The Token System – Chapter 863
आदमी ने काग़ज़ पकड़ा। उसका हाथ काँप रहा था। पर उसने लिखा। धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर।
लिखकर उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
उस पर एक नाम था — "श्यामलाल।"
और उसके नीचे एक लाइन — "बाप नक़ली, काग़ज़ असली।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा और बंसी को दिया। बंसी ने पढ़ा और बोला, "काग़ज़ असली मतलब?"
आदमी की उँगली फिर उठी। उसने काग़ज़ के कोने पर एक निशान बनाया — एक छोटा-सा डिब्बा, और उसके अंदर दो लकीरें।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।"
मुझे आ रहा था। "काग़ज़ असली मतलब — जो काग़ज़ कल अदालत में पेश होगा, वो दिखने में पापा की मौत का हादसा साबित करेगा। पर असल में वो काग़ज़ किसी और चीज़ का है।"
आदमी ने आँखें बंद कर लीं। थक गया था।
औरत ने हमें बाहर जाने का इशारा किया। दरवाज़े पर उसने मेरा हाथ पकड़ा। "तुम्हारे पापा का नाम क्या है?"
"दीनानाथ।"
उसकी आँखों में कुछ बदला। "दीनानाथ… वो तो मेरे पति के साथ उसी रात गाड़ी में था।"
"आपके पति?"
"जो बीस साल पहले मर गया। भवानी का बाप।"
मैं रुक गया। "तो आप भवानी की माँ हैं?"
"नहीं। मैं भवानी के बाप की दूसरी औरत हूँ। भवानी की माँ को ये बात पता नहीं चली। और अब तक भवानी को भी नहीं।"
बंसी ने धीरे से कहा, "ये परिवार है या कोई फ़िल्म?"
औरत ने बंसी को घूरा। "फ़िल्म नहीं। यही तो हमारी कहानी है। जिसे हमने अपनी ग़लती से बना डाला।"
मैंने पूछा, "आपके पति ने उस रात पापा को काग़ज़ क्यों दिया था?"
"क्योंकि उस रात कोई मरने वाला था। और वो नहीं चाहता था कि सच उसके साथ मरे। भवानी का बाप उस रात घर से निकला था, पर लौटा नहीं। दूसरे दिन ख़बर मिली कि गाड़ी हादसे में दो लोग मरे — एक दीनानाथ का साथी, दूसरा ख़ुद भवानी का बाप।"
"तो पापा कैसे बचे?"
"क्योंकि वो पीछे बैठा था। गाड़ी सामने से टकराई थी। सामने वाले दोनों मरे। पापा पीछे बेहोश पड़े थे।"
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "मन्नू, अगर पापा पीछे थे तो उन्होंने देखा होगा कि टक्कर कैसे लगी।"
"और उन्होंने बीस साल तक कुछ नहीं कहा," मैंने धीरे से कहा। "क्योंकि वो इसी डर में जिए कि कोई उन्हें भी मार देगा।"
औरत ने दरवाज़ा खोला। "अब जाओ। और हाँ — कल अदालत में जो काग़ज़ पेश होगा, वो सिर्फ़ श्यामलाल के पास नहीं है। उसकी एक कॉपी उस आदमी के पास भी है जो कल भवानी का बाप बनकर आएगा। अगर वो काग़ज़ अदालत में खुला, तो श्यामलाल फँसेगा नहीं — वो बच जाएगा। क्योंकि वो काग़ज़ उसी ने बनवाया है।"
मैंने काग़ज़ पकड़ा। "तो कल हमें क्या करना चाहिए?"
"उस काग़ज़ को खुलने से रोकना। और असली काग़ज़ दिखाना।"
"असली काग़ज़ कौन-सा है?"
औरत मुस्कुराई। "वो जो तुम्हारे पापा की जेब में बीस साल से सिला हुआ है।"
बाहर निकलते ही बंसी ने कहा, "मेरा सिर घूम रहा है।"
"मेरा भी।"
"अब घर चलें? माँ इंतज़ार कर रही होगी।"
"नहीं। पहले पापा के पास चलेंगे। उन्हें बताना है कि उनके हाथ में जो काग़ज़ है, वो अब सिर्फ़ काग़ज़ नहीं — वो अदालत में बम है।"
हम चाय की दुकान पर पहुँचे तो पापा वहाँ नहीं थे। दुकान वाला बोला, "वो सज्जन तो दो आदमियों के साथ चले गए। सफ़ेद कुर्ते वाले के साथ।"
मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया। बर्फ़ जैसा ठंडा।
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। "कहाँ ले गए?"
"उसी जगह जहाँ भवानी है। अदालत के पीछे वाले कमरे में।"
हम भागे। अदालत के पिछले हिस्से में एक गली थी, और उस गली के अंत में एक छोटा कमरा जिसका दरवाज़ा लोहे का था। बाहर सफ़ेद कुर्ते वाला खड़ा था।
वह मुस्कुराया। "तुम्हें बुलाया नहीं था।"
"मेरे पापा कहाँ हैं?"
