The Token System – Chapter 745
मैं उसके पास पहुँचा। "तो?"
कुँवर ने डिब्बा उठाया। "ये मेरे बाप का है — जिसे तू भवानी का बाप समझता है। इसमें वो काग़ज़ है जो राघव की मौत के बाद लिखा गया। मैं इसे तेरे हवाले करूँगा, पर पहले एक सवाल का जवाब दे।"
"पूछ।"
"तेरे दादा ने राघव को मारा या नहीं?"
मैंने टोकन मुठ्ठी में कसा। वो गरम था, बहुत गरम। पर कोई शब्द नहीं उभरा। जैसे टोकन भी जवाब नहीं जानता।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "और जो नहीं जानता, वो झूठ नहीं बोलेगा।"
कुँवर ने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले। पर याद रख — अगर इसमें तेरे दादा का नाम आया, तो मैं माफ़ नहीं करूँगा।"
मैंने डिब्बा लिया। ढक्कन खोला। अंदर एक पुराना काग़ज़ था, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था — "हिसाब का चौथा हिस्सा — जो किसी नाम पर नहीं, जो हवेली में रहता है उस पर।"
काग़ज़ के नीचे एक और पर्ची थी। उस पर सिर्फ़ एक लाइन — "जो इसे पढ़े, वो जान जाए कि राघव को किसने मारा।"
मेरे हाथ काँपने लगे। कुँवर ने देखा और मुस्कुराया।
"आज रात," उसने कहा। "मंदिर के तहखाने में। अकेला आ। बंसी को मत ला। रामदीन को मत ला। सिर्फ़ तू और मैं।"
"और अगर मैं नहीं आया?"
"तो हिसाब का चौथा हिस्सा हमेशा के लिए बंद हो जाएगा — और तेरे दादा का नाम कभी साफ़ नहीं होगा।"
वो पलटा और गली के मोड़ पर मुड़ गया। तभी मेरी जेब में कुछ हिला। मैंने टोकन निकाला — उस पर नई लकीर उभर रही थी, और नीचे एक शब्द — "डर।"
मैंने काग़ज़ को पलटा। पीछे की तरफ़ एक तारीख़ थी — सोलह साल पहले की, उसी रात की जब राघव मरा था — और उसके नीचे मेरे दादा का नाम, बिलकुल साफ़, किसी के हाथ से लिखा हुआ।
नहीं — किसी ने नहीं लिखा। वो नाम मेरे टोकन पर उभर रहा था, वैसे ही जैसे अभी-अभी किसी ने उसे पढ़कर मेरे कान में कह दिया हो।
"सुखदेव।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने पीछे मुड़कर देखा — रामदीन दूर खड़ा था, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
"मन्नू," उसने कहा। "वो काग़ज़ फेंक दे। अभी।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो झूठ है।" उसने एक कदम बढ़ाया। "जो काग़ज़ कुँवर ने दिया है, वो भवानी के बाप ने लिखवाया था — अपने बेटे को बचाने के लिए। उस पर मेरा नाम नहीं, तेरे दादा का नाम इसलिए लिखा है ताकि हिसाब तेरे घर पर आए।"
मैंने काग़ज़ को गौर से देखा। स्याही में एक जगह ऐसी थी जहाँ काग़ज़ थोड़ा फूला हुआ था — जैसे बाद में कुछ मिलाया गया हो।
मैंने टोकन फिर खोला। शब्द बदल रहा था। "झूठ" मिट गया था, और उसकी जगह उभरा — "आधा सच।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।
"रामदीन," मैंने कहा। "आज रात मैं मंदिर जा रहा हूँ। तू आएगा?"
उसने एक पल सोचा। "ना।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मैं आया, तो कुँवर मुझे देखकर पागल हो जाएगा। और अगर वो पागल हुआ, तो वो वो नहीं बताएगा जो उसने पच्चीस साल दबाकर रखा है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू अकेला जा। पर एक बात याद रख — तहखाने में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। वहाँ एक चीज़ और है, जो मैंने पच्चीस साल पहले छिपाई थी। अगर कुँवर तुझे वहाँ ले जाए, तो उस चीज़ को मत छूने देना।"
"क्या चीज़?"
रामदीन ने धीरे से कहा, "मेरी माँ का टोकन।"
मैं सन्न रह गया।
"तीसरा टोकन?" मैंने पूछा।
"हाँ।" उसने आँखें नीची कर लीं। "बसवा में जो तहख़ाने में आधा जला मिला, वो उसका हिस्सा था। बाकी आधा मंदिर के तहखाने में है। और जो उसे पूरा करेगा, वो तीनों टोकन का मालिक नहीं बनेगा — वो तीनों का हिसाब बराबर करेगा।"
मैंने अपने टोकन को देखा। उस पर नई लकीर उभर रही थी — पंद्रहवीं? सोलहवीं? मैं गिनती भूल गया।
पर एक बात साफ़ थी। आज रात मंदिर में जो होगा, उसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, मैं तेरे साथ चलूँगा। कुँवर चाहे कुछ भी कहे।"
मैंने उसका हाथ थाम लिया। "नहीं। तू बाहर रहेगा। अगर मैं दो घंटे में न निकला, तो अंदर आ जाना।"
बंसी ने सिर हिलाया। उसकी आँखें भरी हुई थीं। "और अगर तू निकला, तो?"
