The Token System – Chapter 80
"भवानी साहब बीमार नहीं हैं, भाई।" ढोलू ने अपनी शर्ट की कालर ठीक की। "वो अदालत से बचने के लिए बीमार हैं। पाँच दिन में उन्हें हवेली खाली करनी है। और उसी हवेली में वो काग़ज़ है जो तेरे पापा ने छुपाया — नहीं, माफ़ कर, जो तेरे पापा ने कभी भवानी को दिया ही नहीं। भवानी का असली डर वो काग़ज़ है, दुकान नहीं।"
कम्मो ने बही खोली और उसकी एक पर्ची निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाई। "मन्नू, यह पढ़। हरि सिंह की लिखाई — 'दीवार में ईंट के दो पाट हैं। पहला झूठा। दूसरा सच्चा। बाहर वाला सब देखें, भीतर वाला कोई न देखे।'"
मैंने ढोलू की तरफ़ देखा। "तू अंदर आ। अभी।"
वह हिचका। पहली बार उसकी आँखों में वो आराम नहीं था। "मैं अंदर आऊँ, तो मेरी ज़िंदगी में क्या बचेगा?"
"तेरी ज़िंदगी में पहले से कुछ नहीं बचा," मैंने कहा। "पंद्रह साल से तू उस आदमी की बीड़ी पी रहा है। अंदर आ।"
वह अंदर आया। सीढ़ी फिर लगी, पर इस बार बंसी नहीं चढ़ा। मैं चढ़ा। मैंने पहली ईंट निकाली, फिर दूसरी — और इस बार प्लास्टर नहीं गिरा। एक लोहे का छोटा डिब्बा गिरा, हाथ भर का, जिस पर ज़ंग की परत जमी थी। उसे खोलने में मुझे अपने नाखून टूटने का डर लगा, तो मैंने कम्मो की सलाई माँगी।
डिब्बे में एक तह किया हुआ काग़ज़ था, पुराना, पीला, किनारों से फटा। और उसके साथ एक छोटी पर्ची, जिस पर पापा की लिखाई में सिर्फ़ तीन शब्द थे — "मन्नू, माफ़ करना।"
मैंने काग़ज़ खोला। ज़मीन का नक्शा था, मुहर लगी हुई, और नीचे दो हस्ताक्षर — एक भवानी के पिता का, एक हमारे पापा का। और बगल में एक लाइन, जो किसी और ने बाद में जोड़ी थी — "यह ज़मीन बेची नहीं जा सकती। यह गिरवी नहीं रखी जा सकती। यह सिर्फ़ उसी को दी जाए जो इसका हक़दार हो।"
माँ ने काग़ज़ देखा और कुछ नहीं बोली। उसने सिर्फ़ अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और फिर कमरे से बाहर चली गई। मैंने उसे रोका नहीं।
ढोलू ने काग़ज़ देखा और उसकी आँखें भर आईं। "भवानी साहब इसे पंद्रह साल से ढूँढ रहे हैं," उसने कहा। "उन्हें लगता था तेरे पापा ने इसे कहीं शहर में रख दिया है। उन्हें कभी अंदाज़ा नहीं हुआ कि यह उन्हीं की दीवार में है।"
"क्योंकि उन्होंने कभी अपनी दीवार नहीं देखी," मैंने कहा। "उन्होंने हमेशा दूसरों की दीवारें देखीं।"
तभी बाहर फिर दौड़ते कदमों की आवाज़ आई। छोटू। इस बार वह दरवाज़े पर रुका भी नहीं, सीधे अंदर घुस आया और सीढ़ी से नीचे मेरी तरफ़ देखकर बोला:
"मन्नू भैया, फाटक पर वो सफ़ेद शर्ट वाला खड़ा है।"
मैंने ढोलू की तरफ़ देखा। ढोलू मेरे ठीक सामने खड़ा था।
"फिर वो कौन है?" मैंने पूछा।
"वही," छोटू ने कहा, "जो भवानी की गाड़ी चलाता है। असली वाला। मैंने उसे तीन बार देखा है। और वो अभी फाटक पर खड़ा है, और उसके हाथ में एक सीढ़ी है।"
॥
सीढ़ी उसके हाथ में थी, पर वह उसे लेकर अंदर नहीं आया। वह फाटक पर खड़ा रहा, बस खड़ा रहा, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा अपने आप खुलने का इंतज़ार कर रहा हो।
मैं गली में निकला। दोपहर का सूरज सिर पर था और सामने खड़ा आदमी सत्तर के पार का लग रहा था — झुकी कमर, सफ़ेद शर्ट जो कभी सफ़ेद रही होगी, अब पीली पड़ चुकी थी, और हाथ में एक पुराना लिफ़ाफ़ा जिसके किनारे मुड़े हुए थे।
"तू ढोलू नहीं है," मैंने कहा।
"नहीं साहब।" उसने सीढ़ी ज़मीन पर रख दी। "मैं हरदेव हूँ। भवानी साहब के पापा की गाड़ी चलाता था।"
पीछे से बंसी आ गया था। उसने उस आदमी को देखा और उसका मुँह खुला रह गया। "अरे… तू ज़िंदा है? मैंने सुना था तू बीस साल पहले गाँव चला गया।"
"चला गया था।" हरदेव ने मेरी तरफ़ देखा। "पर जो देखा था, वो साथ ले गया। और वो चीज़ बीस साल से मेरे गले में अटकी है।"
मैंने उसे अंदर बुलाया। वह दरवाज़े पर रुका — कमरे में कदम रखने से पहले उसने जूते उतारे और फिर फर्श को छूकर माथे पर लगाया। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा।
वह चौकी पर बैठा। लिफ़ाफ़े को दोनों हाथों से घुटनों पर रखा और उसे सीधा किया, जैसे कोई बहुत पुराना तीर सीधा कर रहा हो।
"बीस साल पहले," उसने शुरू किया, "मैं भवानी साहब के पापा की गाड़ी चलाता था। ठाकुर हुकुम सिंह की। उनके साथ बारह साल रहा। जब वो बीमार पड़े, तो उन्होंने गाड़ी की चाबी अपने बेटे को दी — भवानी साहब को — और मुझे कहा, 'हरदेव, इसके साथ रहना। यह ज़मीन के काम में बड़ा हो रहा है।'"
"बड़ा हो रहा था," बंसी ने कहा, "या वो हो रहा था जो बाप नहीं चाहता था?"
