The Token System – Chapter 802
मजिस्ट्रेट ने टोकन देखा, कोना-चिह्न देखा, और पीछे बैठे आदमी की तरफ़ फिर नहीं देखा। बोले, “ये टोकन केस की नंबर एक सामग्री है। इसे ज़ब्त किया जाता है।”
मेरे पीछे किसी ने धीरे से कहा — “और यह सामग्री भवानी के ख़िलाफ़ झूठी है।” वो सफ़ेद कुर्ते वाला था। वो उठा, और मेज़ के सामने आ गया। “जिसने भी यह टोकन बनवाया है, वो अदालत को गुमराह कर रहा है।”
“आप कौन हैं?” मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मैं भवानी जी का वकील हूँ। वो होम के मालिक नहीं, संचालक हैं। उनका नाम इस तरह मत घसीटिए।”
सुमन ने काग़ज़ उठाया। “तो आप यह बता सकते हैं कि भवानी के पिछले दफ़्तार में जो फ़तेह मोहम्मद नाम का आदमी बैठता है, वो कौन है?”
वकील एक पल रुका। उसका रूमाल थोड़ा खिसक गया। नीचे की तरफ़ मुँह का एक कोना दिखा — और उस कोने पर एक पुराना निशान था।
काकी उठ खड़ी हुई। “ये वही है।”
सारी नज़रें उसकी तरफ़ गईं।
“ये वही आदमी है,” काकी ने कहा, आवाज़ काँप रही थी पर रुकी नहीं, “जो मेरे पति के ज़माने में हमारी ज़मीन के काग़ज़ लेने मेरे घर आया था। मैंने तब इसे नहीं पहचाना, मुँह पर रूमाल था। पर ये निशान —” उसने उँगली उठाई, “— ये मुझे याद है। मेरे पति ने इसी निशान को देखकर कहा था — ‘ये आदमी कभी सीधा काम नहीं करता।’”
वकील ने रूमाल नीचे कर दिया। बाज़ुओं में सन्नाटा। उसने मजिस्ट्रेट की तरफ़ देखा, फिर कहा, “मैं वकील हूँ, मजिस्ट्रेट साहब। मेरी पहचान से केस नहीं बदलता।”
“ठीक है,” मजिस्ट्रेट ने कहा। “पर तुम्हारी पहचान के साथ ये भी जुड़ गया है कि तुम भवानी के पिछले दफ़्तार के पुराने कर्मचारी रहे हो। तुम इस केस के गवाह नहीं हो सकते। तुम खुद जाँच के दायरे में हो।”
वकील रुका। फिर एक कदम पीछे हटा। “मैं ये केस नहीं लड़ूँगा।” वो मुड़कर चलने लगा।
“रुकिए,” मैंने कहा। वो नहीं रुका।
मैं उसके पीछे दरवाज़े तक गया। बाहर बरामदे में उसने अपना रूमाल सीधा किया और मेरी तरफ़ देखा। “बेटा, तू बहुत आगे निकल गया है।”
“आपने और आपके ऊपर वाले ने मेरे भतीजे को उस अस्पताल में पहुँचाया था। क्यों?”
वो हँसा — हल्की, सूखी हँसी। “क्योंकि वो बच्चा मर गया होता, तो कहानी यहीं ख़त्म होती। ज़िंदा रहा, तो कहानी चलती है। कहानी चलती है, तो हिसाब बराबर होता है।”
“किसका हिसाब?”
“तेरे टोकन का। तू नहीं जानता कि तेरे हाथ में क्या है। वो टोकन तेरा नहीं, बापू का था। और बापू ने उसे किसी से छीनकर रखा था।”
“किससे?”
वो पीछे मुड़ा, बरामदे की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। “जब जानना हो, तो भवानी से पूछ। वो उस दिन अस्पताल में मौजूद थी जिस दिन ये सब शुरू हुआ था।”
फिर वो सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ चला गया। मैंने उसे जाने दिया। रघुवीर मेरे पीछे आया। “पकड़ें?”
“अभी नहीं। उसके ऊपर वाले को पकड़ना है।” मैंने रघुवीर की तरफ़ देखा। “भवानी के पिछले दफ़्तार का हिसाब किताब मुझे चाहिए। पुरानी एंट्री, पुराने लोग, पुरानी तारीख़ें।”
“कौन देगा?”
“शेखर बाबू।”
हम तहसील के बाहर निकले। सफ़ेद गाड़ी अब भी वहीं थी। ड्राइवर के दरवाज़े का शीशा खुला था और अंदर कोई नहीं था। मगर गाड़ी की छत पर कुछ रखा था — एक छोटा गत्ते का डिब्बा। मैंने उसे उतारा। डिब्बे में पुरानी फोटो थी। फोटो में भवानी, जवान, एक सफ़ेद कोट में बैठी थी — बगल में एक आदमी, जिसके हाथ में वही टोकन था जो अभी मेरी जेब में है। और उस फोटो के पीछे, एक तारीख़ लिखी थी — पच्चीस साल पुरानी — और नीचे बस एक लाइन: “जिस दिन बापू गए।”
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैं अस्पताल लौटा। छोटू अब बैठकर खेल रहा था — काकी के बैग से एक पुराना खिलौना निकालकर। उसके गाल लाल थे। मुझे देखते ही बोला, “मामा, आज मैं घर चलूँगा।”
“डॉक्टर से पूछकर चलेंगे।”
काकी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर बैग खोला। उसने एक पुरानी तह की हुई काग़ज़ निकाली। “ये मेरे काग़ज़ हैं। मैंने सोचा, आज नहीं तो कल तो देने ही होंगे।”
मैंने वो काग़ज़ खोला। ज़मीन की असली दस्तावेज़। और उनके साथ एक पुरानी रसीद — जिस पर फिर वही कोना-चिह्न बना था। “काकी, ये रसीद किसने दी थी? कहीं आपके पति ने कर तो नहीं दिया था?”
काकी ने रसीद गौर से देखी। “ये रसीद मुझे उस दिन दी गई थी जब मैंने ज़मीन के काग़ज़ खरीदे थे। मुझे लगा ये कर की रसीद है। मगर देख…” उसने रसीद के नीचे उँगली रखी, “— यहाँ लिखा है ‘फ़तेह मोहम्मद’।”
मैंने रसीद हाथ में ली। उस पर कोना-चिह्न मेरे हाथ में गरम हो गया, जैसे टोकन ने उसे पहचान लिया हो। मैंने टोकन जेब से निकाला और उस रसीद के साथ रखा। दोनों चिह्न एक जैसे थे — कोई उन्हें बना रहा था, कोई उन्हें हमारे बीच छोड़ रहा था।
सुमन वार्ड में आई। “शालिनी आ गई है।”
शालिनी अंदर आई। उसकी आँखों में नींद नहीं थी, चेहरे पर एक अजीब-सी सफ़ेदी। “मन्नू, ये सुन। उस रात मैं ड्यूटी पर थी। वो विमला की शिफ़्ट थी, जिसे बाद में नौकरी से निकाल दिया गया। पर उस रात छोटू को भर्ती करने से पहले, एक आदमी वार्ड में आया था — सफ़ेद कोट में नहीं, सफ़ेद कुर्ते में। उसने मुझसे रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने को कहा। ‘बस एक फ़ॉर्म, बाद में भर लेना।’ मैंने कहा, मैं सिर्फ़ देखने आई हूँ। उसने कहा, ‘देखने वालों को कोई नहीं पूछता।’ फिर वो मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे करीब खींचा —” वो रुकी, हाथ ठुड्डी पर रखे हुए, “— और उसकी कलाई पर एक सुनहरी अँगूठी थी। उभरे हुए कोना-चिह्न वाली।”
कमरे में सन्नाटा भर गया। छोटू ने अपना खिलौना रख दिया।
“पर एक बात और,” शालिनी बोली, उसकी आवाज़ अब ज़्यादा साफ़ थी। “उस आदमी की जेब से एक फ़ाइल गिरी थी। मैंने उसे उठाया। उस पर नाम लिखा था — ‘बापू।’ मैंने पूछा, ‘ये किसकी है?’ वो झपटकर उसने फ़ाइल छीन ली और बोला, ‘ये मेरे पिता की थी। अब मेरी है।’”
“वो पीली अँगूठी वाला,” मैंने कहा।
“हाँ। और उसने यह भी कहा — ‘ये फ़ाइल में एक भी काग़ज़ पढ़ा गया, तो सब ख़त्म हो जाएगा।’”
मैंने काग़ज़ उठाया। रसीद, टोकन, फोटो। तीनों के चिह्न मुझे देख रहे थे। मैं बाहर बरामदे में आया। रघुवीर वहीं था।
“पता लगा,” मैंने कहा। “उसकी अँगूठी पर चिह्न है। वो भवानी का आदमी नहीं, बल्कि भवानी का ऊपर वाला है। और वो बापू का बेटा है। जिस दिन बापू गए, उस दिन से ये सब शुरू हुआ।”
“तो कहानी कहाँ से शुरू हुई?”
“भवानी से। और भवानी उस दिन अस्पताल में
॥
सुबह नौ बजे अदालत का आँगन भरा हुआ था। पुलिस की दो गाड़ियाँ, अख़बार वाले, सफ़ेद कुर्ते — और बीच में भवानी सिंह मुंडेर की तरफ़ पीठ करके खड़ा, पीछे से हथकड़ी की ज़ंजीर दिख रही थी।
मैं सामने की बेंच पर बैठा था। बगल में माँ, रीना और काकी। छोटू को सुमन के भरोसे वार्ड में छोड़ आए थे।
हरीश चंद्र जी अपनी मेज़ से उठे। उनके हाथ में मोटी लाल जिल्द की बही थी और एक बंद पीली फ़ाइल।
“जज साहब,” उन्होंने चश्मा ऊपर सरकाया, “पहले बही। ये वो बही है जो भवानी जी के दफ़्तार से बरामद हुई। पहला पन्ना — हरि सिंह। पिछला पन्ना — भवानी सिंह। बीच में एक नाम काटा हुआ है, जो कमला देवी का निकला।”
जज ने बही अपनी तरफ़ खींची। पन्ने पलटे। कमरे में सिर्फ़ काग़ज़ की आवाज़ थी।
“यह हिसाब भवानी सिंह का है?”
भवानी ने बही की तरफ़ नहीं देखा। उसने अपने जूते की नोक देखी, फिर दीवार।
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