The Token System – Chapter 820
वो गली के मोड़ की तरफ़ मुड़ा।
"नाम?" मैंने पूछा।
"नाम से क्या होगा," उसने कहा। "काग़ज़ों में मेरा नाम मिटा दिया गया। बुलाना हो तो 'पहरा' बुला लेना। मैं हिसाब का पहरा हूँ, किसी का नहीं।"
वो चला गया। मैं गली में दौड़ा। बंसी मोड़ के पास दीवार के सहारे बैठा था, आँखें खोल रहा था, सिर पर हाथ।
"बंसी।"
"अरे, क्या हुआ?" उसने कहा, जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं। "मैं तो बस यहाँ बैठा था।"
"तेरे सिर पर…"
"सिर पर क्या?" उसने हाथ लगाया। "अरे हाँ, थोड़ा चक्कर आया था। ठीक है।" वो उठा। "तू नीचे गया था? कुछ मिला?"
मैंने उसे वो चार लाइनें दिखाईं। उसने पढ़ा। दो बार पढ़ा।
"तेरे पापा की मौत वाली तारीख़," उसने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"मन्नू, ये तारीख़ काग़ज़ पर इसलिए नहीं है कि उस दिन तेरे पापा मरे। ये इसलिए है कि जिस दिन तेरे पापा मरे, उसी दिन भगवान सिंह ने ये लिखा।"
मैं वहीं बैठ गया। दीवार के सहारे। उस रात हवा ठंडी थी, पर मेरे हाथ पसीने में थे।
"बंसी, एक बात है।"
"बोल।"
"कुएँ पर वो बूढ़ा खड़ा था। कह रहा था कि वो मेरा नाना है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मुड़कर गली की तरफ़ देखा, जहाँ वो जा चुका था।
"और तूने उसे क्या कहा?"
"कुछ नहीं। मैंने सिर्फ़ ये कहा कि मैं किसी का नहीं, अपना हूँ।"
बंसी हँसा। सिर पर हाथ रखकर हँसा, जैसे दर्द में हँसी आ गई हो।
"ये बात तूने ठीक कही," उसने कहा। "पर एक काम और करना पड़ेगा।"
"क्या?"
"कल सुबह सुमन के साथ तहसील जाना पड़ेगा। अकेले नहीं।"
मैंने टोकन जेब से निकाला। उस पर अभी भी वही शब्द लिखा था — सुमन।
सुबह छह बजे टोकन फिर गरम हुआ। मैं उठा। उस पर नया शब्द उभर रहा था — "जल्दी।"
मुझे वो शब्द पसंद नहीं आया।
मैंने शर्ट पहनी, माँ को बिना जगाए बाहर निकला। सुबह की हवा में वो गंध थी जो बारिश से पहले आती है। सड़क खाली थी। अस्पताल का गेट खुला था, पर बाहर भीड़ जमा थी।
एक औरत चिल्ला रही थी — नंगे पैर, सिर पर दुपट्टा ठीक से नहीं, हाथ में अस्पताल की पर्ची।
"मेरे पति को बिना काग़ज़ के भेज रहे हैं! सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा — भवानी के होम ले चलो, वहाँ बिस्तर खाली है।"
गार्ड उसे रोक रहा था। वो औरत गार्ड की बाँह पकड़कर खींच रही थी, जैसे उससे कोई काग़ज़ निकल आएगा।
मैं दौड़ा। बीच में पहुँचा।
"कौन सफ़ेद कुर्ते वाला?"
"वही जो सुबह-सुबह वार्ड में घूमता है! मेरे पति को स्ट्रेचर पर लिटाकर ले जा रहा था, मैंने रास्ता रोका तो बोला — तेरे आदमी को डॉक्टर ने देखा है, अब ये भवानी जी की मर्ज़ी है।"
"आपके पति कहाँ हैं?"
"अंदर। बेड पर। मेरी सास उनके पास बैठी है।"
मैं उसके साथ अंदर गया। स्ट्रेचर वहीं खड़ा था, बेड के पास। आदमी बेड पर था — तीस के आसपास, साँस भारी। और बगल में खड़ी थी सुमन।
सफ़ेद कोट। हाथ में फ़ाइल। आँखें सूजी हुईं।
वो औरत एक पल के लिए रुकी। फिर सुमन को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। फिर सुमन को।
"तुम," उसने कहा। आवाज़ बदल गई। "तुम वही डॉक्टर हो न? जो पैसे लेकर मरीज़ भेजती थी?"
वार्ड में सन्नाटा नहीं छाया — सन्नाटा तो एपिसोडों में छाता है, यहाँ तो इंजेक्शन की गोली गिरने की आवाज़ आई, और नर्स का हाथ रुक गया।
सुमन ने फ़ाइल बंद की। उसने औरत की आँखों में देखा। एक पल भी नहीं हटी।
"हाँ," उसने कहा। "मैं वही हूँ।"
मैं आगे बढ़ा।
"पर ये डॉक्टर आज खुद गवाही देने जा रही है," मैंने कहा। "तहसील में। राजेंद्र साहब के सामने। ताकि आपके जैसे लोगों के साथ जो हुआ, वो सबके सामने आए। जो नाम इसने भेजे, वो सब बाहर आएँगे।"
औरत ने सुमन को देखा। उसका हाथ जो अभी मुक्का बना हुआ था, खुल गया।
"तुमने मेरे पति को नहीं भेजा?"