"तो चाय बनाकर रखना," मैंने कहा। "बहुत पीनी है आज।"
वो हँसा। मुश्किल से, पर हँसा।
मैं घर की तरफ़ चला। रास्ते में माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और कुछ नहीं कहा। बस पकड़े रही।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। और उस पर एक आख़िरी शब्द उभरा, इतना छोटा कि मुश्किल से पढ़ा गया — "शाम।"
और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक नाम — "कौशल्या।"
"मन्नू!"
रामदीन दौड़कर आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और टोकन उलट दिया।
"यह नाम तूने कहीं देखा है?"
"नहीं। यह कौन है?"
रामदीन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने चारों तरफ़ देखा, फिर मेरा हाथ खींचकर मुझे दीवार की आड़ में ले गया।
"कौशल्या कुुँवर की माँ थी," उसने फुसफुसाकर कहा। "मर गई। कुँवर जब छोटा था तब मर गई। पर कुँवर को यह कभी नहीं बताया गया कि उसकी माँ कैसे मरी। उसे यह बताया गया कि बुख़ार से मरी।"
"और सच क्या था?"
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखে कुछ ऐसा था जो दरवाज़े की तरफ़ खुला छूट गया हो।
"सच यह था कि कौशल्या उसी रात मरी जिस रात राघव मरा। और मैंने उसके हाथ में यह टोकन पकड़ा हुआ देखा था — तेरे टोकन से मिलता-जुलता। वो टोकन उस वक़्त लाल था, जैसे अंदर से जल रहा हो।"
"तो तीन टोकन नहीं थे? चार थे?"
रामदीन ने सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता कितने थे। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि उस रात जो भी हुआ, उसमें हवेली का हर बंदा शामिल था। और जो नहीं था, वो आज तक किसी को नहीं बता पाया।"
मैंने टोकन जेब में रखा। "तू मेरे साथ मंदिर नहीं चलेगा, यह तूने कह दिया। पर कम से कम इतना बता — तहखाने में कहाँ देखना है?"
रामदीन ने एक पल सोचा। "तहखाने की सीढ़ियों के नीचे उतरकर जो पहला कमरा मिलेगा, उसकी दीवार पर एक आला है — जैसे देवता रखने की जगह। उस आले में मूर्ति नहीं है। उसके पीछे एक बटन जैसा पत्थर है। उसे दबाना मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो बटन नहीं है। वो ताले का चेहरा है। जो उसे दबाएगा, वो उसी रात का हिसाब खोल देगा — और वो हिसाब तेरे बस का नहीं है।"
वो जाने लगा, फिर रुका। "मन्नू, एक और बात। कुँवर ने जो तारीख़ बताई — सोलह साल पहले की — वो सही है। पर राघव और कौशल्या उस रात नहीं मरे थे। वो उस रात मरे थे, जब कुँवर को हवेली से निकाला गया था। उसके बाद। समझा?"
वो चला गया। मैं वहीं खड़ा रहा।
शाम हो गई थी। मैं घर पहुँचा, हाथ-मुँह धोया, और माँ को देखा। वो चूल्हे पर रोटी बना रही थी। मैंने पास जाकर कहा, "माँ, कौशल्या कौन थी?"
माँ का हाथ रुक गया। रोटी का बेलन पकड़े हुए वो वैसे ही रह गई।
"कौशल्या हवेली की नहीं थी," उसने धीरे से कहा। "वो बाहर से आई थी। हवेली में काम करती थी। तेरे दादा ने उसे हवेली से निकालने की कोशिश की थी — उसकी बहन कहकर। पर वो नहीं मानी।"
"दादा की बहन?"
"तेरे दादा की कोई बहन नहीं थी। पर उसकी माँ हवेली में रहती थी — और उस माँ ने, जिसे सब बुढ़िया दाई कहते थे, कौशल्या को अपनी बेटी बताया था। जब बुढ़िया दाई मरी, तब यह बात सामने आई।"
मेरे हाथों में रोटी ठंडी हो रही थी।
"तो कौशल्या… मेरे दादा की सौतेली बहन थी?"
माँ ने मुझे पहली बार सीधा देखा। "काग़ज़ों में क्या लिखा था, मुझे नहीं पता। पर बुढ़िया दाई ने मरने से पहले एक बात कही थी, जो आज तक हवेली की दीवारों में गूँजती है। उसने कहा था — हवेली में कोई अनाथ नहीं है। हर बंदा किसी न किसी का बेटा है, बस किसी को बताया नहीं गया।"
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