The Token System – Chapter 830
राजेंद्र का हाथ मुट्ठी में बंधा।
"तेरे बाप का नाम क्या था?" सुमन ने कहा।
राजेंद्र ने आँखें झुकाईं। "राघव।"
मैं एक पल रुका। राघव — वही नाम जो कुंवर ने बताया था, जो टोकन पर उभरा था, जो हवेली के दस्तावेज़ों में सबसे नीचे लिखा था।
"राघव किसका बेटा था?" मैंने पूछा।
"रामलाल का तीसरा बेटा।" राजेंद्र ने मेरी आँखों में देखा। "राखी की शादी वाले लड़के का नाम भी राघव है — मुझे पता है। यही तो सबसे बड़ा इत्तेफ़ाक़ है।"
सुमन ने काग़ज़ हिलाया। "अब बात बढ़ाने का वक़्त नहीं। ये काग़ज़ रामदीन के कमरे से आया है — पर उसके कमरे में काग़ज़ किसने रखा?"
राजेंद्र और मैंने एक साथ उसकी तरफ़ देखा।
"अगर रामदीन डायरी का पन्ना फाड़ने की बात कबूल कर रहा है," सुमन ने कहा, "तो नक्शा उसने क्यों बनाया? ये काग़ज़ उसके कमरे में किसने डाला?"
बंसी नीचे से चिल्लाया — वो अभी भी आँगन में खड़ा था, हाथ पर पट्टी। "मन्नू! भवानी की गाड़ी वाला सिपाही मंगल — मैं उसे पहचानता हूँ। वो लालाजी का भांजा है।"
मैंने सुमन और राजेंद्र की तरफ़ देखा। "लालाजी अंदर है?"
"अभी-अभी गाड़ी में बैठकर गया," बंसी ने कहा। "बीस मिनट पहले। मैंने सोचा कुछ काग़ज़ लेने आया होगा।"
मैं आँगन के बाहर भागा। गेट पर खड़े सिपाही के पास पहुँचा।
"अभी-अभी एक लाल गाड़ी निकली?"
"हाँ। दो आदमी थे। एक बूढ़ा, एक जवान।"
"कहाँ गए?"
"बाएँ मुड़े — पुराने बाज़ार की तरफ़।"
मैं वापस मुड़ा। सुमन और राजेंद्र मेरे पीछे आ चुके थे।
"अब गाड़ी का पीछा करने का वक़्त नहीं," राजेंद्र ने कहा। "हमें सीधा अदालत जाना होगा और जज को बताना होगा कि काग़ज़ गायब है।"
"नहीं," मैंने कहा। "जज काग़ज़ के बिना कुछ नहीं करेंगे। हमें पहले ये साबित करना होगा कि जो काग़ज़ अदालत में है — वो आख़िरी नहीं है।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "हमारे पास एक चीज़ है।"
"क्या?"
"अदालत में जो काग़ज़ शेखर बाबू ने पेश किया था — उस पर मेरी नज़र गई थी। उसके किनारे पर, सिलाई के निशान के पास, एक और लकीर थी। मुझे तब समझ नहीं आया। पर अब —" उसने मेरी तरफ़ काग़ज़ बढ़ाया, "— तीसरे खाने के नीचे, इसी काग़ज़ में, एक और लकीर है। ज़रा देखो।"
मैंने काग़ज़ को रोशनी में पकड़ा। तीसरे खाने के नीचे, जहाँ नाम मिटा था, उसके ठीक नीचे एक फीकी लकीर में हल्का-सा लिखा था। मैंने ध्यान से देखा।
"तीन भाई। तीसरा बोलेगा नहीं।"
मैंने सुमन को देखा।
"मतलब," सुमन ने कहा, "तीसरे का नाम उसी वक़्त मिटाया गया जब ये काग़ज़ बना। और उसे मिटाने वाले ने ये भी लिख दिया कि तीसरा आज तक चुप है।"
"भवानी का बाप?" मैंने कहा।
"या भवानी ख़ुद," राजेंद्र बोला। "वो इसे अपनी जेब में रखता था। जो चीज़ वो जेब में रखता है, वो उसके लिए बहुत मायने रखती है।"
मैंने काग़ज़ तह किया और जेब में रखा।
"तो अब क्या?" सुमन ने पूछा।
मैंने आँगन के बाहर सड़क की तरफ़ देखा। अदालत यहाँ से पाँच मिनट है। फिर मैंने टोकन जेब में महसूस किया — अब गरम नहीं था। ठंडा था।
"पहले ये देखना है कि ये काग़ज़ किस काग़ज़ से फटा है।" मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "तूने रामदीन के कमरे से वो नक्शा उठाया था — रामदीन कहाँ है अभी?"
"राजेंद्र की टुकड़ी के पास।"
"उसको अदालत ले चलो। और मैं —"
"तू कहाँ जा रहा है?"
