The Token System – Chapter 876
"मेरा बेटा?" मैंने कहा।
"तेरे पापा ने मुझे पाला था, मन्नू। मैं उनका बेटा था — पाला हुआ। अपने ही घर में मैं इतना बड़ा नहीं हो पाया कि तेरे पापा की नज़र में आ सकूँ। इसलिए उन्होंने ये बही दीवार में रखवाई। ताकि कोई उसे छू न सके। और आज ये खुली है — तू खोल रहा है।"
"तो जो दीवार बोली — 'आख़िरी हिसाब वही चुकाएगा जिसने पहला काम अपने हाथ से किया था' — वो कौन है?" मैंने कहा। "मैंने काम करवाया था, तूने किया था।"
"तूने करवाया था," भवानी ने कहा। "करवाना भी काम है। पर पहला हाथ मेरा था।" उसने बही की तरफ़ देखा। "और इसीलिए आज मैं तेरे साथ अदालत चल रहा हूँ, मन्नू। तेरे पापा का लिखा हुआ — 'जो अंतिम हिसाब लिखेगा, उसका नाम उभरेगा' — वो आज उभरेगा।"
बंसी ने बही उठाई और उसे खुले पन्ने पर नज़र गड़ाए देखने लगा। तभी उसका हाथ काँपा।
"मन्नू," उसने कहा। "पन्ने पर नाम आ रहा है।"
मैंने देखा। मोटे पन्ने पर, जहाँ पहले कुछ नहीं था, धूल के नीचे से कुछ लिखा हुआ उभर रहा था — धीरे-धीरे, पुरानी स्याही की तरह, जिसकी भाषा में पहले से कुछ लिखा था। बही के अंदर से स्याही ऊपर आ रही थी — गरम, ताज़ी नहीं, पर जैसे अब खुल रही हो।
दो अक्षर बने।
"मनो," मैंने पढ़ा।
आगे नहीं बढ़ा। तभी बाहर से गाड़ियों की रफ़्तार आई। कोई ज़ोर से हॉर्न बजा रहा था।
गोविंद सीढ़ी पर दौड़कर ऊपर गया। एक पल में वापस आया।
"पुलिस के दरवाज़े पर दो गाड़ियाँ लगी हैं," उसने कहा। "और राजेंद्र भी साथ है। कह रहा है — हवेली पर क़ब्ज़े का आदेश है। कहता है कोई अंदर घुसा है।"
भवानी का चेहरा एक पल के लिए बदला। फिर वो सीधा खड़ा हो गया। उसने अपने कुर्ते का कॉलर ठीक किया।
"मन्नू," उसने कहा। "बही मेरे हाथ में दे। टोकन जेब में रख। और ऊपर सीढ़ी पर सीधे चल। जो बोलूँ, वो कर।"
"तू क्या करेगा?"
"पहला हाथ मेरा था," उसने कहा। "तो अंतिम हिसाब भी मैं लिखूँगा।"
वो सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा। मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी कलाई पतली थी, नसें उभरी हुई, पर पकड़ मज़बूत थी।
"एक बात," मैंने कहा। "राजेंद्र सच बोलेगा या नहीं?"
"राजेंद्र सच नहीं बोलेगा," भवानी ने कहा। "पर उसके पीछे जो खड़ा है, वो बोलेगा। देख लेना।"
हम ऊपर आए। दरवाज़े पर राजेंद्र खड़ा था, दो पुलिसवाले उसके पीछे। राजेंद्र के हाथ में एक काग़ज़ था, जिस पर रबर की मुहर लगी थी।
"भवानी," राजेंद्र ने कहा, "अदालत के आदेश से ये हवेली मेरे क़ब्ज़े में है, क्योंकि इसमें रहने वाले लोगों ने…" वो रुका, मेरी तरफ़ देखा, "…आपने हिसाब छिपाया है।"
"कौन सा हिसाब?" मैंने कहा।
"वो हिसाब जिसे खोदकर निकाला जा रहा है," राजेंद्र ने कहा। "मुझे पता चला है कि अभी-अभी दीवार तोड़ी गई है।"
भवानी एक कदम आगे बढ़ा।
"सरकार," उसने पुलिसवाले की तरफ़ देखकर कहा, "ये दीवार मैंने तोड़ी है। पर आदेश पढ़कर सुनाइए — आदेश में लिखा है कि क़ब्ज़ा तब तक, जब तक हिसाब न खुले। और आज हिसाब हमारे हाथ में है।" उसने बही ऊपर उठाई। "ये बही देवेंद्र सिंह के हस्ताक्षर से बंद थी। उन्होंने ही कहा है — जिस दिन खुले, उस दिन जिसके हाथ में हो, वही मालिक।"
पुलिसवाले ने काग़ज़ देखा। राजेंद्र ने हाथ बढ़ाया, पर भवानी ने बही पीछे कर ली।
"इसे खोलेंगे अदालत में," भवानी ने कहा। "अभी आपके पास जो आदेश है, वो इस बही के नीचे नहीं टिकेगा।"
राजेंद्र का चेहरा कसा। उसने पुलिसवाले से धीरे से कुछ कहा। पुलिसवाला झिझका, फिर बोला — "ठीक है, अदालत ही तय करेगी।" और वो गाड़ी की तरफ़ बढ़ गया।
राजेंद्र मुझे धमकाती नज़र से देखा, फिर भीतर गया।
