The Token System – Chapter 82
मैंने पर्ची को मेज़ पर रखा और सीधे उस पर उभरे शब्दों को देखा — और पर्ची उंगली के नीचे ठंडी थी।
"कल अदालत में यह सब जाएगा," मैंने कहा। "हरदेव की गवाही, पर्ची, फोटो, काग़ज़, बही। सब।"
तभी मेरी जेब में कुछ हिला। हल्का सा। मैंने हाथ डाला — टोकन नहीं था, वो तो राजेंद्र के पास था — पर टूटे कोने से एक बार लगा, जैसे किसी और जगह कोई चीज़ उसका नाम ले रही हो।
मैंने कोना निकाला। उसका कोना गरम नहीं था, पर उस पर एक छोटी लकीर चमक रही थी, जो पहले नहीं थी।
"बंसी," मैंने कहा, "देख। यहाँ कुछ लिखा है।"
बंसी ने आँखें सिकोड़कर देखा और पढ़ा — "दो हिस्से मिले नहीं। हिसाब अधूरा।"
मैंने पर्ची उठाई। "इसका मतलब अदालत में सिर्फ़ टोकन मिलाने से नहीं होगा। असली टोकन भवानी के पास है, वो राजेंद्र के लिफ़ाफ़े की सीलबंद है। और यह कोना उस टोकन का टूटा हुआ हिस्सा है। अगर यह जुड़ेगा, तो हिसाब पूरा होगा। मुझे कल अदालत में यह कहना होगा।"
"अदालत इसे मानेगी?" कम्मो ने पूछा।
"नहीं मानेगी," मैंने कहा। "पर भवानी मानेगा। और जो आदमी हवेली से डरता है, वो एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में पड़े टुकड़े से भी डरेगा।"
रात को मैं बाहर आया। आसमान में बादल थे। मैं फाटक तक गया और सड़क की तरफ़ देखा। सड़क सूनी थी। पर मुझे लगा कि दूर, पीपल के नीचे कोई खड़ा है — स्थिर, झुका हुआ। मैंने पलक नहीं झपकी और वो चला गया। या वह कभी था ही नहीं।
मैंने हरदेव की फोटो जेब से निकाली और उसे चाँद की रोशनी में देखा। गाड़ी, बोनट पर खड़ा आदमी, नीचे पड़ा नीला कोना। फोटो में कुछ और भी था — गाड़ी के पीछे, दीवार पर, एक छोटी खिड़की थी जिसमें से रोशनी आ रही थी। मैंने फोटो पलटी और उसके पीछे हरदेव की लिखाई में एक लाइन पढ़ी — "बीस साल। एक सवाल। हिसाब किसका?"
मैंने फोटो जेब में रखी और घर लौटा।
अंदर माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थी। बंसी बैठा सिर खुजला रहा था। कम्मो बही अपनी गोद में लिए हुए थी।
"कल सुबह," मैंने कहा, "हरदेव के दोनों बेटे यहाँ होंगे। कोई ज़रूरी काम की बात हो तो अभी बता दो, क्योंकि कल सुबह के बाद हम सब अदालत में होंगे।"
कम्मो ने उठकर अपनी छड़ी उठाई। "मैं अदालत जाऊँगी। मुझे कोई रोक नहीं सकता।"
"बहुत ठीक," मैंने कहा।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक लंबी, धीमी दस्तक — जैसे किसी ने पहले दो उंगलियों से खटखटाया हो और फिर हथेली से दबाया हो।
बंसी उठा। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे रोका और खुद दरवाज़े तक गया।
दरवाज़ा खोला। बाहर एक आदमी खड़ा था, तीस-पैंतीस के आसपास, साधारण कुर्ता, हाथ में एक मुड़ी हुई पर्ची। उसने मेरी तरफ़ देखा और पर्ची बढ़ा दी।
"लालाजी ने भेजा है," उसने कहा। "कहा है — अदालत से पहले यह पढ़ लेना।"
मैंने पर्ची खोली। उस पर लालाजी के असली लिखाई में एक लाइन थी — "मन्नू, कल अदालत में जो गवाही देगा, वो मेरे बेटे अंकित के नाम पर फँसे केस को खोल सकता है। भवानी ने अंकित को फँसाया है, कल का गवाह उसे छुड़ा सकता है। तू तय कर — मुझे नहीं पता कि कल कौन गवाही देगा।"
मैंने पर्ची पलटी। पीछे एक और लाइन थी — "अगर तू चाहे, तो मैं कल अदालत में भवानी के ख़िलाफ़ सारे ज़मीन के काग़ज़ देने को तैयार हूँ। बदले में सिर्फ़ एक — अंकित का नाम साफ़ हो।"
बंसी ने पर्ची पढ़ी और सीटी बजाई। "लालाजी आज पहली बार भवानी के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है।"
"लालाजी अपने बेटे के लिए खड़ा हो रहा है," मैंने कहा। "भवानी के ख़िलाफ़ नहीं।"
मैंने पर्ची मेज़ पर रखी और वापस दरवाज़े की तरफ़ देखा।
"तेरा नाम क्या है?"
