The Token System – Chapter 83
और मन में एक ही सवाल — कल सुबह अदालत में, जब हरदेव अपनी गवाही देगा, तब भवानी सिंह क्या करेगा? भवानी सिंह, जो बीस साल से इस रात को ढो रहा था। भवानी सिंह, जिसने अपने पापा की गाड़ी चलाई थी।
॥
घर पहुँचा तो रात ग्यारह बज चुके थे। बंसी को दुकान पर ही छोड़ आया था, उसने कहा था सुबह सीधे हवेली मैदान आएगा। फाटक खोला तो अंदर रोशनी थी — माँ के कमरे की नहीं, बीच वाले कमरे की। और वहाँ रीना बैठी थी, ज़मीन पर, चादर बिछाकर, सामने एक ट्रंक खुला और उसमें से साड़ियाँ निकली हुई।
"यह क्या कर रही है तू इस वक़्त?"
"सुबह नींद नहीं आएगी तो रात में ही देख लूँ।" उसने एक साड़ी उठाई, हल्की पीली, किनारे पर पतली सुनहरी लकीर। "तेरी बहन की शादी है मन्नू। कल अदालत है, पर परसों तेरे भांजे-भांजियों के कपड़े भी तो सिलने हैं मुझे।"
मैं दरवाज़े पर ही खड़ा रह गया। वह मुस्कुराई और ट्रंक का ढक्कन गिरा दिया।
"बैठ।"
"रीना, सुबह जल्दी उठना है।"
"बैठ," उसने दोबारा कहा, और वह आवाज़ वही थी जो बचपन में कहती थी जब मैंने कोई चीज़ तोड़ दी हो। मैं बैठ गया।
वह उठी, चूल्हे पर से चाय का बर्तन उतारा, दो प्याले भरे, एक मेरे आगे रखा। फिर अपने प्याले को दोनों हाथों में पकड़कर मेरे सामने बैठ गई।
"कल अदालत में जाएगा।"
"हाँ।"
"क्या कहेगा?"
"सच।"
"कौन सा सच?" उसने प्याला नीचे रख दिया। "मन्नू, मैं तुझसे अदालत का सच नहीं पूछ रही। मैं पूछ रही हूँ — तू कल वहाँ कौन बनकर जाएगा? वकील? गवाह? या मेरा भाई?"
प्याला मेरे हाथ में ठंडा होने लगा।
"रीना —"
"मैंने तेरे जेब में से निकलते देखा है वो।" उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा, फिर आँखों में। "चार महीने से तू उस काग़ज़ों के पीछे पागल है। मैंने कभी नहीं पूछा कि रात को कहाँ जाता है, किससे मिलता है, जेब में पैसा कहाँ से आया। कभी नहीं पूछा। जानती हूँ कि तू मेरे लिए कर रहा है।"
"तो फिर?"
"तो फिर यह सुन ले।" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। "परसों मंडप में तू सिर्फ़ मेरा भाई बनकर आएगा। कोई काग़ज़ लेकर नहीं आएगा, किसी वकील से बात नहीं करेगा, किसी को धमकाएगा नहीं। शादी में बारात भी आएगी और भवानी के आदमी भी — अगर वो आएँ, तो मैं उन्हें चाय पिलाऊँगी और भेज दूँगी। पर तू वहाँ मेरा भाई होगा। बस।"
"और शादी का ख़र्च?"
"मेरी तनख्वाह है। काकी ने कहा है सामान में जो मदद करेगी। कम्मो अम्मा ने कहा है वो हलवा बनाएँगी।" उसने मेरी उँगलियाँ दबाईं। "मुझे तेरे उन काग़ज़ों का पैसा नहीं चाहिए, मन्नू। जिस पैसे के पीछे किसी का घर टूटा हो, वो पैसा मेरे गले में नहीं पड़ेगा, मैं साफ़ बोल रही हूँ।"
"वो पैसा —" मैं रुक गया। क्या कहता? कि हर नोट के पीछे कोई बचा हुआ है? कि उन पैसों से एक बच्चा अस्पताल पहुँचा, एक औरत की ज़मीन बची?
"देख," मैंने कहा, "जो पैसा आया है, वो साफ़ है। मेहनत का है।"
"तो फिर कोई बात नहीं।" वह मुस्कुराई। "बस इतना कह रही हूँ — उसे मेरी शादी से मत जोड़। वो तेरा हिसाब है, तेरा काम है। मेरी शादी मेरी ख़ुशी है। दोनों अलग रख।"
मैं हँस पड़ा।
"क्यों हँस रहा है?"