"अंदर। भवानी से मिल रहे हैं। दोनों पुराने दोस्त हैं।"
बंसी ने अपनी बाँहें चढ़ाईं। "दरवाज़ा खोल।"
"पहले मेरी बात सुन लो।" सफ़ेद कुर्ते वाले ने जेब से एक काग़ज़ निकाला। "ये वो काग़ज़ है जो कल श्यामलाल अदालत में पेश करेगा। तुम इसे अभी जला दो, और मैं तुम्हारे पापा को सही-सलामत बाहर ले आता हूँ।"
"और अगर नहीं जलाया?"
"तो कल अदालत में श्यामलाल जीतेगा, तुम्हारे पापा फँसेंगे, और भवानी फाँसी पर लटकेगा।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये सब जाल है।"
मैंने उस काग़ज़ की तरफ़ देखा। वो पीला था, मैला, सिलाई के धागे से — बिल्कुल वैसा ही जैसा पापा की जेब में सिला था।
"एक बात पूछूँ?" मैंने कहा।
"पूछो।"
"भवानी का बाप मरा या ज़िंदा?"
उसका चेहरा जम गया।
"क्योंकि मुझे अभी-अभी पता चला," मैंने कहा, "कि जो आदमी कल भवानी का बाप बनकर अदालत में आएगा, वो नक़ली है। असली बाप बीस साल पहले मर चुका है।"
उसने काग़ज़ वापस जेब में रखा। "तो तुम सब जान गए।"
"सब नहीं। बस इतना कि तू भवानी का नौकर नहीं है। तू उसके बाप की दूसरी औरत का भतीजा है।"
वह हँसा। "और तू मेरी चाची के पास गया।"
"गया।"
"तो अब तू क्या करेगा?"
"अब मैं वो करूँगा जो तू नहीं चाहता।" मैंने लोहे के दरवाज़े की तरफ़ बढ़कर धक्का दिया।
दरवाज़ा खुला। अंदर अंधेरा था। एक लालटेन जल रही थी।
कमरे के बीच में एक कुर्सी थी। उस पर भवानी बैठा था — हाथ पीछे बँधे, पैर कुर्सी से बँधे, मुँह पर कपड़ा। और उसके सामने ज़मीन पर पापा बैठे थे, हाथ बँधे, पर मुँह खुला।
पापा ने मुझे देखा और पहली बार मुँह फेर लिया।
भवानी ने कपड़े के पीछे से कुछ कहा। समझ नहीं आया।
मैं आगे बढ़ा, पर सफ़ेद कुर्ते वाले ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"एक बात सुन ले। भवानी को मैंने नहीं बाँधा।"
"तो किसने बाँधा?"
"उसके ही आदमियों ने।"
पापा ने सिर उठाया। "मन्नू, ये सच कह रहा है। जब मुझे यहाँ लाया गया, भवानी पहले से बँधा था। इस कमरे में तीन आदमी थे जब मैं आया। उन्होंने भवानी को यहाँ बाँधकर छोड़ दिया और कहा कि अगर वो अदालत में कुछ बोलेगा, तो उसकी बेटी को उठा लेंगे।"
भवानी ने कपड़े के पीछे से फिर कुछ कहा।
मैंने सफ़ेद कुर्ते वाले की तरफ़ देखा। "तू उसके आदमियों में से है?"
"मैं उनका हिस्सा कभी नहीं था। मैं सिर्फ़ भवानी का बाप बनकर कल अदालत में खड़ा होने वाला था। पर उसके आद
॥
"मैं उनका हिस्सा कभी नहीं था। मैं सिर्फ़ भवानी का बाप बनकर कल अदालत में खड़ा होने वाला था। पर उसके आदमियों ने मुझे भी बाहर कर दिया।"
सफ़ेद कुर्ते वाले ने दरवाज़े की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और अंदर से एक आवाज़ आई—हँसी। खुरखुरी, फटी हँसी।
"मन्नू!"
भवानी कुर्सी पर बैठा था। मुँह से कपड़ा अब गिरा हुआ था। हाथ पीछे बँधे थे, पर हँस रहा था।
"अंदर आ। देख कैसे मेरी अपनी सेना ने मुझे बेच दिया।"
मैंने पीछे बंसी को देखा। बंसी ने कंधा उठाया। मैं अंदर गया। लालटेन की रोशनी में भवानी का चेहरा आधा काला था, आधा पीला। होंठ सूखे, आँखें धँसी हुई, पर वही पुरानी आवाज़।
"तू बैठ जा," भवानी ने कुर्सी के पास पड़ी लकड़ी की सीट की तरफ़ हाथ से इशारा करना चाहा, पर हाथ नहीं हिले। "अरे, बंधन खोल मेरे।"
मैं सीट के पास गया। रस्सी पीछे कुंडी में फँसी थी, दो फेरे। मेरे हाथ बढ़े।
"रुक।"
मैं रुक गया।
"ये बंधन मेरे आदमियों ने बाँधे हैं," भवानी ने धीरे से कहा, "और जो आदमी अपने ही मालिक को बाँधे, उसका दरवाज़ा मैं खोलकर भागूँ, तो कल अदालत में उसका वकील कहेगा— देखिए, ये भाग गया। मेरे बेटे का हिसाब बढ़ जाएगा।"
"तेरे बेटे का हिसाब?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno