The Token System – Chapter 852
हवेली का पिछला दरवाज़ा खुला था और अंदर अंधेरा ऐसा कि लगा कोई सालों से यहाँ कोई नहीं आया। बंसी ने लाठी आगे की, मैंने पीछे से पहरा दिया। पर आँगन में कोई नहीं था। न सुखिया, न श्यामलाल, न वो डंडे वाले आदमी। बस बीच में पड़ी कुर्सी थी, और उसके पाये के नीचे रस्सी का एक टुकड़ा पड़ा था।
“कल रात यहीं बंधा था श्यामलाल,” बंसी ने रस्सी उठाई। “रस्सी सूखी है। कोई ज़ोर नहीं लगा। मतलब खुद खुला है।”
“पहरे से कहा था — तमाशा है। तमाशा ख़त्म हो गया।”
मैंने कुर्ते के अंदर हाथ डाला। काग़ज़ों का बंडल निकाला। उँगली से गिने — बंदोबस्त, क़र्ज़नामा, शेखर बाबू की कॉपी, रामलाल की मुहर, सुखिया का तीसरा पन्ना, कम्मो की डायरी, और वो तीन पन्ने। सब ठीक थे।
“गिन लिया?” बंसी ने पूछा।
“गिन लिया। सब है।”
“तो अब बता — इस शाम का हिसाब क्या है? श्यामलाल भागा, काग़ज़ हमारे पास, अदालत कल। फिर ये बुलावा किसने भेजा?”
मैंने मोबाइल निकाला। वही संदेश — “डायरी लेकर आज रात हवेली के पिछले दरवाज़े पर आ — अकेले।” मैंने चारो तरफ़ देखा। ज़मीन पर पैरों के निशान थे — दो जोड़ी, और वो भी ताज़े। एक जोड़ी पीछे के फाटक की तरफ़ गई थी, एक ऊपर की सीढ़ी की तरफ़।
“ऊपर कोई है।” मैंने बंडल वापस कुर्ते में दबाया।
“अकेले नहीं जाएगा,” बंसी ने लाठी संभाली।
“तू सीढ़ी के नीचे रुक। अगर मैं दो मिनट में न लौटूँ, तो सीटी बजा।”
“सीटी कहाँ है?”
“मेरे पास है। तेरे पास पत्थर है क्या?”
“पत्थर नहीं, पर लाठी है।”
वो सीढ़ी के नीचे रुका। मैं ऊपर गया। सीढ़ियाँ चरमरा रही थीं। ऊपर की मंज़िल पर दो कमरे थे — एक का दरवाज़ा बंद, एक खुला। खुले में लालटेन जल रही थी, और उसके पास एक कुर्सी पर कोई बैठा था।
“मनोहर।” आवाज़ पुरानी थी, भारी। “देर लगा दी तूने।”
वो लाठी वाला बूढ़ा था — वही जो अदालत के बाहर मिला था, वही जिसने खुद को पहरा बताया था। पर आज उसके हाथ में लाठी नहीं थी। हाथ खाली थे, और गोद में एक मोटी भूरी फाइल रखी थी।
“तू यहाँ?” मैंने कहा।
“हाँ।” उसने फाइल मेरी तरफ़ सरकाई। “ये ले।”
“क्या है?”
“भवानी का हिसाब। पूरा।”
मैंने फाइल नहीं उठाई। “पहले बता — तू किस तरफ़ का है? कल अदालत में मेरे साथ खड़ा था। आज रात हवेली में अकेला बैठा है।”
वो हँसा। हँसी सूखी थी, जैसे पुराने पत्ते। “मैं किसी तरफ़ का नहीं। मैं हिसाब का पहरा हूँ। जब हिसाब टूटता है, मैं खड़ा हो जाता हूँ। आज हिसाब टूटा है — भवानी का हिसाब।”
“भवानी का हिसाब कैसे टूटा?”
“क्योंकि उसने अपना हिसाब कभी अपने हाथ से नहीं चुकाया।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तू जानता है, उसके पास भी एक टोकन है?”
मैं चुप रहा। जानता था। पर किसी ने इतने सीधे नहीं कहा था।
“जानता है,” वो बोला। “फिर भी पूछता है।”
“उसका टोकन कहाँ से आया?”
“वही हवेली। वही दीवार। जहाँ से तेरा आया।” उसने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा। “दोनों टोकन एक ही हिसाब के हैं। पर एक चलता है, एक सड़ता है।”
“क्यों सड़ता है?”
“क्योंकि भवानी ने टोकन उठाया, पर हिसाब नहीं उठाया।”
मैं कुर्सी के सामने बैठ गया। “समझा। उसने काम दूसरों से करवाए।”
“हर काम किसी और से। हर हिसाब किसी और पर। चालीस साल में एक भी काम अपने हाथ से नहीं किया। और जब तू हर काम दूसरे से करवाता है, तो हर काम का बोझ भी दूसरे पर चढ़ता है।”
“किस पर चढ़ा?”
वो बूढ़ा कुछ देर चुप बैठा। फिर उसने फाइल उठाई, खोली, और उसके आख़िरी पन्ने पर उँगली रखी।
“एक नाम है इसमें। बार-बार। हर काम के नीचे।” उसने पन्ना मेरी तरफ़ घुमाया। “अमर सिंह।”
मैंने पढ़ा। चार जगह नाम था — एक काग़ज़ पर, दूसरे पर, तीसरे पर। सब जगह एक ही लिखाई नहीं थी, पर नाम एक ही था।
“कौन है अमर सिंह?”
