The Token System – Chapter 783
बूढ़े ने अपनी टोपी उतारी और डंडे पर टिका दी। “तो आज वो दराज़ भी खुलेगा,” वो बोला। “पर पहले मुझे यह बता — तेरी तिजोरी का तीसरा हिस्सा तेरे पास है या भवानी के पास?”
सबकी नज़र भवानी पर गई। उसने अपना सफ़ेद कुर्ता सीधा किया और बोला, “मेरे पास सिर्फ़ वही है जो रामदीन ने दिया था। और रामदीन ने मुझे सब दिया था।”
“सब नहीं दिया,” रामदीन ने कहा। उसकी आवाज़ इस बार भारी थी। “मैंने तुझे हवेली दी, अपना नाम दिया, अपना हाथ दिया। पर मेरी तिजोरी का तीसरा हिस्सा मैंने आज तक नहीं दिया। और आज जब देने का वक़्त आया, तो मुझे यह भी नहीं पता कि वो कहाँ है।”
हरीश चंद्र ने अपनी फाइल बंद की। “तो यह साफ़ है,” वो बोले। “तिजोरी बिना तीसरे हिस्से के नहीं खुलेगी। और जब तक तिजोरी नहीं खुलेगी, हवेली का हिसाब अदालत के सामने नहीं आएगा। मेरी सलाह है — सब अपनी जगह पर रुकें।”
“नहीं,” मैंने कहा। सब मेरी तरफ़ देखने लगे। “तिजोरी खुलेगी। तीसरा हिस्सा मेरे पास है।”
मैंने जेब से भवानी का दिया लिफ़ाफ़ा निकाला, उसका तीसरा पन्ना — पापा की लिखाई वाला। उसे खोलकर मैंने हरीश चंद्र की तरफ़ बढ़ा दिया।
“यह पापा की लिखाई है,” मैंने कहा। “और यह पन्ना कहता है कि तिजोरी का तीसरा हिस्सा पापा ने खुद छिपाया था — रामदीन की मर्ज़ी के बिना नहीं, रामदीन की मर्ज़ी से। और उसका निशान यह अंगूठी है।”
रामदीन ने पन्ना पढ़ा। उसके हाथ फिर काँपे। उसने पन्ना मुझे वापस दिया और घुटनों पर हाथ रखकर थोड़ा झुका।
“तो तूने मेरे पापा से मिलवाया,” उसने कहा, “इससे पहले कि मैं उनसे मिल पाता।”
“तू अभी भी मिल सकता है,” मैंने कहा। “पर पहले तिजोरी खुलेगी।”
विक्रम ने चाबी आगे बढ़ाई और मैंने अंगूठी उँगली से उतारकर उसके पास रखी। तीनों चीज़ें — चाबी, अंगूठी और पन्ना — एक ही थाली में रखे गए, जो रीना ने जल्दी से पास की मेज़ से उठाकर लाई थी। बूढ़े ने तीनों पर हाथ रखा और आँखें बंद कीं।
“अब चलो,” उसने कहा। “तिजोरी खुलेगी। और आज जो खुलेगा, वो सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होगा।”
हम सब सीढ़ी की तरफ़ बढ़े। मेरे पीछे रीना ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, “मन्नू, माँ का काग़ज़ अब तेरे पास है। और अंगूठी तेरी उँगली से उतर गई है। तेरा हिसाब अब शुरू हो रहा है।”
मैंने सीढ़ी की पहली पायदान पर पैर रखा और पीछे मुड़कर देखा। आँगन में भवानी खड़ा था, हाथ खाली, और विक्रम उसके सामने — दोनों के बीच एक दरवाज़े की दूरी।
और तभी मेरी जेब में टोकन हल्का सा ठंडा हुआ, जैसे किसी ने उसे अपनी उँगली से छुआ हो। मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन पर कोई नया शब्द नहीं था। पर उसकी सतह पर उभरी लकीरें कुछ ज़्यादा गहरी लग रही थीं, जैसे उसने आज की धूप में खुद को तैयार कर लिया हो।
जैसे ही मैंने सीढ़ी की दूसरी पायदान पर पैर रखा, ऊपर से किसी के भागने की आवाज़ आई। दौड़ते कदम, फिर लकड़ी के फ़र्श पर कुछ भारी गिरा।
“ऊपर कोई है,” मैंने कहा और सीढ़ियाँ दो-दो करके चढ़ने लगा।
पीछे से माँ कौशल्या की आवाज़ आई, “मन्नू, ठहर! अंधेरे में मत जा।” पर मैं नहीं रुका। ऊपर की गैलरी में पहुँचकर मैंने बिजली का बटन दबाया। पुरानी लाइनें गुनगुनाईं, फिर पीली रोशनी फैल गई।
गैलरी के आख़िरी कोने में, फर्श पर एक कमरा खुला पड़ा था — वो कमरा जो इतने सालों से बंद था। उसका दरवाज़ा टूटा हुआ था, जैसे किसी ने ज़ोर लगाकर खोला हो। और दरवाज़े के पास फर्श पर पड़ा था — एक टूटी ईंट और एक जोड़ी चप्पल।
वो चप्पल भवानी की थीं। मैंने उन्हें तुरंत पहचान लिया, वही सफ़ेद रबर वाली, जो हर रोज़ आँगन की मुंडेर पर पड़ी रहती थीं।