"मुझे लोग साधू कहते हैं," उसने कहा। "मैं लालाजी का मुंशी हूँ।"
"तो साधू, लालाजी को कह देना — कल सुबह आठ बजे हवेली मैदान में आ जाए। जो काग़ज़ वो लाएगा, उस पर अदालत में बात होगी। और अंकित का नाम — मैं तब तक साफ़ नहीं करवा सकता जब तक सच सामने न आ जाए। पर इतना कह देना — अगर उसका बेटा सच बोलेगा, तो मैं उसके साथ खड़ा रहूँगा।"
साधू ने सिर हिलाया और मुड़ गया। फिर रुका और बोला, "लालाजी ने एक और बात कही थी। कहा था कि अगर तू हाँ कहे, तो कल अदालत में एक और गवाह आएगा।"
"कौन?"
"वही, जिसे भवानी ने राशन बंद करने की धमकी दी थी। राजेश। चाय की दुकान वाला।"
उसके जाने के बाद मैं वापस अंदर आया। कमरे में चार लोग थे — माँ, बंसी, कम्मो और मैं। और मैंने देखा कि बंसी की आँखें छत की तरफ़ थीं, कुछ सोच रहा था।
"बंसी, क्या बात है?"
"मन्नू," उसने धीरे से कहा, "कल की अदालत में गवाह बहुत हो जाएंगे। हरदेव, लालाजी, राजेश, शेखर, सुमन बहन जी, मैं, तू — और अगर कम्मो अम्मा बोले तो वो भी। गवाही के काग़ज़ अलग-अलग होंगे। सबको एक साथ जोड़ना होगा।"
"तो जोड़ेंगे।"
"पर एक चीज़ है," उसने अपनी गर्दन आगे की, "इतने गवाहों के सामने अगर भवानी सिंह ने अपना टोकन निकाल दिया — खुले आम, अदालत में — और उस पर कुछ भी लिखा रहा, तो जज कहेगा, 'यह है क्या?' और हम सब को जवाब देना पड़ेगा।"
कमरा फिर चुप हुआ।
यही वो चीज़ थी जो मुझे डरा रही थी — अदालत में टोकन का सच कहने में। अगर मैंने कहा — यह पीतल का सिक्का है जो काम देता है — तो जज को गवाही की क़ीमत क्या होगी? अगर नहीं कहा, तो मन्नू पर "काग़ज़ चुराने" का केस भवानी का वकील खड़ा कर सकता है।
मैंने टूटा कोना जेब से निकाला और उसे मेज़ पर रख दिया। फिर मैंने पर्ची — "इसका हिसाब मेरे बेटे पर" — उसके बगल में रख दी।
"कल अदालत में," मैंने कहा, "टोकन का ज़िक्र सिर्फ़ एक बात में आएगा। मैं कहूँगा — भवानी सिंह के पास एक पीतल का टोकन है, जो हवेली की दीवार से निकला है। और वो उस पर लिखकर अपने फ़ैसले लेता था। बस। हिसाब की बात गवाह करेंगे, मैं नहीं। टोकन को जज काग़ज़ का सबूत माने — यह ज़रूरी नहीं। जरूरी यह है कि भवानी ने उसे क्यों छुपाया और उस पर क्यों लिखा। यह बात हरदेव की गवाही साबित करेगी — क्योंकि हरदेव ने देखा था कि भवानी टोकन घुमाकर ज़मीन के काग़ज़ संभालता था।"
"तो अदालत में टोकन दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी?" कम्मो ने पूछा।
"नहीं पड़ेगी," मैंने कहा। "भवानी खुद उसे छुपाएगा, क्योंकि वो जानता है कि वो क्या है।"
बंसी हँसा। "अरे भाई, तू तो अदालत से पहले ही जज बन गया।"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ वही कहूँगा जो भवानी नहीं कह सकेगा।"
रात गहरी हुई। कम्मो उसी चौकी पर सो गई। बंसी बेंच पर लेट गया। माँ अपने कमरे में चली गई। मैं बाहर आया — आसमान साफ़ हो गया था, चाँद ऊपर था। मैंने जेब से फोटो निकाली और उसे चाँद के सामने उठाया। गाड़ी के पीछे वाली खिड़की में रोशनी थी, और मुझे लगा — यह हवेली की कोई खिड़की है, और उसमें इस रात कोई बैठा था जो गाड़ी सुन रहा था।
मैंने फोटो जेब में रखी।
घर के पास एक बार फिर लौटकर देखा — और पीपल के नीचे कोई नहीं था। बस सड़क, और उस पर सूखी पत्तियाँ, जो धीरे-धीरे हिल रही थीं, जैसे किसी ने अभी-अभी उन पर से पैर हटाया हो।
मैं अंदर आया, दरवाज़ा बंद किया, और दीवार से टेक लगाकर बैठ गया।
जेब में टूटा कोना ठंडा था।
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