"कुछ नहीं। तू बड़ी हो गई, बस यही सोच रहा था।"
"मैं पहले से बड़ी थी, तू पता नहीं कहाँ रहता था।" उसने चुटकी ली, फिर उठकर ट्रंक बंद किया। "अब सो जा। सुबह तेरे पास काम है और मेरे पास स्कूल।"
मैं अपने कमरे की तरफ़ मुड़ा ही था कि जेब में ठंडक हुई।
वह ठंडक नहीं थी जो बाहर की हवा से आती है। वह अंदर से आई, टूटे कोने से, जैसे किसी ने बर्फ़ का एक टुकड़ा मेरी जाँघ पर रख दिया हो।
मैंने कोना जेब से निकाला। रीना ने देखा, पर कुछ नहीं बोली — उसने आँख फेर ली, जैसे जानती हो कि यह मेरी अपनी दुनिया है जिसमें वो नहीं घुसेगी।
कोने पर नई लकीर उभर रही थी। धीरे-धीरे, जैसे किसी ने अभी-अभी ताज़ी स्याही से खींची हो। चार शब्द थे:
रीना की स्कूल। एक बच्ची, तीन दिन।
मेरे हाथ से कोना फिसलने लगा। मैंने उसे मज़बूती से पकड़ा और मेज़ पर रख दिया।
रीना की स्कूल से मेरा क्या? रीना की शादी में मुझे भाई बनकर आना है, यह उसने अभी-अभी कहा है। और टोकन मुझे रीना के स्कूल भेज रहा है।
मैं कमरे से बाहर आया, आँगन में खड़ा हो गया। ऊपर चाँद अभी वहीं था, पर अब उस पर पतले बादल आ गए थे, धुँधला रोशनी कर रहा था।
रात को मैंने आँख नहीं लगाई। करवट बदलता रहा, टोकन की लकीर सोचता रहा। "एक बच्ची, तीन दिन।" कौन सी बच्ची? कौन सी माँ? और सबसे बड़ी बात — यह काम मेरी बहन के स्कूल में क्यों?
सुबह सात बजे मैं उठा। नहाते वक़्त भी दिमाग़ वहीं अटका था। माँ ने चाय दी, पूछा नहीं कहाँ जा रहा है। रीना साड़ी पहनकर तैयार हो रही थी, सिर पर चश्मा लगाकर किताबों की जाँच कर रही थी।
"मैं चलता हूँ।"
"इतनी सुबह?" उसने घड़ी देखी। "तेरी ड्यूटी तो आठ की है।"
"पहले इधर ही काम है।"
"कहाँ?"
मैंने कहा नहीं। वह रुकी, मेरी तरफ़ देखा, फिर किताब बंद कर दी। "ठीक है। अपना ध्यान रख।"
मैं स्कूल की तरफ़ चल पड़ा। रीना जिस स्कूल में पढ़ाती है वो रामगंज से दो गलियाँ आगे है — नगरपालिका का पुराना स्कूल, पीली दीवार, लोहे का फाटक जो जंग से खुरदुरा हो गया है। सुबह आठ बजे के करीब मैं वहाँ पहुँचा तो फाटक खुला था, बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं, और बाहर की तरफ़ बरामदे के नीचे, दीवार से सटकर, एक छोटी बच्ची बैठी थी।
उम्र सात-आठ साल। स्कूल की वर्दी पहने — नीली स्कर्ट, सफ़ेद कमीज़, जिसके कॉलर पर हल्का धब्बा। बाल बँधे हुए थे पर पीछे से खुल गए थे। स्कूल बैग उसके बगल में ज़मीन पर पड़ा था और वह उस पर सिर रखकर रो रही थी। चुपचाप। बिना शोर। बस कंधे काँप रहे थे।
मैं उसके सामने रुक गया। कोई और नहीं था — बारी में मैं पहुँचा था। बच्चे अंदर जा रहे थे, दो मैडम फाटक पर खड़ी थीं और एक-एक को अंदर भेज रही थीं, पर इस बच्ची की तरफ़ किसी ने नहीं देखा। जैसे वह वहाँ पिछले कुछ वक़्त से बैठी है और सब उसे देखकर भी नहीं देखने का नाटक कर रहे हैं।
मैं झुककर उसके सामने बैठ गया।
"अरे, क्या हुआ?"
उसने सिर उठाया। आँखें लाल। होंठ सूजे हुए। "मम्मी नहीं आई," उसने कहा, और आवाज़ ऐसी कि जैसे सुबह से यही एक बात कह रही हो।
"कहाँ गई मम्मी?"
"अस्पताल।" वह फिर रोने लगी। "कल रात से। मुझे मौसी लेने आनी थी, पर वो भी नहीं आई। मैं यहाँ बैठी हूँ।"
"तू कितनी देर से बैठी है?"
"जब से फाटक खुला।"
मैंने स्कूल के गेट की तरफ़ देखा। दो मैडम में से एक ने मेरी तरफ़ देखा, फिर दूसरी की तरफ़ देखकर कुछ कहा, और दोनों अंदर चली गईं। एक भी मेरे पास नहीं आई।
मैं बच्ची के पास बैठ गया। "नाम क्या है तेरा?"
"मीना।"
"मीना, यह ले।" मैंने अपनी जेब से वो पुराना रुमाल निकाला जो माँ ने दिया था, उसे उसके आँसू पोंछने के लिए बढ़ाया। उसने नहीं लिया। तो मैंने खुद उसके गाल पोंछे। वह रुकी, मेरी तरफ़ देखा।
"तुम कौन हो?"
"मैं —" मैं क्या बताता? "मैं रीना मैडम का भाई हूँ।"
उसकी आँखों में कुछ बदला। "रीना मैडम मेरी क्लास में नहीं पढ़ातीं। पर वो अच्छी हैं। उन्होंने मुझे कल चॉकलेट दी थी।"
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