The Token System749 / 1154

The Token System – Chapter 749

7 min read November 6, 2026

रघुवीर ने बीच में हाथ डाला। "बहस बाद में। पहले हमें छत तक पहुँचना है — बिना पकड़े गए। और उसके लिए एक ही रास्ता है।"

"कौन सा?" बंसी ने पूछा।

"वो जो सुखराम ने बताया — हवेली के पीछे वाला पुराना कुआँ। उसकी सुरंग दीवार तक जाती है। दीवार के पीछे एक दरवाज़ा है, जो सीधे पहली मंज़िल से छत तक ले जाता है।"

मैंने टोकन जेब में रखा और सबको सुरंग में वापस जाने का इशारा किया।

"चलो — छत।"

हम वापस मुड़े। और तभी पीछे से आवाज़ आई — किसी के भागने की, पत्थरों पर पैरों की।

रघुवीर ने पीछे देखा और उसका चेहरा सफ़ेद हो गया।

"भवानी के आदमी सुरंग के दूसरे छोर पर पहुँच गए हैं। हमारे पास दो घंटे भी नहीं हैं।"

मैंने रुककर सबको देखा।

"तो फिर तेज़ चलो। और एक बात — टोकन ने कहा है 'छत'। छत तक पहुँचने के बाद ही हम रुकेंगे।"

हम सब सुरंग में भागे। लक्ष्मी की टॉर्च की रोशनी दीवारों पर काँप रही थी, और पीछे से आवाज़ें आ रही थीं — लाठियों के पत्थरों पर लगने की, और भवानी के आदमियों के गुर्राने की।

कुँवर ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "मन्नू — अगर आज रात कुछ हो जाए, तो मेरी माँ का ख़याल रखना।"

"तू ख़ुद रखना," मैंने कहा। "हम सब बाहर निकलेंगे।"

और सुरंग के आख़िर में दरवाज़ा दिखा — लोहे का, ज़ंग लगा, पर खुला हुआ।

॥

सुरंग का लोहे का दरवाज़ा खुला था, पर मैंने सबको रोक दिया।

"रुको।" मेरी साँस फूल रही थी। "टोकन कुछ कह रहा है।"

मैंने जेब से टोकन निकाला। पीछे से भवानी के आदमियों की आवाज़ें आ रही थीं — पत्थरों पर लाठियाँ, और वो खुरदुरी फुसफुसाहट जो किसी को ढूँढने वाले की होती है।

टोकन पर लकीर के नीचे शब्द उभरा — "कुँवर पहले।"

बंसी ने गर्दन आगे की। "क्या लिखा है?"

"कुँवर पहले।"

बंसी ने माथा पीटा। "अरे, अभी क्या पहले-पहले का वक़्त है? पीछे आदमी आ रहे हैं, और तेरी जेब का मालिक कह रहा है कुँवर पहले?"

"चुप कर।" रघुवीर ने उसका कंधा दबाया।

बंसी फिर भी बड़बड़ाता रहा। "साला, तेरी जेब का मालिक तेरे से ज़्यादा समझदार निकला। हम यहाँ जान बचाने की सोच रहे हैं, और ये कह रहा है सबसे पहले कुँवर को निकालो।"

"तो कुँवर पहले जाएगा," मैंने कहा।

लक्ष्मी ने कुँवर का हाथ पकड़ लिया। "नहीं।"

"माँ—"

"मैंने तुझे सोलह साल पाला है। तेरे बाप की लाश से लेकर आज तक मैंने एक चीज़ नहीं माँगी। आज माँग रही हूँ। तू सबसे आख़िर में जाएगा।"

कुँवर ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — वो चीज़ जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब उसे पहली बार कोई अपना कहता है।

"माँ," वो बोला, "मैं बच्चा नहीं हूँ।"

"मेरे लिए तू है।" लक्ष्मी ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।

रघुवीर ने बीच में हाथ डाला। "बात सुनो। टोकन कह रहा है कुँवर पहले। इसका मतलब ये नहीं कि हम सब पीछे रह जाएँ। इसका मतलब ये है कि कुँवर को उस रास्ते से जाना है जो सबसे सुरक्षित है।"

बंसी ने घूरा। "और वो रास्ता कौन सा है?"

"कुएँ वाला। जो सुखराम ने बताया — हवेली के पीछे का पुराना कुआँ। उसकी सुरंग दीवार तक जाती है, और दीवार के पीछे जो दरवाज़ा है वो सीधे छत तक ले जाता है।"

"तो सब वहीं से जाएँ," मैंने कहा।

"नहीं।" रघुवीर ने सिर हिलाया। "अगर सब वहीं से गए और रास्ता बंद निकला, तो सब फँस जाएँगे। दो हिस्सों में बँटते हैं।"

मैंने सबको देखा। लक्ष्मी कुँवर का हाथ पकड़े खड़ी थी। सुखराम दीवार से टिका हुआ था, उसकी साँस तेज़ चल रही थी। बंसी के हाथ में लाठी थी, जो उसे मंदिर से उठाई थी। रघुवीर के चेहरे पर पसीना था।

"तो ऐसा करते हैं," मैंने कहा। "कुँवर, लक्ष्मी काकी और सुखराम — पहले कुएँ के रास्ते से। रघुवीर भाई, तुम उनके साथ। मैं और बंसी पीछे रुकेंगे, इन आदमियों का ध्यान भटकाएँगे।"