“भवानी काका!” मैंने नीचे से आवाज़ दी, पर कोई जवाब नहीं आया।
पीछे से विक्रम भी चढ़ आया, हाँफता हुआ। “मैंने देखा,” वो बोला, “वो ऊपर भागा। मैंने सोचा तू अब तक पहुँच गया होगा।”
मैंने कमरे में झाँका। अलमारी के दरवाज़े खुले थे, काग़ज़ बिखरे पड़े थे। एक पुरानी मेज़ की दराज़ खींची हुई थी, और उसके अंदर से अब भी कुछ निकालने की आवाज़ आ रही थी।
भवानी खिड़की की तरफ़ मुँह किए खड़ा था, हाथ में कुछ पकड़े हुए। वो पलटा। उसके चेहरे पर पसीना था और आँखों में वो डर, जो मैंने पहले कभी उस पर नहीं देखा था।
“काका, यह क्या कर रहे हो?” मैंने पूछा।
“यह सब मेरा है,” वो बोला, आवाज़ काँप रही थी। “रामदीन ने मुझे हवेली दी थी। इस हवेली में जो है, वो मेरा है। यह काग़ज़ भी मेरे हैं।”
“मुझे दिखाओ,” मैंने हाथ बढ़ाया।
भवानी ने काग़ज़ पीछे छिपा लिए, पर विक्रम पहले ही उसके पीछे पहुँच चुका था। उसने भवानी का हाथ पकड़ा। दोनों के बीच धक्का-मुक्की हुई और काग़ज़ फर्श पर गिर गए।
मैंने झुककर उठाए। वो तीन पुरानी रसीदें थीं और एक पीली लिफ़ाफ़ा। रसीदों पर रामदीन का दस्तख़त था, पर एक रसीद पर हरी स्याही से कुछ और भी लिखा था — “भवानी के नाम, पर शर्त के साथ।”
“यह क्या शर्त है?” मैंने पूछा।
भवानी ने मुँह फेर लिया।
“बता काका,” मैंने कहा। “शर्त क्या थी?”
“शर्त यह थी,” नीचे से रामदीन की आवाज़ आई, जो अब सीढ़ियों के आधे रास्ते तक पहुँच चुका था, “कि हवेली भवानी के नाम रहेगी, पर तिजोरी का हिसाब मेरे नाम रहेगा। जिस दिन भवानी तिजोरी को बिना मेरे हिसाब के खोलेगा, उस दिन हवेली मेरी वापस आ जाएगी।”
भवानी ने पलटकर देखा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। “तूने यह शर्त कभी नहीं बताई!”
“तूने कभी पूछा नहीं,” रामदीन ने कहा और ऊपर आ गया। “मैंने तुझे हवेली दी, ताकि तू मेरे बेटे की तरह रहे। पर तू मेरी तिजोरी का पीछा करने लगा। तूने सोचा, तिजोरी भी हवेली के साथ आ गई। नहीं आई। तिजोरी का हिसाब आज तक मेरे हाथ में था।”
“तो यह सब मैंने सुना था,” रीना ने भी ऊपर आकर कहा। “यही वजह है कि भवानी काका ने मुझे ऊपर भेजा कि चाबी का पता करूँ। उन्हें पता था कि अगर तिजोरी खुली, तो शर्त खुलेगी।”
भवानी ने रीना की तरफ़ देखा, फिर ज़मीन की तरफ़। “मैंने सोचा था, सब भूल जाएँगे। रामदीन चला गया था। कोई नहीं आने वाला था।”
“पर मैं आ गया,” रामदीन ने कहा। “और अब बता, तेरे पास जो भी है, वो मेरी मर्ज़ी से है या अपनी?”
नीचे से माँ कौशल्या की आवाज़ आई, “अब बहुत हो गया। सब नीचे आओ। तिजोरी आँगन में ही खुलेगी, सबके सामने।”
हम सब नीचे उतरे। आँगन में बूढ़ा अब भी थाली के पास खड़ा था, तीनों चीज़ें जैसे की तैसी रखी थीं। हरीश चंद्र ने अपनी कुर्सी खींचकर आँगन के बीच लगा दी और अपना बैग खोलकर कुछ काग़ज़ निकाले।
“मेरे पास भवानी के नाम की रसीद की कॉपी है,” वो बोले। “अगर शर्त का ज़िक्र सही है, तो रसीद के पीछे वो लिखा होना चाहिए।”
“लिखा है,” भवानी ने धीमी आवाज़ में कहा। “मैंने पढ़ा था। पर पढ़कर भूल गया।”
मैंने पीली लिफ़ाफ़ा खोला। उसके अंदर एक छोटी चिट्ठी थी, रामदीन की लिखाई में — “भवानी, अगर तू यह पढ़ रहा है, तो मतलब मैं नहीं हूँ। हवेली तेरी, पर तिजोरी मन्नू के हाथ में। उसका हिसाब वो खुद देगा।”
मैंने चिट्ठी सबको सुनाई। भवानी ने अपना सिर पकड़ लिया और आँगन की मुंडेर पर बैठ गया।
“मैंने बीस साल यह सोचकर काट दिए,” वो बोला, “कि यह हवेली मेरी है। और यह लिफ़ाफ़ा हमेशा उस दराज़ में पड़ा रहा, जिसकी चाबी मेरे पास थी।”
“चाबी तेरे पास थी,” रामदीन ने कहा, “पर पढ़ने की हिम्मत नहीं थी।”
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