"नहीं," सुमन ने कहा। "पर मैंने कई औरों को भेजा। पाँच साल में। मुझे मालूम था कि वहाँ क्या होता है। और मैं चुप रही।"
वार्ड में जो औरतें पर्दों के पीछे खड़ी थीं, उन्होंने सिर उठाया। नर्स ने सुई खोलना भूल गई।
वो औरत सुमन के पैरों की तरफ़ झुकी। सुमन ने उसे कंधों से पकड़ लिया और उठा दिया।
"मेरे पैर मत पकड़िए," सुमन ने कहा। "मुझे अपने पैरों पर खड़ा रहने दीजिए। कल मुझे खड़ा होकर बोलना है।"
औरत रो रही थी। उसने सुमन का हाथ पकड़ा। सुमन ने हाथ नहीं छुड़ाया।
मैं बाहर आया, गलियारे में। दीवार के सहारे खड़ा हुआ। मेरी जेब में टोकन ठंडा था।
मुझे समझ आ गया। "सुमन" का मतलब ये नहीं था कि मुझे सुमन को बचाना है। सुमन को कोई ख़तरा नहीं था। मतलब ये था कि सुमन आज उस रास्ते पर टिकी रहे जो उसने खुद चुना है। अगर मैं आज उसे ये कहकर रोक देता कि "तुम मत जाओ, मैं सब सँभाल लूँगा" — तो हिसाब फिर किसी और पर बैठ जाता।
टोकन किसी को बचाने के लिए नहीं कहता। टोकन कहता है — आदमी को उसकी जगह पर खड़ा रहने दे।
सुमन बाहर आई। हाथ में फ़ाइल।
"भवानी का आदमी स्ट्रेचर लेकर आया था," उसने कहा। "मैंने देखा नहीं था। मैं अंदर रिपोर्ट लिख रही थी।"
"अब?"
"अब जो भी आएगा, इस वार्ड में घुसने से पहले मेरा हस्ताक्षर लेगा।" उसने फ़ाइल मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये सोहन के काग़ज़ हैं। और रामकिशन की गवाही का ड्राफ़्ट। राजेंद्र ने कहा था — आज सुबह नौ बजे।"
"शेखर बाबू?"
"उनका फ़ोन नहीं उठ रहा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"सुबह छह बजे से?"
"छह बजे से।" उसने कहा। "और उनकी गवाही अदालत में सबसे पहली है — साढ़े नौ बजे। मेरी उनके बाद।"
मैं गलियारे के आख़िर तक गया। बाहर की ओर देखा। सड़क के उस पार, बस स्टैंड के पास, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। बोनट पर धूल। खाली।
"सुमन," मैंने कहा। "तुम अंदर जाओ। दरवाज़ा बंद करो। मैं शेखर बाबू को लेकर आता हूँ।"
"अकेले?"
"बंसी बाहर है।" मैंने कहा। "और एक और आदमी है, जो खुद को पहरा कहता है। मुझे लगता है आज वो मेरे साथ चलेगा।"
वो हाँ में सिर हिलाने ही वाली थी कि गेट पर शोर फिर उठा। इस बार किसी औरत की आवाज़ नहीं थी। एक आदमी की आवाज़ थी, ऊँची, घबराई हुई।
"मुझे मनोहर से मिलना है! मनोहर! मेरे पापा को उठा लिया है!"
मैं दौड़ा।
गेट पर एक लड़का खड़ा था — सोलह-सत्रह का, दुबला, मुँह पर धूल, आँखों में पानी। रवि। रामकिशन का पोता।
"रवि?"
"पापा कह रहे थे कि आज गवाही देंगे," वो हाँफते हुए बोला। "रात को दो आदमी आए। सफ़ेद कुर्ता। उन्होंने पापा को उठाया और गाड़ी में डाल दिया। दादी चिल्लाई तो एक ने कहा — 'गवाही के दिन वो तहसील नहीं, हमारे साथ जाएगा।'"
मेरा हाथ मुट्ठी में बंध गया।
"कौन सी गाड़ी?"
"सफ़ेद। पुरानी। और उस पर…" वो रुका।
"क्या?"
"उस पर एक निशान था। दो लकीरें, और नीचे एक बिंदु। उलटा।"
उलटा कोना-चिह्न।
टोकन एक बार फिर गरम हुआ। मैंने निकाला। उस पर नया शब्द नहीं था। अंक बदल गया था — आठ हज़ार से नीचे चला गया था, छह हज़ार।
मैंने टोकन को मुट्ठी में भींचा।
"सुमन," मैंने कहा। "तुम अंदर जाओ। रवि को अंदर ले जाओ। किसी को भी अंदर मत आने देना।"
"तुम कहाँ जा रहे हो?"
"शेखर बाबू के घर। अगर वहाँ भी सफ़ेद कुर्ते वाले पहुँच गए, तो आज अदालत में गवाह एक भी नहीं बचेगा।"
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