"दोनों," हरदेव ने कहा। "चाबी मिलते ही भवानी साहब ने गाड़ी रोज़ निकालनी शुरू कर दी। बाप मना करता, यह कहता, 'बेटा, हिसाब लिखकर रखा कर।' पर भवानी साहब कहते, 'हिसाब काग़ज़ में लिखते हैं, चलते-फिरते नहीं।'"
उसने पानी माँगा। माँ ने बाहर से आकर एक गिलास रख दिया और चली गई। हरदेव ने गिलास देखा और उसकी आँख टूट गई।
"उस दिन," उसने गिलास नीचे रखा, "मैं पीछे बैठा था। भवानी साहब खुद स्टीयरिंग पर थे। रात के आठ बजे थे। शहर से बाहर वाली सड़क पर, हवेली के जाने वाले मोड़ के पास। सामने एक आदमी खड़ा था, हाथ हिला रहा था। मैंने देखा — काग़ज़ वाला आदमी था। कन्हैया माली। तेरे पापा।"
मेरे हाथ जेब में चले गए। टूटे कोने ने उँगली के नीचे ठंडा निशान छोड़ा।
"मैंने कहा, 'साहब, रोक दो।' भवानी साहब ने गाड़ी रोकी नहीं। उन्होंने गाड़ी तेज़ की। और मैंने —" उसकी आवाज़ टूटी, फिर जम गई, "मैंने पीछे से स्टीयरिंग पर हाथ नहीं डाला। बस पीछे बैठा देखता रहा।"
कमरे में कोई नहीं बोला। छोटू दरवाज़े के पास खड़ा था, उसका मुँह खुला था। बंसी ने उसे पकड़कर बाहर कर दिया — "जा, चाय की पत्ती ले आ।"
"गाड़ी के नीचे काग़ज़ आ गया था," हरदेव ने आगे कहा। "तेरे पापा गाड़ी के नीचे फेंके गए थे, और उनके हाथ में काग़ज़ का बंडल था जो खुल गया था। भवानी साहब उतरे, काग़ज़ उठाया, देखा — और मैंने उन्हें पहली बार डरा हुआ देखा। उन्होंने काग़ज़ को पीछे फेंका अपनी जेब में और गाड़ी फिर शुरू कर दी।"
"और तेरे हिस्से में क्या आया?" मैंने पूछा।
"मेरे हिस्से में गाड़ी आई।" उसने सीधा मेरी तरफ़ देखा। "और एक पर्ची। जो गाड़ी के नीचे, पहिये के पास पड़ी रह गई थी। भवानी साहब ने उसे उठाना भूल गए।"
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें से एक पुरानी तह की हुई परची निकली और एक छोटी सी फोटो — पीली, फीकी, किनारे से जली हुई। उसने फोटो पहले मेरी तरफ़ बढ़ाई।
फोटो में गाड़ी खड़ी थी। रात का अंधेरा था, फोटो किसी पुराने कैमरे से खींची गई थी, और गाड़ी के बोनट के पास एक आदमी खड़ा था — भवानी सिंह। उम्र कम, बाल घने, और उसके बगल में गाड़ी का दरवाज़ा खुला था। और गाड़ी के आगे की तरफ़ ज़मीन पर… एक नीला सा कुछ दिख रहा था। ज़मीन पर पड़ी किसी चीज़ का कोना।
"मैंने यह फोटो उस रात ही खींची थी," हरदेव ने कहा। "बीस साल से जेब में रखी है। भवानी साहब को पता है कि केवल एक ही आदमी इस रात को जानता है — मैं। इसलिए मुझे को उन्होंने गाँव में ही बना दिया। गाड़ी की नौकरी छुड़ा दी, गाँव में ज़मीन दिलवा दी, पेंशन भिजवाते रहे। मैं चुप रहा। बीस साल।"
उसने पर्ची खोली। छोटी सी, पीली, मुड़ी हुई, भवानी की साफ़-सुथरी लिखाई में — "इसका हिसाब मेरे बेटे पर।"
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