़ा — और हमने उसे गाड़ी में रखा।
आठ बजकर दस मिनट पर मैंने दराज़ खोला और लिफ़ाफ़ा निकाला। सीलबंद था, मोहर सही-सलामत। ऊपर उलटा कोना-चिह्न और तीन लकीरें।
मैंने उसे जेब में रखा।
माँ ने दरवाज़ा बंद किया, चिटकनी लगाई, और सीढ़ियों से नीचे उतर आईं।
"चलो," उन्होंने कहा। "हिसाब लंबा है। देर न करो।"
गाड़ी के दरवाज़े पर मैंने टोकन जेब से निकाला। 'शेष' था। पर अब उसके नीचे वो पतली लकीर गहरी थी, और उस लकीर के नीचे वो दूसरा निशान भी।
मैंने टोकन वापस रखा और गाड़ी में बैठ गया।
गाड़ी अदालत की तरफ़ चली और पीछे मोहल्ले की गलियाँ सिकुड़ती चली गईं। सड़क पर धूल बहुत थी, जिससे सामने रास्ता दिख नहीं रहा था, पर बंसी को रास्ता पता था।
अदालत के गेट पर जब हम पहुँचे तो सड़क के किनारे एक पुरानी सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, और उसका बोनट खुला था। मैंने देखा — उस पर कोई नहीं था, पर हवा में काग़ज़ का एक टुकड़ा उड़ रहा था, जो गाड़ी के बोनट से आगे नहीं जा रहा था, जैसे किसी ने उसे वहीं चिपका दिया हो।
गाड़ी पास जाकर रुकी। बंसी ने काग़ज़ उठाया।
पीली पर्ची थी। ऊपर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे — "अंदर। अकेले।"
मैंने पर्ची बंसी के हाथ से ली और फाड़कर जेब में डाल दी।
"अकेले जाने की बात सोचना भी मत," माँ ने कहा।
"माँ," मैंने कहा, "अंदर अकेले कोई नहीं जा रहा। सब साथ चलेंगे — पहले संदूक, फिर गवाही।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। सीढ़ी के ऊपर उस पत्थर पर मेरा पैर फिर ठोका — वही पत्थर, जिसे मोहन लाल ने कल कहा था कि किसी ने बाद में जोड़ा है। इस बार मैंने पत्थर पर नज़र डाली — उस पर एक ऊँगली जितना खुरचा निशान था, ताज़ा, जैसे किसी ने कल रात इसे उठाने की कोशिश की हो।
अंदर गए। अदालत का कमरा भरा हुआ था — सिर्फ़ गवाह नहीं, बाहर के लोग भी, अख़बार वाले भी। बोर्ड पर वही लिखा था — 'आज का केस: हवेली हिसाब।'
हमने संदूक सामने की मेज़ के पास रखा। जज की कुर्सी ख़ाली थी।
पीछे की बेंच पर बैठे लोग धीरे-धीरे बातें कर रहे थे। किसी ने मेरी तरफ़ देखा, किसी ने संदूक की तरफ़।
तभी मेरी जेब में टोकन हिला — एक बार, दो बार। मैंने निकाला। 'शेष' के नीचे वाली लकीर अब पूरी तरह से एक अक्षर जैसी दिख रही थी। मैंने उसे ध्यान से देखा — वो 'ह' जैसा था।
रीना ने मेरी तरफ़ झाँका।
"क्या है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा और टोकन जेब में रख दिया।
पीछे सीढ़ियों से भवानी आया — अकेला, हाथ में कोई काग़ज़ नहीं, चेहरे पर वही ख़ालीपन जो कल रात गाड़ी के पास था। उसने संदूक देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा, और बिना कुछ बोले पीछे की बेंच पर बैठ गया।
उसके थोड़ी देर बाद श्यामलाल आया — सफ़ेद कुर्ता, काला चश्मा, हाथ में लाठी। उसके पीछे दो आदमी थे, जिनके हाथ में मोटी फ़ाइलें थीं।
और सबसे आख़िर में वो आया — सफ़ेद कुर्ता, लंबा, चेहरे पर वही पुरानी झुर्रियाँ जो अदालत में मेरे पापा की कुर्सी पर बैठी थीं। वो आते ही एक पल के लिए मेरी तरफ़ देखकर रुका, और फिर अपनी जगह बैठ गया।
माँ ने उसे देखा। मैंने माँ का हाथ पकड़ लिया। उनके हाथ में हल्की-सी कँपकँपी थी, पर चेहरा पत्थर जैसा।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "ये वही आदमी है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "हाँ," उन्होंने कहा। "पर इसके चेहरे पर जो झुर्रियाँ हैं, वो मेरे भाई की नहीं — ये चेहरा किसी और का है।"
"तो ये कौन है?"
"ये," माँ ने धीरे से कहा, "वो काग़ज़ जो मेरे पल्लू में बँधा है — उसमें लिखा है कि तेरे पापा ने अपना नाम किसे दिया। पर ये जो अदालत में बैठा है — ये उसी का बेटा नहीं है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखें सिकुड़ गईं। "ये किसी और का बेटा है।"
जज की कुर्सी ख़ाली थी, और कमरे में अचानक सन्नाटा-सा छा गया।
तभी एक दरबान दौड़ता हुआ आया — हाथ में काग़ज़, बगल से पसीना पोंछता हुआ।
"जज साहब की तबीयत ख़राब हो गई है," उसने घोषणा की। "सुनवाई आज नहीं हो पाएगी।"
कमरे में हलचल मच गई। मेरा दिल धक्क से रह गया। श्यामलाल ने अपने आदमियों की तरफ़ देखा। सफ़ेद कुर्ते वाला उठ खड़ा हुआ।
पर मैंने देखा — जज की कुर्सी के पीछे की दीवार पर एक छोटी-सी खिड़की थी, और उस खिड़की पर पर्दा हिल रहा था, जैसे किसी ने अभी-अभी वहाँ से झाँका हो।
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