"पुराने बाज़ार। लालाजी की गाड़ी। उस काग़ज़ के बिना हम कुछ साबित नहीं कर पाएँगे, सुमन।"
सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। "अकेले नहीं।"
"बंसी है मेरे साथ।"
"बंसी का हाथ टूटा है।"
"तो तू चल।"
"अदालत में रामदीन को ख़ुद जाना होगा — और तू उसके बिना अंदर नहीं जा सकता।"
एक पल के लिए तीनों चुप रहे। फिर राजेंद्र ने कहा, "मैं चलता हूँ। मैं लालाजी को जानता हूँ। वो मुझसे डरता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुझे भरोसा है?"
"मेरे बाप की जान उस आदमी के हाथों में थी," राजेंद्र ने कहा। "वो इसे पहचानता है। जब वो मेरी आवाज़ सुनेगा — वो काग़ज़ नहीं छिपा पाएगा।"
मैंने एक पल सोचा। फिर सिर हिलाया। "ठीक है। मैं सुमन के साथ अदालत चलता हूँ। तू पुराने बाज़ार। एक घंटा। एक घंटे में अगर तू वापस नहीं आया, तो मैं ख़ुद आऊँगा।"
राजेंद्र ने सिर हिलाया और भाग गया।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "तुझे उस पर भरोसा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर मुझे भरोसा है कि उसको भी काग़ज़ चाहिए। और अभी वो हमारे बिना काग़ज़ हासिल नहीं कर सकता।"
अदालत का गेट खुला था। अंदर जाते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा — बंसी अपनी टूटी कलाई लिए आँगन में खड़ा था, और शेखर बाबू दूर, काकी के साथ, बेंच पर बैठे थे।
अंदर पहुँचकर हरीश चंद्र ने हमें रोका।
"काग़ज़ मिला?"
"आधा," मैंने कहा। "और आधा अभी रास्ते में है।"
हरीश चंद्र का चेहरा बदला। "मन्नू, ये अदालत है। आधे काग़ज़ पर फ़ैसला नहीं होता।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "इसीलिए मैं जज साहब से एक ही बात कहूँगा — एक घंटा रुक जाएँ।"
उसी वक़्त सुमन ने मेरी कुहनी पकड़ी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"क्या?"
"मन्नू," वो धीरे बोली। "मैंने अभी काग़ज़ की तह पूरी खोली। पीछे तो कुछ और भी लिखा है।"
मैंने काग़ज़ उसके हाथ से लिया। पलटकर देखा। पीछे की तरफ़ फीकी स्याही में, छोटे अक्षरों में, एक लाइन और थी — जो पहले तह में छिपी थी।
"जो इस काग़ज़ को फाड़ेगा, उसका नाम तीसरे खाने में लिखा जाएगा।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "मतलब — अगर ये काग़ज़ फट गया, तो तीसरा खाना कभी नहीं भरेगा। यही भवानी का बाप चाहता था।"
सुमन ने धीरे से कहा, "और शायद इसीलिए राजेंद्र ने इसे फाड़े बिना रखा।"
अदालत के अंदर से घंटी बजी। हरीश चंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "अंदर चलो। जज साहब बुला रहे हैं।"
मैंने काग़ज़ संभालकर जेब में रखा और सुमन के साथ अंदर बढ़ा।
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ — हल्का-सा, एक पल के लिए — और फिर ठंडा हो गया।
मैं रुका नहीं। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अंदर जाते वक़्त मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी — राजेंद्र का बाप राघव, रीना की शादी वाले लड़के का नाम भी राघव। क्या ये इत्तेफ़ाक़ था, या भवानी ने जान-बूझकर रीना के रिश्ते में वही नाम चुना था — ताकि मन्नू का ही परिवार मन्नू के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाए?
गेट के अंदर आख़िरी सीढ़ी चढ़ते वक़्त सुमन ने कहा, "मन्नू, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"अगर राजेंद्र काग़ज़ लेकर आता है, तो उस काग़ज़ पर सिर्फ़ तेरे हिस्से का दावा नहीं होगा। उस पर राघव का नाम होगा। और राघव अगर राजेंद्र का बाप है — तो राजेंद्र ख़ुद को तीसरा कहता है, और रीना के ससुराल वाले उसी नाम के हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू क्या कहना चाहती है?"
"मैं कहना चाहती हूँ कि तेरी बहन की शादी का रिश्ता शायद उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है।"
गेट खुला। हम अंदर गए।
पीछे से बंसी की आवाज़ आई — दूर से, हवा में घुलती हुई। "मन्नू! राजेंद्र वापस आया! गाड़ी में बैठा है!"
मैं अंदर जाते-जाते रुका।
"काग़ज़?" मैंने चिल्लाकर पूछा।
"हाथ में है!" बंसी चिल्लाया।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
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