बूढ़े ने पन्ना बंद किया। “भवानी का बेटा।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। बंसी सीढ़ी के नीचे खड़ा था, ऊपर देख रहा था। मैंने उसे हाथ से रुकने का इशारा किया।
“भवानी के बेटे का नाम विक्रम था। रणविजय भी है।”
“रणविजय दूसरा बेटा है। वो बसवा में बैठा है, अपने हिस्से की ज़मीन देखता है। और विक्रम उसका भतीजा है — भाई का बेटा। पर अमर?” उसने फाइल फिर खोली। “अमर वो है जिसका नाम भवानी ने कभी किसी काग़ज़ पर अपने हाथ से नहीं लिखा। न जन्म पर, न स्कूल में, न किसी रजिस्टर में। वो काग़ज़ों में नहीं है — पर हिसाब में है।”
“कहाँ है?”
“तूने कल अपनी अदालत में एक नाम पढ़ा था — राजेंद्र। गोविंद राम का बेटा। याद है?”
“याद है।”
“वो नाम काग़ज़ पर आया, तब वो हिसाब में आया। इसी तरह अमर का भी नाम किसी काग़ज़ पर आया था — एक बार, बीस साल पहले।”
“किस काग़ज़ पर?”
“उसी काग़ज़ पर जो सुखिया की माँ के नाम का था।” वो बूढ़ा उठा। “कल अदालत में तेरे पास वो झूठा काग़ज़ था। जिसे सफ़ेद कुर्ते वाले ने दिया था। याद है उस पर क्या लिखा था?”
“सुखिया की माँ के हस्ताक्षर।”
“उस काग़ज़ पर एक और नाम था। जिसे सफ़ेद कुर्ते वाले ने मिटा दिया था — पर जो उसकी तह में अब भी है।”
“कौन सा नाम?”
“अमर सिंह।”
मैंने फाइल अपने हाथ में ली। पन्ने भारी थे। बीस-पच्चीस पन्ने, हर पन्ने पर तारीख़ें और नाम। कुछ जगह स्याही फीकी थी। कुछ जगह काग़ज़ जला हुआ था। पर नाम साफ़ पढ़ा जा सकता था।
“ये फाइल तूने कहाँ से लाई?”
“भवानी के दफ़्तार के पीछे वाले कमरे से। जहाँ वो कभी किसी को नहीं जाने देता। मैं वहाँ सफ़ाई करता हूँ — आज कल।”
“तू सफ़ाई वाला है?”
“मैं पहरा हूँ। सफ़ाई मेरा बहाना है।”
“तो अब बता — ये अमर कहाँ है? ज़िंदा है?”
बूढ़े ने लालटेन की लौ छोटी की। “बिस्तर पर है। पिछले छह महीने से। भवानी ने डॉक्टरों को पैसे देकर चुप करा रखा है। कोई पूछता नहीं, कोई जानता नहीं।”
“कौन से डॉक्टर?”
“जो उसे बचा रहे हैं। वही जो भवानी के होम के बाहर वाले कमरे में बैठते हैं।” वो रुका। “और एक बात — उसकी बीमारी का पता किसी को नहीं चलने दिया जाता। क्योंकि जिस दिन पता चलेगा, उस दिन हिसाब की किताब खुलेगी, और उसमें पहला नाम अमर सिंह का होगा।”
मैंने फाइल बंद की। सीढ़ी की तरफ़ देखा। बंसी अब ऊपर आ चुका था, आधे रास्ते पर खड़ा था, सुन रहा था। उसका चेहरा सख़्त था।
“एक बात पूछूँ?” बंसी ने कहा।
“पूछ।”
“अगर अमर पर हिसाब चढ़ा है, तो उसका इलाज क्यों नहीं हो रहा? हिसाब तो हम चुका रहे हैं — भवानी का खेल तो हमने उजाड़ दिया है।”
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। “हिसाब चुकाने से इलाज नहीं होता। तूने खुद देखा है — टोकन बीमारी ठीक नहीं करता। भवानी ने जो किया, उसका बदला हिसाब देगा। पर अमर का जिस्म?” उसने हाथ फैलाए। “उसका इलाज डॉक्टर करेगा। और डॉक्टर को भवानी ने खरीदा हुआ है।”
मैंने फाइल अपनी जेब में नहीं रखी — हाथ में पकड़ी रही। “तू मुझे ये क्यों दे रहा है?”
“क्योंकि कल तेरी अदालत में आख़िरी गवाह बाक़ी है। और वो गवाह जो होना चाहिए, वो अमर है — नहीं, अमर नहीं। वो नहीं आ सकता। उसकी जगह वो आएगा जो उसे बचाने की कोशिश कर रहा है।”
“कौन?”
बूढ़े ने फाइल में से एक पन्ना निकाला। उस पर एक नाम था।
“ये काग़ज़ किसका है?”
“अमर के कमरे में तकिये के नीचे मिला था। दो हफ़्ते पहले।”
मैंने पढ़ा। नाम — “मधु”।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। “मधु कौन है?”
“पता नहीं। पर काग़ज़ पर लिखा है — डॉक्टर।”
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