मैंने कपड़े पहने। जल्दी से मुँह धोया और सफ़ेद गाड़ी में बैठा। गाड़ी में तीन टोकन रखे थे, जैसा मैंने कहा था। बंसी ड्राइवर की जगह पर, मोहन लाल बीच वाली सीट पर, गोविंद पीछे। भवानी किसी को साथ नहीं ले रहा था।
"तू नहीं आ रहा?" मैंने कहा।
"मैं सीधे अदालत पहुँचूँगा," भवानी ने कहा। "राजेंद्र मेरे पीछे आदमी भेजेगा। मैं उसे यहीं रोकूँगा। तू अपना हिसाब पहले चुका।"
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया। बंसी ने गाड़ी चालू की।
रास्ते में मोहन लाल ने बैग से एक और काग़ज़ निकाला।
"ये देवेंद्र सिंह का आख़िरी संदेश है," उन्होंने कहा। "उन्होंने कहा है — अदालत में पहले बही खुलेगी, फिर खाता। और अंत में वो नाम पढ़ा जाएगा जो बही के पन्ने पर उभरेगा।"
"वो नाम अधूरा है," मैंने कहा। "'मनो' लिखा था।"
"पूरा होने वाला है," मोहन लाल ने कहा और काग़ज़ तह करके रख दिया।
गाड़ी अदालत के गेट पर रुकी। मैंने टोकन जेब से निकाला। 'शेष' वही था, पर अब उस अक्षर के नीचे एक पतली लकीर जैसी छाप दिख रही थी, मानो किसी ने टोकन के अंदर से झाँका हो।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने टोकन जेब में रखा और गाड़ी से उतरा।
अदालत की सीढ़ियाँ सामने थीं। ऊपर एक खुली खिड़की से मुझे अंदर का बोर्ड दिखा — 'आज का केस: हवेली हिसाब।'
गोविंद मेरे पीछे आया।
"मनोहर भाई," उसने कहा, हाथ बढ़ाया। "मेरे हाथ में वो बही की चाबी है — जो मैंने कल उखाड़ी थी। बस एक बार बाहर निकलने का मौक़ा दे देना।"
मैंने उसका हाथ देखा। काँप रहा था।
"चाबी तेरे पास रखी," मैंने कहा। "और अगर अंदर कुछ भी उल्टा हुआ, तो वो काग़ज़ — जो तूने मुझे दिया था — पहले तेरे नाम से पढ़ा जाएगा।"
गोविंद ने एक लंबी साँस ली। "मैं सच बोलूँगा, भाई। बस डर लग रहा है।"
"डर है तो अच्छा," मैंने कहा। "बिना डर वाला आदमी झूठ जल्दी बोलता है।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। ऊपर सीढ़ी के आख़िरी पत्थर पर मेरा पैर ठोका, मैं एक पल लड़खड़ाया। मोहन लाल ने हाथ बढ़ाया। पर जब मैंने उनकी तरफ़ देखा, तो वो मेरे पीछे आकर खड़े हो गए थे और गौर से पत्थर को देख रहे थे।
"ये पत्थर कटा हुआ है," उन्होंने कहा। "इसे किसी ने बाद में जोड़ा है।"
"रहने दीजिए," मैंने कहा। "अंदर बही खुलने वाली है।"
हम अंदर गए। भवानी अभी नहीं आया था। दीवार पर समय साढ़े नौ बजे का था। अदालत का कमरा खुला था।
मैं सीट पर बैठा। डर नहीं था, पर पेट में एक गोला-सा बना था।
टोकन जेब से फिर निकाला। 'शेष' पर वो लकीर थोड़ी और गहरी दिख रही थी। मैंने उसे औंधा करके रख दिया।
तभी मुझे पीछे की दीवार पर एक चमक दिखी। वही चमक — पहले दिन जो हवेली की दीवार पर आई थी।
पर इस बार मैंने उसे नज़रअंदाज़ करने की ठानी। आज मैं हिसाब लड़ने आया हूँ, कोई चमक देखने नहीं।
मैंने बंसी से कहा — "अब सब लोग बैठ जाएँ। और मोहन लाल, बही को बीच में रखिए। अदालत को वही देखना है।"
और जैसे ही मोहन लाल ने बही मेज़ पर रखी, कमरे के कोने से वही पुरानी आवाज़ फिर आई — धीमी, जैसे दीवार के अंदर से किसी ने साँस ली हो —
"आख़िरी हिसाब वही चुकाएगा जिसने पहला काम अपने हाथ से किया था।"
इस बार आवाज़ में एक नाम भी था। पर मैंने उसे अभी पूरा नहीं सुना — बही का पन्ना अपने आप खुल गया, और उस मोटे पन्ने पर पहले लिखा 'मनो' अब पूरा हो रहा था।
बंसी ने धीरे से कहा — "मन्नू, नाम पूरा हो गया है।"
मैंने पन्ने की तरफ़ देखा। तीनों अक्षर साफ़ थे।
मनोहर।
और उसके नीचे नई स्याही में एक छोटी लाइन उभरी — "लेकिन हिसाब चुकाने वाला अभी अदालत में नहीं आया।"
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