बंसी ने लाठी उठाई। "अब ये ठीक है। मुझे ध्यान भटकाना पसंद है।"

"तू पागल है," रघुवीर ने कहा। "दो आदमी चार आदमियों से नहीं लड़ सकते।"

"लड़ेंगे नहीं," मैंने कहा। "भड़काएँगे।"

सबने एक दूसरे को देखा। सुखराम ने कुछ कहना चाहा, पर खाँसी आ गई।

तभी पीछे से आवाज़ आई — भवानी के आदमी की, गूँजती हुई।

"कुँवर! ठाकुर साहब ने कहा है — तू बाहर आ जा। बाक़ी सबको छोड़ देंगे।"

कुँवर हँसा। वो हँसी सूखी थी। "पहचान लिया," वो बोला। "जब से भवानी को पता चला है कि मैं ज़िंदा हूँ, उसे नींद नहीं आ रही।"

रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। "ये आवाज़ मुझे जानी-पहचानी लगी।"

"किसकी है?"

"पता नहीं। पर ये कोई आम आदमी नहीं।"

मैंने टोकन फिर देखा। शब्द बदल गया था। अब "छत" लिखा था — और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, "दो घंटे"।

"टोकन कह रहा है दो घंटे," मैंने कहा। "हमारे पास दो घंटे हैं। छत तक पहुँचने के लिए।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "तो फिर देर किस बात की?"

हम दो हिस्सों में बँटे। रघुवीर, लक्ष्मी, कुँवर और सुखराम कुएँ की तरफ़ बढ़े, और मैं बंसी के साथ सुरंग के दूसरे मोड़ पर रुक गया — जहाँ से भवानी के आदमी आ रहे थे।

सुरंग तंग थी। मैंने बंसी को इशारा किया और हम दीवार के पीछे दुबक गए।

"देख," बंसी ने फुसफुसाया, "मेरे पास एक तरकीब है।"

"क्या?"

"तू शोर कर। मैं उन्हें उल्टी तरफ़ भगाता हूँ।"

"कैसे?"

"मेरे पास भवानी की आवाज़ की एक रिकॉर्डिंग है। उसने एक बार फ़ोन पर मुझे धमकाया था, और मैंने रिकॉर्ड कर लिया था। उसकी आवाज़ से ये लोग कुत्ते की तरह भागेंगे।"

"तूने भवानी की आवाज़ रिकॉर्ड की हुई है?"

बंसी मुस्कुराया। "मैं चाय बेचने वाला हूँ, मन्नू। सबकी आवाज़ मेरे पास है।"

उसने जेब से पुराना मोबाइल निकाला, उसमें कुछ दबाया, और सुरंग के दूसरी तरफ़ फेंक दिया। धातु के फ़र्श पर मोबाइल खनककर गिरा, और फिर भवानी की आवाज़ गूँजी — "उसे पकड़ो, कहीं जाने मत दो।"

भवानी के आदमी रुक गए। एक ने दूसरे को देखा।

"ठाकुर साहब यहाँ?" एक ने कहा, घबराहट में।

"नहीं — आवाज़ वहाँ से आई—"

वो लोग उस मोबाइल की तरफ़ भागे, और हम दोनों उनके पीछे से निकल गए। सुरंग का मोड़ काटा, फिर खुली जगह, और फिर रघुवीर के बताए हुए रास्ते की तरफ़।

बगीचे की हवा चेहरे पर लगी। हम हवेली की पीछे की दीवार के पास थे।

"कुआँ कहाँ है?" बंसी ने पूछा।

मैंने चारों तरफ़ देखा। पीपल का पेड़, उसके नीचे अंधेरा, और फिर — मिट्टी में एक गोल घेरा जो ईंटों से ढका था।

"वहाँ।"

हम दौड़कर कुएँ के पास पहुँचे। रघुवीर पहले से वहाँ था, लक्ष्मी और कुँवर के साथ। सुखराम ईंटों पर बैठा हुआ था, हाँफ रहा था।

"देर हो गई," रघुवीर ने कहा। "ईंटें भारी हैं।"

"तो हटाओ," मैंने कहा।

"पहले एक बात।" रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। "अगर कुआँ सूखा है और सुरंग बंद है, तो हमें दूसरा रास्ता चाहिए।"

"कौन सा?"

"वही जो तेरे टोकन ने दिखाया — छत। सीधे छत की तरफ़।"

मैंने टोकन देखा। "छत" शब्द अभी भी वहाँ था।

"तो दो रास्ते हैं," मैंने कहा। "कुआँ और छत। हम दोनों आज़माएँगे।"

बंसी ने एक ईंट उठाई। उसके हाथ से छूटकर गिरी और शोर हुआ। सब सकपका गए।

"धीरे," लक्ष्मी ने कहा।

"धीरे-धीरे वक़्त नहीं है, काकी," बंसी ने कहा।

हम ईंटें हटाने लगे। एक, दो, पाँच। कुएँ का मुँह खुलता दिखा — अंधेरा, बंद, और अंदर से ठंडी हवा और सीलन की महक।

रघुवीर ने टॉर्च नीचे डाली। रोशनी दीवारों पर काँपी और फिर गहरे अंधेरे में घुल गई।

"सूखा है," उसने कहा। "तल तक सीढ़ियाँ हैं।"

"उतरो," मैंने कहा।

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